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يـا
فينّا
أسمعي
الدنيا
وهاتي
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قِصـَّةَ
الغابـة
والفَلْـسِ
الكبيرِ
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أيـن
بالـدانوب
شدوُ
الذكرياتِ
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وصـدى
العشاق
في
الليل
الأخيرِ
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رَحَلــوا
عنـكِ
بـأحلامِ
الحيـاةِ
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غيـرَ
قلـبٍ
فـي
يـدِ
الحبِّ
أسير
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حسنُكِ
النشوانُ
والكأسُ
والرويّهْ
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جــدَّدا
عهــدَ
شــبابي
فسـَكرْتُ
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حُلْـــمُ
أيـــامٍ
وليلاتٍ
وضــيَّهْ
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عَـبرَتْ
بـي
فـي
حيـاتي
وعـبرتُ
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أنـا
سـكرانُ
وفـي
الكأس
بقيَّهْ
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أيُّ
خمـر
مـن
جَنـى
الخلد
عصرتُ
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آهِ
هـاتي
قرِّبـي
الكـأس
إليَّـهْ
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واسـقنيها
أنـت
يـا
أندلسـيَّهْ
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لا
تقـــولي
أيُّ
صـــوتٍ
مُلْهِــمِ
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قـادَ
روحينـا
فجئنا
والتقينا
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دَمُـكِ
المشـبوبُ
فيـه
مـن
دمـي
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روحُ
مـاضٍ
بـالهوى
يهفو
إلينا
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أخْـتَ
روحـي
قرِّبيهـا
مـن
فمـي
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إن
شـربنا
أو
طربنا
ما
علينا
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آه
هاتيهـا
مـن
الحسـن
جَنِيَّـهْ
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واسـقنيها
أنـت
يـا
أندلسـيَّهْ
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كـانت
النظـرةُ
أولـى
نظرتيـنْ
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ثــم
صـارت
لفظـةً
مـا
بيننـا
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والهــوى
يَعْجـب
مـن
مغـتربَيْنْ
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لـم
يَقُـلْ
أنـتِ
ولا
قـالتْ
أنـا
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وَســَبَحنا
فـوق
وادٍ
مـن
لجيـنْ
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تحــت
أفـقٍ
مـن
غمـاخم
وسـَنى
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أتملَّاهــــا
ســـماتٍ
عربيّـــهْ
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وأنــادي
أنــتِ
يـا
أندلسـيَّهْ
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صـِحْتُ
يـا
للشَّمس
في
ظلِّ
المغيبِ
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تلثــم
الزَّهـرَ
وأوراقَ
الشـجرْ
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خِلتُهــا
بيــن
محــبٍّ
وحــبيبِ
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قُبلـــةً
عنـــد
وَداع
وســـَفرْ
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فـانثنتْ
تنظـر
للوادي
العجيبِ
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صــُوَراً
يَـذهبنَ
فـي
إِثـرِ
صـورْ
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وبســمعي
همســةٌ
منهـا
شـجِيّهْ
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وبروحــي
أنــتِ
يـا
أندلسـيَّهْ
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ونزلنــا
عِنـد
شـطٍّ
مـن
نُضـارِ
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وانتحينــا
خلـوةً
بعـد
زحـامِ
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قلـتُ
والليـلُ
بأعقـابِ
النهار
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ألـكِ
الليلـةَ
فـي
لحـنٍ
وجـامِ
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مــا
علـى
مغـتربي
أهـل
ودار
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إنْ
أدارا
هـا
هنـا
كـأس
مدامِ
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آه
هاتيهـــا
كخــدّيكِ
نقيّــهْ
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واسـقنيها
أنـت
يـا
أندلسـيَّهْ
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واحتوتنــا
بَيــن
لحـن
مطـرب
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حانــةٌ
مِثـلُ
أسـاطيرِ
الزَّمـانِ
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صـــوّرتْ
جـــدرانُها
بالــذَّهبِ
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فتـنَ
العشـق
وأهـواءَ
الحسـانِ
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قـالت
اشـربْ
قُلـتُ
لبّيكِ
اشربي
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مِلــءَ
كأســين
فإنّـا
ظـامئانِ
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خمـــرةً
روميــةً
أو
بــابليهْ
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إِســقنيها
أنـتِ
يـا
أندلسـيَّهْ
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هتفــتْ
بـي
ويـداها
فـي
يـدي
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تــدفع
الكـأسَ
بـإغراءِ
وعُجْـبِ
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أيُّ
قيثــــارٍ
شــــجيٍّ
غـــرِدِ
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خلتُـهُ
ينطـق
عـن
أسـرار
قلبي
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قلــتُ
طِفــلٌ
مـن
قـديم
الأبـد
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يمـزُجُ
الألحـانَ
مِـن
خمـر
وحُـبِّ
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ملــء
كـأس
فـي
يـديهِ
ذهـبيّهْ
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فاسـقنيها
أنـتِ
يـا
أندلسـيَّهْ
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ومضـى
الليـلُ
ونـادى
بالرواحِ
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كــلُّ
خَــالٍ
وتعايــا
كـلُّ
ضـبِّ
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وخبــا
المصـباحُ
إلَّا
كـأس
راحِ
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نـورُهُ
مـا
بيـن
إِيمـاضٍ
ووثـبِ
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قـد
تحـدَّى
وهْجُـهُ
ضـوءَ
الصباح
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فبقينــا
حــوله
جنبـاً
لجنـبِ
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نتسـاقاها
علـى
الفجـر
نـديّهْ
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وأغنــي
أنــت
يــا
أندلسـيَّهْ
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يـا
عـروسَ
الغـرب
يا
أندلسيّهْ
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بعُـــدَتْ
داركِ
والصــيف
دنــا
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أيـن
أحلامُ
الليـالي
القمريـهْ
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والبحيـــراتُ
مُطيفــاتٌ
بنــا
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إِذكـري
بيـن
الكـؤوس
الذهبيَّه
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حانـةً
يـا
ليتهـا
دامـت
لنـا
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حيــن
أدعــوكِ
صـباحاً
وعشـيّهْ
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إِســقنيها
أنـتِ
يـا
أندلسـيَّهْ
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