|
ألا
إنمــا
هــذا
الـذي
لـك
أنقـل
|
لــه
مثلمــا
أرويــه
أصـل
مؤصـَّلُ
|
|
قضـى
أحـد
الضـباط
في
الحرب
نحبه
|
وكانـإذا
دارت
رحـى
الحـرب
يبسـُل
|
|
وخلَّــف
زوجــاً
قلبهــا
رهـن
حبـه
|
وكــان
لــه
قلــب
بهــا
متشــغِّل
|
|
مــن
اللاء
لـم
يـأتين
فاحشـة
ولا
|
زُنــن
بمــا
منـه
العقـائل
تخجـل
|
|
نـــوار
كشـــخص
للعفــاف
مجســم
|
فــإن
ذكـر
النـاس
العفـاف
تمثـل
|
|
ترقـرق
مـاء
الحسن
في
وجهها
الذي
|
هـو
البـدر
ليـل
التِمِّ
أو
هو
أجمل
|
|
فجــلَّ
لفقــدان
الــوليّ
مصــابها
|
وبـاتت
تنـاجي
الهـم
والعين
تهمل
|
|
وقـد
كان
منها
الخد
كالورد
زاهيا
|
فأصــبح
ذاك
الـورد
بـالهم
يـذبل
|
|
ولازم
حمــى
الــدق
نــاعم
جسـمها
|
فأمسـت
علـى
رغـم
الشـبيبة
تنحـل
|
|
ويعـرق
منهـا
الجسـم
فـي
كل
ليلة
|
وتنفــث
مـن
سـُل
دمـاً
حيـن
تسـعلُ
|
|
وأنشـب
فـي
أحشـائها
الـداء
ظفره
|
فظلـــت
لـــه
أحشــاؤُها
تتــبزل
|
|
ســقام
بهـا
أعيـا
الأطبـاء
بـرؤه
|
إذا
لـم
يعنهـا
اللَـه
فالأمر
مشكل
|
|
أمكـروب
داءِ
السـل
هـل
أنـت
عارف
|
لمـن
أنـت
تـؤذي
أو
بمن
أنت
تنكل
|
|
أرحهــا
فمــا
أبقيــت
إلا
حُشاشـة
|
بهــا
حكمهــا
عمـا
قريـب
سـيبطل
|
|
تجنــب
فقـد
مزقـت
أحشـاء
صـدرها
|
أَأَنــت
بهــا
حـتى
الممـات
موكـل
|
|
وفسـّح
لها
في
العمر
وارحم
شبابها
|
فإنــك
إن
أرجأتهــا
أنــت
مفضـل
|
|
لـكِ
اللَـه
مـن
مسـلولة
حان
حينها
|
وعمـــا
قليــل
للمقــابر
ترحــل
|
|
وفاجأَهــا
فقــر
فبــاعت
لــدفعهِ
|
أثاثـاً
بـه
قـد
كـانت
الدار
تجمل
|
|
إلـى
أن
تخلـى
البيت
من
كل
ما
به
|
ولـم
يبـق
فيـه
مـا
يبـاع
ويُنقـل
|
|
تجانبهــا
الأدنــى
وكــل
لـداتها
|
وأعــرض
عنهــا
جارهــا
المتمـول
|
|
هنالـك
أبـدى
الجـوع
ناجـذه
لهـا
|
وزاد
بهـا
الـداء
الـذي
هـو
معضل
|
|
فخـارت
قواهـا
فـي
غضـير
شـبابها
|
وحـارت
فلـم
تـدر
الـذي
هـي
تفعل
|
|
كـذلك
جسـم
المـرء
يـأكله
الطـوى
|
إذا
المـرء
لـم
يلف
الذي
هو
يأكل
|
|
فســارت
علــى
ريــث
تــؤمُّ
محلَّـة
|
ترجِّــى
بهــا
خيــراً
لهـا
وتؤمـل
|
|
وتزجــي
لهــا
طفلاً
جميلاً
أمامهــا
|
كمـا
تسـتحث
الخِشـف
ادمـاء
مغـزل
|
|
لقـد
أضـعف
الجـوع
المـبرِّح
خطـوه
