|
مــن
ذاق
طعـم
شـراب
القـوم
يـدريه
|
ولــم
يــروق
رحيقــاً
غيــر
صـافيه
|
|
يغمــى
عليــه
فيــدري
غــب
غيبتـه
|
ومــن
دراه
غــدا
بــالروح
يشــريه
|
|
ولــو
تعــوض
أرواحــاً
وجــاد
بهـا
|
فــي
نيلــه
فهــو
بيـع
رابـح
فيـه
|
|
ولــو
حـوى
ألـف
نفـس
وهـو
يبـذلها
|
فــي
كــل
طرفــة
عيــن
لا
تســاويه
|
|
وقطـرة
منـه
تكفـي
الخلـق
لو
طعموا
|
لعربــدوا
عنــدما
تبــدو
بــواديه
|
|
يــدب
فيهــم
ويســري
ســر
ســورته
|
فيشــطحون
علــى
الأكــوان
بــالتيه
|
|
وذو
الصـبابة
لـو
يسـقى
على
عدد
ال
|
ذر
الــذي
ســائر
الأكــوان
تحــويه
|
|
مضــاعفاً
عـدّه
بالضـرب
فـي
جمـل
ال
|
أنفــاس
والكــون
كـأس
ليـس
يرويـه
|
|
يـــروي
ويظمـــأ
لا
ينفــك
شــاربه
|
علــى
الــدوام
مكبّــاً
فـي
تعـاطيه
|
|
ولــم
يــزل
لتــوالي
مــا
يسـاوره
|
يصــحو
ويســكر
والمحبــوب
يســقيه
|
|
فــي
ريّــه
ظمــأ
والصــحو
يســكره
|
والمحــو
يثبتــه
واللــوم
يغريــه
|
|
والقبــض
يبســطه
والوصــل
يفصــله
|
والوجـــد
يظهــره
طــوراً
ويخفيــه
|
|
يبــدو
لـه
السـر
مـن
آفـاق
وجهتـه
|
فأينمـــا
أمّ
فـــالمحبوب
هـــاديه
|
|
يــزوي
حجــاب
التجلّـي
عـن
بصـيرته
|
وليــــس
إلا
لـــه
منـــه
تبـــديه
|
|
لــه
الشــهادة
غيــب
والغيـوب
لـه
|
عيــن
الشـهود
ونـاي
الغيـر
يـدنيه
|
|
وكـان
بالفضـل
فـي
دعـوى
القصور
له
|
شــهادة
والفنــاء
المحــض
يبقيــه
|
|
لــه
لـدى
الجمـع
فـرق
يستضـيء
بـه
|
وبالعبوديــــة
الخلصـــا
يـــؤديه
|
|
ملازمـــاً
فيــه
آداب
الخضــوع
لــه
|
كــالجمع
مـن
فرقـه
مـا
زال
يلقيـه
|
|
يــدنو
ويعلــو
ويرنـو
وهـو
مصـطلم
|
يبــدي
خصوصــية
اللاهــوت
مـن
فيـه
|
|
حــتى
يعــود
إلـى
الناسـوت
متّصـفاً
|
فــي
الحــالتين
بتمييــز
وتــوليه
|
|
لــه
الوجــودات
اضــحت
طـوع
قـدته
|
بـــالله
والأدب
المرعـــى
يثنيـــه
|
|
يطيــر
بــالروح
أنـي
شـاء
مقتـدراً
|
ومــا
يشــاء
مــن
الأطــوار
يـأتيه
|
|
للقــوم
سـر
مـع
المحبـوب
ليـس
لـه
|
مــن
رتبــة
يرتقيهــا
غيـر
أهليـه
|
|
وليــس
يــدرك
للفيـض
الـذي
منحـوا
|
حــد
وليــس
ســوى
المحبـوب
يحصـيه
|
|
بــه
تصــرفهم
فــي
الكائنـات
فمـا
|
يقضـــي
امــرؤ
منهــم
إلا
ويمضــيه
|
|
ولا
يريـــدون
إلا
مــا
يريــد
ومــا
|
يشــاء
شــاؤوا
ومـا
شـاؤوه
يقضـيه
|
|
إن
كنــت
تعجــب
مــن
هـذا
فلا
عجـب
|
لأن
ذلـــك
فضـــل
اللـــه
يـــؤتيه
|
|
وكـم
نوافـل
جـود
فـي
الوجـود
سـرت
|
للــه
فــي
الكـون
سـر
لا
يـرى
فيـه
|
|
لا
شـيء
فـي
الكـون
إلا
وهـو
ذو
أثـر
|
فيمــا
يشــاهد
مــن
تـأثير
مبـديه
|
|
إذا
تـــــأثر
معلــــول
بعلتــــه
|
فمــا
المــؤثر
غيــر
اللـه
