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تــأوّبني
ثقــلٌ
مــن
الهـمّ
موجـعُ
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فـــأرّق
عينــي
والخليــون
هجّــعُ
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همــومٌ
تـوالت
لـو
أطـاف
يسـيرها
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بســـلمى
لظلـــت
شــمّها
تتصــدّع
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ولكنّهــا
نيطــت
فنــاء
بحملهــا
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جهيـر
المنايـا
حـائن
النفس
مجزع
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وعــادت
بلاد
اللّـه
ظلمـاء
حندسـا
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فخلــت
دجــا
ظلمائهــا
لا
تقشــّع
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إليـك
أميـر
المـؤمنين
ولـم
أجـد
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ســواك
مجيـراً
منـك
يـدني
ويمنـع
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تلمّسـت
هـل
مـن
شـافع
لي
فلم
أجد
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سـوى
رحمـة
أعطاكهـا
اللّـه
تشـفع
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لئن
جلّــت
الأجــرام
منـي
وأفظعـت
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لعفــوك
عــن
جرمــي
أجـلّ
وأوسـع
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لئن
لـم
تسـعني
يـا
ابـن
عمّ
محمد
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فمــا
عجــزت
عنــي
وسـائل
أربـع
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طبعـت
عليهـا
صـبغة
ثـم
لـم
تـزل
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علــى
صـالح
الأخلاق
والـدين
تطبـع
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تغايـك
عـن
ذي
الـذنب
تبغـي
صلاحه
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وأنـت
تـرى
مـا
كـان
يـأتي
ويصنع
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وعفــوك
عمــن
لــو
تكـون
جزيتـه
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لطـارت
بـه
فـي
الجـو
نكباء
زعزع
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وأنـــك
لا
تنفــك
تنعــش
عــاثرا
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ولــم
تعترضـه
حيـن
يكبـو
ويخمـع
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ولحلمك
عن
ذي
الجهل
من
بعدما
جرى
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بـه
عنـقٌ
مـن
طـائش
الجهـل
أشـنع
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ففيهــنّ
لــي
إمــا
شـفعن
منـافعٌ
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وفـي
الأربـع
الـولى
إليهـنّ
أفـزع
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مناصـحتي
بالفعـل
إن
كنـت
نائيـا
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إذا
كـان
دان
منـك
بـالقول
يخـدع
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وثانيــة
ظنّـي
بـك
الخيـر
غائبـا
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وإن
قلـت
عبـد
ظـاهر
الغـشّ
مسـبع
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وثالثــة
أنــي
علــى
مـا
هـويته
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وإن
كــثر
الأعــداء
فــيّ
وشـنّعوا
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ورابعـــة
أنــي
إليــك
يســوقني
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ولائي
فمـــولاك
الـــذي
لا
يضـــيّع
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وإنــي
لمــولاك
الــذي
إن
جفـوته
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أتــى
مســتكينا
راهبــاً
يتضــرّع
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وإنّــي
لمــولاك
الضــعيف
فـأعفني
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فــإني
لعفــو
منــك
أهـل
وموضـع
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