|
فسـار
وفـي
أحشـائِه
النـار
تُشـعل
|
|
يحــور
إليهــا
بالبكـاء
فتنحنـي
|
عليـــه
وتُســـلى
قلبــه
وتقبــل
|
|
وتمســح
عينيــه
اللـتين
أذالتـا
|
دموعـاً
علـى
الخـدين
منـه
تسلسـل
|
|
تحــاول
أم
الطفــل
منــع
دمـوعه
|
ولكنهــا
رغمــا
عــن
الأم
تهطــلُ
|
|
خـبير
بقصـر
الأم
يشـكو
لها
الونى
|
بعينيـــه
إلا
أنــه
ليــس
يســأل
|
|
تــروح
إلـى
دار
الحكومـة
تبتغـي
|
معاشـاً
لهـا
مسـتأخراً
ليـس
يحصـل
|
|
ريـالان
بعـد
الـزوج
قـد
رُتبا
لها
|
وذلــك
نــزر
ليـس
بـالعيش
يكفـل
|
|
تقـول
لـذي
أمـر
علـى
المال
سيدي
|
إليــك
بجــاه
المصــطفى
أتوســل
|
|
أنلنـي
معاشـي
اليوم
وارحم
فإننا
|
جيـاع
إذا
لـم
نُعـطَ
مـن
أين
نأكل
|
|
فأوســـعها
شـــتما
ورد
ســؤالها
|
وقـال
لهـا
مـوتي
طـوى
لسـت
أبذل
|
|
فعـادت
علـى
يـأس
لهـا
ملءَ
قلبها
|
وقـــد
خنقتهــا
عــبرة
تتغلغــل
|
|
أمالــك
أمـر
المـال
إنـك
زدتهـا
|
ســقاماً
علــى
سـقم
أقلبـك
جنـدل
|
|
ألــم
تـرَ
أن
السـل
أنحـل
جسـمها
|
وحملهــا
الإعــواز
مــا
لا
تحمــل
|
|
منكـــدة
قـــد
طالبتــك
بحقهــا
|
فلـو
كنـت
تقضـي
سـؤلها
كنت
تعذل
|
|
وآبـت
إلـى
المأوى
فباتت
على
طوى
|
تكابـد
طـول
الليـل
والليـل
أليل
|
|
وأعوزهـــا
زيــت
تنــوِّر
بيتهــا
|
بـه
والـدجى
سـجف
علـى
الأرض
مسبل
|
|
فجـرَّ
إليهـا
الليـل
أجنـاد
همِّهـا
|
إذا
فــرَّ
منهــا
جحفـل
كـرَّ
جحفـل
|
|
تقـول
ألا
مـالي
أرى
الصـبح
مبطئاً
|
وعهـدي
بـه
فـي
سـالف
الدهر
يعجل
|
|
فيـا
ليـل
ما
أدرى
وقد
طلتَ
داجياً
|
أعتـبي
علـى
الأيـام
أم
أنـت
أطول
|
|
ألا
ليـت
أمـي
لـم
تلـدني
أو
انني
|
نفتنـي
المنايـا
قبـل
أنـيَ
أعقـل
|
|
برمــت
بمــالي
مـن
حيـاة
فإنهـا
|
شــقائي
وإن
المــوت
منهـا
لأفضـلُ
|
|
حيــاة
أمرَّتهــا
الرزايـا
كأنمـا
|
يمازجهـــا
منهــن
صــاب
وحنظــل
|
|
وعتـبي
علـى
الأقـدار
فهي
بما
جرت
|
بـه
لـم
تكـن
أسـتغفر
اللَـه
تعدل
|
|
فيــا
مـوتُ
زر
إن
الحيـاة
تعاسـة
|
ويــا
نفـس
جـودي
إن
دهـرك
يبخـل
|
|
ومــا
سـفري
إن
مـتُّ
ينـأَى
وإنمـا
|
إلــى
بطنهــا
مـن
ظهرهـا
اتنقـل
|
|
ألا
إن
بطــن
الأرض
للمــرء
منــزل
|
كمــا
أن
ظهـر
الأرض
للمـرء
منـزل
|