قاضـيه
|
|
ليـــس
التضــادد
مناعــاً
لقــدرته
|
وليــس
يثنيــه
عــن
شــيء
تنـافيه
|
|
فهــو
القــديم
بلا
قيــد
ينـاط
بـه
|
مــن
حيــث
قــدرته
يــأتي
تعـاليه
|
|
وإنمــا
مــن
وجــود
الحادثـات
لـه
|
فهـي
فهمنـا
مـانع
الضـد
الـذي
فيه
|
|
فـــإنه
حيــث
لــم
نــدرك
تصــوّره
|
تمـــانع
فـــي
محــل
ظــلّ
يحــويه
|
|
وللفقيـــر
وجـــوه
ليــس
يحصــرها
|
غيــر
الحـبيب
مفيـض
الفضـل
مسـديه
|
|
لــه
طــرائق
شــتّى
لا
يحيــط
بهــا
|
عـــدٌّ
وكـــل
وجــود
فهــو
واديــه
|
|
لـو
كنـت
تـدري
وجوه
العبد
كنت
ترى
|
مطــوي
مــا
فيـه
مـن
قـدس
وتنزيـه
|
|
وكنــت
تشــهد
فيــه
الحـق
معتقـدا
|
فيـه
الكمـال
كمـا
النقصـان
تنفيـه
|
|
والعبـد
هـذا
هـو
الحـر
الـذي
حصلت
|
لــه
بلثــم
يــد
الهــادي
أمـانيه
|
|
غــوث
الأنـام
الرفـاعي
الـذي
عقـدت
|
لــه
الخلافــة
جــلّ
اللــه
معطيــه
|
|
أوصــافه
ظهــرت
مــن
وصــف
مبـدعه
|
كالبــد
يبــدي
ضــياء
فــي
تلقيـه
|
|
وجـــده
المصـــطفى
مــرآة
مشــهده
|
وكلــــه
مظهـــر
يبـــدي
تجليـــه
|
|
إذا
رئي
ذكـــر
المـــولى
برؤيتــه
|
جهــراً
وأعلــن
بالتوحيــد
نــافيه
|
|
وشـــوهدت
ســبحات
النــور
تغمــره
|
وفــاز
بالســعد
والتقريــب
رائيـه
|
|
عبــد
عليــه
ســمات
العــز
لائحــة
|
ونــور
طــه
عــن
التعريــف
يغنيـه
|
|
لــواء
غوثيــة
الأكــوان
فــي
يـده
|
وخلعــة
العــز
والتحكيــم
عــاليه
|
|
إن
كنــت
تقصــد
أن
تحظــى
بصـحبته
|
يــوم
المعــاد
وترقـى
فـي
مراقيـه
|
|
فــالزم
بنيــه
وخـذ
عنهـم
طريقتـه
|
واســلك
علــى
ســنن
طـابت
مسـاعيه
|
|
اخلـــص
ودادك
صــدقاً
فــي
محبتــه
|
إن
المحــب
مــع
المحبــوب
نرويــه
|
|
مــرغ
خــدودك
فــي
أعتــاب
مشـهده
|
والــزم
ثـرى
بـابه
واعكـف
بنـاديه
|
|
واســتغرق
العمــر
فـي
آداب
صـحبته
|
مــع
المشــائخ
والبرهــان
يحكيــه
|
|
واسـتقر
مـا
قـد
حبا
عبد
السميع
به
|
وحصــل
الــدر
واليــاقوت
مـن
فيـه
|
|
وابــذل
قــواك
وبـادر
فـي
أوامـره
|
بالامتثــال
وســر
فــي
سـير
أهليـه
|
|
واســلك
طريقتهـم
تربـح
ومـل
معهـم
|
إلــى
الوفــاق
وبـالغ
فـي
مراقيـه
|
|
واحــذر
بجهـدك
أن
تـاتي
ولـو
خطـأ
|
أمــراً
يغــاير
مــا
يهـوى
ويبغيـه
|
|
وكـــن
لتشــملك
الألطــاف
مجتنبــاً
|
مــا
لا
يحــب
وباعــد
عــن
منـاهيه
|
|
وكـــن
محـــب
محـــبيهم
وناصــرهم
|
فبغضــــهم
وجلال
اللــــه
يـــؤذيه
|
|
ووال
بــالود
مــن
والــى
خليفتــه
|
والــزم
عــداوة
مـن
أضـحى
يعـاديه
|
|
واعلــم
يقينــاً
بـأن
اللـه
ناصـره
|
علــى
المريــد
بــه
سـوءاً
ومعليـه
|
|
واسـتفرغ
الجهـد
فـي
تعزيـز
منصـبه
|
إن
لــم
تكـن
ناصـراً
