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كنـزُ
أحلامِـكَ
يـا
شـاعرُ
فـي
هـذا
المكانِ
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ســحرُ
أنغامِــكَ
طـوَّافٌ
بهاتيـكَ
المغـاني
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فجــرُ
أيامِـكَ
رفَّـافٌ
علـى
هـذي
المحـاني
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أيهـا
الشـاعرُ
هذا
الرَّيْنُ
فاصدحْ
بالأغاني
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كــــــلُّ
حـــــيٍّ
وجمـــــادٍ
ههنـــــا
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هــــاتفٌ
يـــدعو
الحـــبيبَ
المحســـِنا
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يــا
أخــا
الــرُّوحِ
دعــا
الشــوقُ
بنـا
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فاســـْقِنا
مــن
خمــرةِ
الرَّيْــن
اســقنا
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عـالَمُ
الفتنـةِ
يـا
شاعرُ
أم
دنيا
الخيالِ
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أمـــروجٌ
عُلِّقـــتْ
بيــن
ســحابٍ
وجبــالِ
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ضــحكتْ
بيــن
قصــورٍ
كأسـاطيرِ
الليـالي
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هــذه
الجنــةُ
فــانظرْ
أيَّ
ســحرٍ
وجمـالِ
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يــا
حــبيبَ
الــروحِ
يــا
حُلــمَ
السـَّنا
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هـــــذه
ســـــاعتُنا
قـــــم
غنِّنــــا
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ســـــــَكِرَ
العشــــــاقُ
إلَّا
أننــــــا
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فاســـقنا
مــن
خمــرةِ
الرّيــنِ
اســقنا
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ليلـةٌ
فـوق
ضـِفافِ
الريـنِ
حُلْـمُ
الشـعراءِ
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أليـالي
الشـرقِ
يـا
شاعرُ
أم
عرس
السماءِ
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الــدُّجى
ســكرانُ
والأنجـمُ
بعـضُ
النـدماءِ
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أنصـتَ
الغـابُ
وأصـغى
النهرُ
من
صخرٍ
وماءِ
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فاســـــمعِ
الآن
البشــــيرَ
المعلِنــــا
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حــــانتِ
الليلــــةُ
والفجــــرُ
دنـــا
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فـــاملإِ
الأقـــداحَ
مـــن
هــذا
الجنــى
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واســـْقنا
مــن
خمــرة
الريــنِ
اســقنا
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ها
هم
العشاقُ
قد
هبُّوا
إلى
الوادي
خفافا
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أقبلـوا
كالضـوءِ
أطيافـاً
وأحلامـاً
لطافا
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ملأوا
الشــاطئَ
همسـاً
والبسـاتينَ
هُتافـا
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أيهـا
الشاعرُ
هذا
الرَّيْنُ
فاستوحِ
الضِّفافا
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الصــــِّبا
والحســــنُ
والحــــبُّ
هنـــا
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يـــا
حبيـــبي
هـــذه
الـــدنيا
لنــا
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فـــاملإِ
الكـــأس
علـــى
شــدوِ
المنــى
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واســـقنا
مــن
خمــرةِ
الريــنِ
اســقنا
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يـا
ابنـة
الأرِ
حـديثُ
الأمس
ما
أعذب
ذكرَهْ
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كـان
حلمـا
أن
نرى
الرين
وأن
نشرب
خمرَهْ
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وشــربنا
فســكرنا
وأفقنــا
بعـد
سـَكرَهْ
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ووقفنــا
لــوداعٍ
وافترقنـا
بعـد
نظـرَهْ
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أيــــن
أنــــت
الآن
أم
أيــــن
أنـــا
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ضــــربتْ
أيــــدي
الليـــالي
بيننـــا
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غيـــرَ
صـــوتٍ
طـــاف
كـــالحلمِ
بنـــا
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إســـقنا
مـــن
خمــرة
الرَّيــنِ
اســقنا
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