|
ولــم
أرَ
بيـن
المنزليـن
تفاوتـاً
|
ســوى
أن
ذا
أعلــى
وذلــك
أسـفل
|
|
ولا
مثــل
بطـن
القـبر
دار
عدالـة
|
تســاوى
بهــا
حــالا
رؤوس
وأرجـل
|
|
ولسـت
علـى
الشـكوى
أدوم
إذا
دنا
|
حمــــامي
إلا
ريثمــــا
اتحـــوَّل
|
|
ولكـــن
روحــي
للســماء
رقيهــا
|
هنالــك
مــن
نجــم
لنجــم
تجـول
|
|
إلــى
أن
تلاقــي
روح
زوجـي
صـادق
|
فتتصــل
الروحــان
والـبين
يخجـل
|
|
فلـو
أبصـرت
روحي
على
البعد
روحه
|
إذاً
لمشــت
روحــي
إليــه
تهـرول
|
|
تقبـــل
روحـــي
روحـــه
وتشــمُّه
|
وتشـكو
إليـه
مـا
بهـا
كـان
ينزل
|
|
وتمســـك
بالأيـــدي
بفضــل
ردائه
|
ومـا
أن
تخلِّـى
بعـد
للحـرب
يرحـل
|
|
وقـولي
لـه
يـا
روح
بعـدك
عيشـنا
|
تعســـر
حـــتى
كـــاد
لا
يُتَحمَّــل
|
|
أصـبح
مـن
قـد
كـان
بـالأمس
سائلاً
|
بأحوالنــا
عمـا
بنـا
ليـس
يسـأل
|
|
تجنبنـا
الأدنـى
ومـن
كـان
صـاحباً
|
ومـن
كـان
يطرينـا
ومـن
كان
يجمل
|
|
وخـــرّى
علــى
أقــدامه
وتــذللي
|
لــه
أن
مـن
يبـدي
الهـوى
متـذلل
|
|
وفــي
فمهـا
بـان
ابتسـام
كأنهـا
|
تشــاهد
شـخص
الـزوج
فيمـا
تخيَّـلُ
|
|
تـراه
قريـب
الأرض
فـي
الجو
ثابتاً
|
فلا
هــو
يســتعلي
ولا
هــو
ينــزل
|
|
فمــدت
يـداً
نحـو
الخيـال
مشـيرة
|
إليـه
وقـالت
وهـي
في
البين
تسعل
|
|
بربـــك
أنــبئني
أإنــك
صــادقي
|
قـد
ازدرت
أم
أنـت
الخيال
الممثل
|
|
فـإن
كنـت
إيـاه
فقـل
غيـر
كـاتم
|
لمــاذا
لمــاذا
أنــت
لا
تتنــزل
|
|
أصـادق
أنـت
السـؤل
للنفس
فاقترب
|
وأنـت
لهـا
أنـت
الرجـاء
المؤمـل
|
|
فـإن
كـان
لـي
ذنـب
به
عفتَ
مسكني
|
فـإني
لـذاك
الـذنب
بالـدمع
أغسل
|
|
إذا
ذكرتــكَ
النفـس
جاشـت
صـبابة
|
وفــار
عليهــا
مـن
غرامـك
مِرجـل
|
|
تبــدَّل
منــي
كــل
شــيء
عهــدته
|
ولكنمــــا
حبيــــك
لا
يتبــــدل
|
|
فهـل
أنـت
فـي
حبي
كما
كنت
سابقاً
|
وقلبـك
كـالقلب
الـذي
كنـت
تحمـل
|
|
إذا
كنـت
عنـي
أنـت
وحـدك
راضـيا
|
فكـــل
صــعوبات
الحيــاة
تســهل
|
|
هلــم
إلــى
جنــبي
فـإني
مريضـة
|
بحمــى
قــوى
جسـمي
بهـا
تـتزلزل
|
|
وسـارع
وأحضـر
لـي
طبيبـاً
مداويا
|
كمــا
كنــت
قبلا
إن
تشـكيتُ
تفعـل
|
|
ولكننــي
أخطــأت
فيمــا
طلبتــه
|
ذهـولا