فـالله
يكفيـه
|
|
وأنــزل
الشــيخ
فــي
أعلا
منــازله
|
فــإنه
قطــب
هــذا
الكــون
واليـه
|
|
واعـرف
لـه
الفضـل
والثم
ترب
مضجعه
|
واجعلـــه
قبلــة
تعظيــم
وتنزيــه
|
|
ولســت
تفعــل
هــذا
إن
ظننــت
بـه
|
أدنــى
قصــور
وميــل
فــي
ترقيــه
|
|
فحـــدّك
الــزم
ولا
تشــهد
لحضــرته
|
نقصــــاً
ولا
خللاً
فيمـــا
يعـــانيه
|
|
واتــرك
مـرادك
واستسـلم
لـه
أبـداً
|
فـإن
عيـن
الهـدى
مـا
الشـيخ
يجريه
|
|
ولا
تــزل
لاختيــار
النفــس
مطرحــاً
|
وكــن
كميــتٍ
مخلــى
فــي
أيــاديه
|
|
أعــدم
وجــودك
لا
تشــهد
لـه
أثـراً
|
يميتــه
الموتــة
الأولــى
ويحييــه
|
|
واجعـل
مفاتيـح
بيـت
السـر
فـي
يده
|
ودعـــه
يهـــدمه
طـــوراً
ويبنيــه
|
|
مــتى
رأيتــك
شــيئاً
كنــت
محتجّـاً
|
وعـدت
بعـد
صـعود
الطـور
فـي
التيه
|
|
وفــي
حضــيض
شـهود
النفـس
منقطعـاً
|
برؤيــة
الشــيء
عمــا
أنـت
نـاويه
|
|
ولا
تــرى
أبــداً
عنــه
غنــى
فمـتى
|
عرفــت
فقــرك
ألفيــت
الغنـى
فيـه
|
|
فــأنت
مـا
عشـت
محتـاج
إليـه
ولـو
|
رأيــت
عنــه
غنــى
تخشــى
تناسـيه
|
|
إن
اعتقــادك
إن
لــم
تــأت
غـايته
|
فـي
حضـرة
الشـيخ
تحـرم
مـن
أياديه
|
|
وإن
تكــن
غيـر
فـانٍ
مـا
حييـت
بـه
|
فيـــه
فيوشــك
أن
تخفــى
مبــاديه
|
|
وغايــة
الأمــر
فيـه
أن
تـراه
علـى
|
كــل
الوجــوه
مصــيباً
فـي
مسـاعيه
|
|
فـإنه
المرشـد
الهـادي
العبـاد
إلى
|
نهــج
الكمــال
وإن
اللــه
هــاديه
|
|
ومــن
إمــارة
هــذا
أن
تــؤول
مـا
|
يحتـــاج
شــرعاً
لتأويــل
وتنــبيه
|
|
وليــس
يلــزم
أن
تـدري
حقيقـة
مـا
|
عليـــك
يشـــكل
إظهــاراً
لخــافيه
|
|
والمـرء
ان
يعتقـد
شـيئاً
وليـس
كما
|
فــي
نفســه
فبحســن
الظــن
يجـديه
|
|
فظــن
خيــراً
بكــل
المـؤمنين
فمـن
|
يظنــه
لــم
يخــب
واللــه
يعطيــه
|
|
وليــس
ينفــع
قطـب
الـوقت
ذا
خلـل
|
لا
يشــهد
الســر
ذا
ريــب
وتمــويه
|
|
ومــا
الرفــاعي
بالهــادي
لمنتحـل
|
فــي
الاعتقــاد
ولا
مــن
لا
يــواليه
|
|
إلا
إذا
ســــبقت
للعبـــد
ســـابقه
|
وحكــم
الشــيخ
فيمــا
شــاءه
فيـه
|
|
ينــال
إذ
ذاك
مـا
يرجـوه
مـن
مـدد
|
يعــود
مــن
بعـد
هـذا
مـن
مـواليه
|
|
ونظــرة
منــه
إن
صــحّت
إليـه
علـى
|
مــا
فيــه
تسـمو
بـه
حقـاً
وتعليـه
|
|
شــيخ
إشــارته
نحــو
المريـد
علـى
|
ســـبيل
ود
بـــإذن
اللــه
تغنيــه
|
|
فالنــاس
عبـدان
مجـذوب
وسـالك
مـا
|
بــه
الأوامــر
جــاءت
مــن
مربيــه
|
|
يكلــف
النفــس
عبـء
الاجتهـاد
كمـا
|
دعـــي
إليـــه
بتعليـــم
وتنــبيه
|
|
والجــذب
أخــذة
عبــد
بغتــة
بيـد
|
إلــى
مقــام
بــه
المحبـوب
يـدنيه
|
|
مــــواهب
وفيوضـــات
تـــزج
بـــه
|
