|
الا
فامسـكوا
عنـا
حـديثكم
المـرا
|
قـذفتم
بـه
لا
كـان
فـي
كبدي
جمرا
|
|
تقصـون
مـا
لـو
كنت
في
لجج
الكرى
|
أراه
ملمّــا
لا
نتبهــت
لـه
ذعـرا
|
|
أتنعـون
مولـودا
ومـا
انقـض
كوكب
|
ولا
فـارق
النـور
الغزالة
والبدرا
|
|
ولا
زلزلــت
زلزالهــا
الأرض
يـومه
|
ومـا
أبـدت
الأشراط
آياتها
الكسرى
|
|
ومـا
شـغل
الناس
البكا
عن
أمورهم
|
كـأن
صـروف
الـدهر
ما
أحدثت
أمرا
|
|
بلـى
أحـدثت
مـا
لـو
تجسّم
فانجلى
|
لعينيـك
سـدّ
الافـق
والبر
والبحرا
|
|
لقـد
غيبـت
مـن
غـاب
عنـد
مغيبـه
|
فواضــل
شـتى
لا
تطيـق
لهـا
حصـرا
|
|
حـوى
جيبـه
مـا
لو
توزّع
في
الورى
|
مـن
الفضل
ما
ابقى
بليدا
ولا
غمرا
|
|
تواضــع
فـازداد
ارتفاعـا
وسـميه
|
لما
يقتني
من
نيله
الاجر
لا
الوفرا
|
|
وأن
يشـتري
الأحـرار
مـن
كـل
معشر
|
بمعرفـه
والعـرف
قـد
يشتري
الحرا
|
|
يسـلى
عـن
الميـت
الشـقيق
شـقيقه
|
فلـو
عاشـر
الخنساء
ما
ندبت
صخرا
|
|
إذا
جــال
فـي
مضـمار
فـنّ
حسـبته
|
لإتقـانه
مـا
جـال
فـي
غيـره
فكرا
|
|
لـه
بسـطةٌ
فـي
العلم
والحلم
قصرت
|
خطـا
القـوم
عنها
لا
يجارونه
فترا
|
|
يعلّــلُ
مــن
صـوب
العلـوم
جليسـه
|
ويقطـف
مـن
أكمـام
ءادابـه
زهـرا
|
|
لينــدبه
مــن
أعبـاه
حـلّ
عويصـة
|
وملتمـس
الـذكر
المنـزّل
والـذكرى
|
|
أصــيب
بــه
يـا
قرحـه
كـلّ
مسـلك
|
يـذبّ
عـن
الاسـلام
يبغـى
له
النصرا
|
|
مضــى
عمـره
فاعتـاض
منـه
شـهادةً
|
ينـالُ
بهـا
فـي
حضرة
الشهدا
عمرا
|
|
فطــوبى
لقــبر
أو
دعــوه
عظـامه
|
فيـاليت
أنـي
كـان
صـدري
له
قبرا
|
|
سـقاه
مـن
العفـو
المهيمـن
ديمـة
|
تســحّ
ومــن
رضـوانه
ديمـة
أخـرى
|