ومـن
قاسـى
الحـوادث
يـذهل
|
|
فــإني
لا
أبغــي
ســواك
مــداوياً
|
فــأنت
طبيــبي
والشـفاء
المؤَمـل
|
|
أقــم
عنـدنا
لا
ترحلّـن
فـإن
تُقـم
|
فكـــل
نحوســات
الزمــان
ترحــل
|
|
نعيــش
كمــا
كنــا
نعيـش
بغبطـة
|
ونمــرح
فــي
ثـوب
السـلام
ونرفُـل
|
|
فحينئذٍ
لا
حـــــادث
يســـــتفزِّنا
|
ولا
أحـــد
بينــي
وبينــك
يفصــل
|
|
وغــاب
فقــالت
آه
بـل
أنـت
ميـت
|
ولكنمـــا
روحــي
إليــك
ســتقبلُ
|
|
وحـانت
لصـوب
الطفل
منها
التفاتة
|
فقــالت
وفيـاضٌ
مـن
الـدمع
مهمـل
|
|
ولكــن
صــبِّي
مــن
يقــوم
بـأمره
|
إذا
زارنــي
حتفــي
الـذي
أتعجـل
|
|
أَأَتــرك
مـن
بعـدي
صـغيري
أحمـداً
|
وحيـــداً
بلا
حـــامٍ
بــهِ
يتكفــل
|
|
وأحمـد
ريحـاني
فـإن
أَبتعـد
فمـن
|
يشـــممه
بعــدي
ومــن
ذا
يقبــل
|
|
أليسـت
تكـاليف
الحيـاة
التي
لوت
|
جنــاحي
علـى
طفـل
كأحمـد
تثقلـد
|
|
وأغمـى
مـن
جـوع
علـى
الطفل
أحمدٍ
|
فصــاحت
أغـث
ربـي
عليـك
المعـول
|
|
أطلَّــت
عليهــا
جــارة
ذات
عيلـة
|
لتعلـم
مـن
فـي
ظلمـة
الليل
يعول
|
|
ونـادت
مـن
البـاكي
كـذا
بحـرارة
|
وذيل
الدجى
الضافي
عَلَى
الأرض
مسدل
|
|
أجـــابت
بصـــوت
راجــف
متقطــع
|
وقـالت
أنـا
يـا
هـذه
أنـا
سـنبل
|
|
جعــادة
إن
ابنــي
تُغَيَّــبُ
نفســه
|
مـن
الجـوع
إن
الجـوع
ويلـي
يقتل
|
|
جعـادة
إن
ابنـي
الوحيـد
هو
الذي
|
بــهِ
فــي
ليــالي
وحـدتي
أتعلـل
|
|
جعــادة
أن
الأمــر
جــدٌّ
فــأدركي
|
وللجــار
حــق
واجــب
ليـس
يغفـل
|
|
فجــاءت
إليهــا
بالسـراج
وَنبَّهـت
|
قـوى
الطفـل
حـتىّ
عادَ
يَرنو
وَيعقل
|
|
ســقته
حليبــاً
كـان
ملـءَ
ثـديِّها
|
فنـــام
وبـــاتت
أمــه
تتملمــل
|
|
وتــذرف
عيناهـا
الـدموع
وقلبهـا
|
تظــلُّ
بــه
الأحـزان
تعلـو
وتسـفل
|
|
إلـى
الصـبح
حتى
بان
فانطلقت
إلى
|
محــلِّ
بــهِ
أهــل
المــبرة
تنـزل
|
|
عليهــــا
ثيــــاب
رثـــة
وملاءة
|
كأحشـــائها
فــي
كــل
آن
تــبزل
|
|
تكفكــف
دمعــاً
بالبنــان
وكلمـا
|
مشــت
خطــوة
أو
خطــوتين
تمهــل
|
|
تمــد
يمينــاً
بالســؤال
ضــعيفة
|
وتخجـل
منهـم
عنـد
مـا
هـي
تسـأل
|
|
أأرملــة
الجنــدي
لا
تخجلـي
فمـن
|
حقــوق
العلـى
أن
الحكومـة
تخجـل
|