|
يــا
رسـولَيّ
اذهبـا
فأبلغاهـا
|
أننـي
اليـوم
قـد
سـلوت
هواها
|
|
جهلــت
قــدرَ
صـبّها
ثـم
جـارت
|
واســتطالت
بحكمهــا
وقضــاها
|
|
طـال
منهـا
البعاد
فاعتلّ
جسمي
|
ثــم
علّلــت
نــاظري
بلقاهــا
|
|
زاد
منهها
النفار
لما
التقينا
|
فتمنيّــت
لــو
أطــالت
نواهـا
|
|
كــلّ
مــرّ
مـن
المليحـة
يحلـو
|
مــا
خلا
صــدّها
وطــول
جفاهـا
|
|
يـا
أخـا
الـودّ
كـم
تصبّر
نفسا
|
لــم
تقابــل
ســلوّها
برضـاها
|
|
لــم
أطـع
للسـُلُوّ
حكمـا
ولكـن
|
ســاقني
ظلمُهــا
ونقـصُ
وفاهـا
|
|
كنـت
عبـدا
لهـا
أرى
الذل
عزّا
|
فــي
خضــوعي
وطــاعتي
لعلاهـا
|
|
فجفتنـــي
وإننــي
خيــر
حــرّ
|
مـن
كـرام
بالمجـد
تحمي
حماها
|
|
كــم
ليـال
قضـيتها
وأليـم
ال
|
سـهد
قـد
نـاب
عـن
لذيذ
كراها
|
|
يلعـب
الشـوق
بـي
وحشـو
ضلوعي
|
نــارُه
جــاوزت
حــدود
لظاهـا
|
|
لا
خيــالٌ
يــزور
منهــا
محبّـا
|
حـاربته
علـى
المـدى
مقلتاهـا
|
|
او
فــؤادٌ
يَــرِقّ
منهــا
لشـاك
|
يشــتكي
هجرهــا
وفقــد
ولاهـا
|
|
مـا
اجتمعنا
للعتب
إلا
وكان
ال
|
دلّ
منهــا
يزيــد
نفسـي
بلاهـا
|
|
مـا
عليهـا
لـو
علّلتنـي
بوصـل
|
وشــفت
مهجــتي
برشــف
لماهـا
|
|
واضـياعَ
الزمـان
فـي
حـبّ
خـودٍ
|
أحرقــت
قلــب
صــبّها
بقلاهــا
|
|
كلمـا
رمـت
عـرض
حـالي
لـديها
|
زاد
منهـا
الإعـراض
عـن
مضناها
|
|
مـا
احتيـالي
فـي
عشق
ربّة
حسن
|
يخجـل
البـدر
إن
تبّـدى
سـناها
|
|
عاهـدتني
علـى
الوفـا
بعض
عام
|
بعـدما
عمـت
فـي
بحـار
هواهـا
|
|
فــترقّبت
نجــم
ســعدي
ولكــن
|
قـد
نهاهـا
عـن
الوصـال
نهاها
|
|
إن
عهـد
الحسـناء
يـا
صاح
برقٌ
|
خلّــبٌ
مثــل
ســخطها
ورضــاها
|
|
لـن
تـرى
عمرهـا
محبّـا
نظيـري
|
وأنــا
ليـس
لـي
حـبيبٌ
سـواها
|
|
ولئن
قلــت
قــد
سـلوت
هواهـا
|
فأنــا
والهــوى
عشـيق
هواهـا
|
|
قـد
سـلوت
النفـار
منهـا
ولكن
|
لســت
أســلو
جمالهـا
وبهاهـا
|
|
فتنـة
العـالمين
جـلّ
الـذي
من
|
جـوهر
الظـرف
والجمـال
براهـا
|
|
حـرت
فـي
عشقها
كما
حرت
في
وص
|
ف
ابـن
ناصـيف
مـن
بـه
أتباهى
|
|
الإمـام
الخطيـر
ذو
الفضل
إبرا
|
هيـم
مـن
قـد
سما
مقاما
وجاها
|
|
واحـد
العصـر
ناصر
العلم
قامو
|
س
القــوافي
ومـن
يشـُدّ
لواهـا
|
|
شـــاعرٌ
نــاثرٌ
فصــيحٌ
بليــغٌ
|
بصــُنوف
العلــوم
ليـس
يضـاهى
|
|
حـاز
بالعقـل
فضـل
شـيخ
جليـل
|
وارتـدى
اللطـف
حلّـة
واقتناها
|
|
فغـدا
مـدحه
علـى
العلـم
فرضا
|
وبـه
اليـوم
قـائل
الشعر
تاها
|
|
شــهد
الحــقّ
أنــه
خيــر
خـلّ
|
قــد
رأى
الــودّ
سـنّةً
فرعاهـا
|
|
لـم
أرد
مـدح
مـا
بـه
من
صفات
|
فـوق
قـدر
الزمـان
شـرح
علاهـا
|
|
إنمــا
عتبـهُ
لقـد
كـان
قصـدي
|
وعـن
العتـب
ضـلّ
عقلـي
وتاهـا
|
|
يـا
خليلـي
مـاذا
تـرى
في
محبّ
|
نحــوكم
جــنّ
شــوقه
وتناهــا
|
|
كيـف
تجفـو
وليـس
لـي
بعض
صبر
|
وعهــود
الــولاء
مـاذا
عراهـا
|
|
يـا
رعـى
اللّـه
طيـب
أيام
أنس
|
فــي
مغــانيكم
تقضــّى
صـفاها
|
|
إنّ
بيــروت
روضـة
العلـم
لكـن
|
أنـت
بـدرٌ
حللـت
منهـا
سـماها
|
|
خيـر
ما
مرّ
لي
من
العمر
قد
كا
|
ن
بهـا
هـل
تـرى
أعـود
أراهـا
|
|
فلئن
ضـمّ
شـملنا
الـدهر
يومـا
|
ســيطول
العتـاب
معكـم
شـفاها
|
|
هاكهــا
كاعبــا
بمـدحك
تـاهت
|
ومـن
العتـب
فـاح
عـرف
شـذاها
|
|
والرضـى
مهرهـا
فإن
جدت
يا
بش
|
را
وإلا
فيـــا
لطـــول
بلاهــا
|