عنايــة
نحــو
أمــر
ليــس
ينــويه
|
|
هــو
المــراد
ومخطـوب
العنايـة
لا
|
يمســـّه
مـــن
لغــوب
فــي
ترقيــه
|
|
ولا
يعـــاني
مشـــقّات
الســلوك
ولا
|
يحــــسّ
كلفـــة
تكليـــف
يلاقيـــه
|
|
طــوراً
يــرد
عليــه
الحــس
تكملـة
|
لحــــاله
ولســـر
ليـــس
يـــدريه
|
|
إذا
تغشـــاه
طــور
الحــس
أزعجــه
|
فيقصـد
الطـور
مـا
قـد
كـان
نـاويه
|
|
تــراه
يعبــد
لا
يلــوي
علــى
شـغل
|
وفــي
الــدياجر
للمــولى
ينــاجيه
|
|
يمســـي
وليـــس
لــه
هــمّ
يحرّكــه
|
ســوى
العبــادة
يســتحلي
تفــانيه
|
|
تـرى
الحقـائق
تبـدو
منـه
فـي
نسـق
|
كمــا
لموسـى
بـدت
مـن
عنـد
بـاريه
|
|
لـــه
اطلاع
ونـــور
فـــي
فراســته
|
مـــع
الكشـــوف
لأن
اللــه
يلقيــه
|
|
وقــد
يغيــب
عــن
الإحسـاس
مختطفـاً
|
وذاك
حيــن
يعيــد
الجــذب
داعيــه
|
|
فيســتوي
فـوق
عـرش
القـرب
مبتهجـاً
|
وذو
العنايــة
حفــظ
الحــق
يحميـه
|
|
وذو
الســلوك
تــراه
فــي
إرادتــه
|
بعــد
التخلّــي
مجــداً
فــي
تحلّيـه
|
|
لــه
إلــى
اللَـه
سـير
لا
يـزال
بـه
|
مجاهــد
النفــس
ذا
وعــي
لبــاقيه
|
|
يمشـي
علـى
نهـج
أهـل
الصدق
ملتزماً
|
مــا
للشــريعة
مــن
حكــم
وتـوجيه
|
|
مراعيــاً
فـي
طريـق
القـوم
عـن
أدب
|
شـــروطهم
خائفـــاً
ممـــا
يرجيــه
|
|
كـم
مـن
مريـد
قضـى
مـا
نـال
بغيته
|
وجــاء
قبــل
بلــوغ
القصـد
نـاعيه
|
|
لكنــه
لــم
يخــب
ممــا
نـواه
وإن
|
حــق
القضــاء
عليــه
فــي
تقاصـيه
|
|
وكــم
مريــدٍ
ونـى
مـن
بعـد
عزمتـه
|
لعــائق
عــن
قــويم
السـير
يثنيـه
|
|
مــل
الســرى
ومطايــا
عزمـه
وهنـت
|
إذ
عزمــه
ذاك
مــا
صــحت
مبــاديه
|
|
مــن
ليـس
يخلـص
فـي
مبـدأ
إرادتـه
|
فكيــف
يرجــو
فلاحــاً
فــي
تنـاهيه
|
|
ومــن
لـه
مـن
هـوى
الأغـراض
شـائبة
|
يهـوي
بـه
الحـظ
فـي
أهـوى
مهـاويه
|
|
ومــا
المريــد
الـذي
صـحت
إرادتـه
|
واستصـحب
العـزم
فيمـا
كـان
ينـويه
|
|
وســار
فـي
السـنن
المرضـي
مجتهـداً
|
إلا
مـــراد
لـــه
جـــذب
يـــوافيه
|
|
والجـذب
إن
جـاء
مـن
بعد
السلوك
له
|
علـــو
شـــان
وتعظيـــم
وتنـــويه
|
|
وكــان
مـن
حيـث
سـبق
الاجتهـاد
لـه
|
فضـل
علـى
الجـذب
ممـا
السعي
تاليه
|
|
فالجذب
هذا
الذي
التفصيل
فيه
هو
ال
|
ذي
بمصــــطلحات
القـــوم
نحكيـــه
|
|
سـيماه
تبد
وعلى
وجه
المريد
وذا
ال
|
جــذب
الــذي
ظهــرت
فينـا
بـواديه
|
|
وفـي
الحقيقـة
لـولا
الجـذب
ما
سلكت
|
ســبل
الرشــاد
ولـم
يسـمع
منـاديه
|
|
ولا
تــــأله
مشــــتاق
ولا
عمــــرت
|
طريـــق
حـــق
ولا
رويـــت
مرائيــه
|
|
لـولا
العنايـة
والتخصـيص
قـد
سـبقا
|
للعبــد
لــم
يــدعه
للفـوز
داعيـه
|
|
تلــك
الســوابق
لولاهـا
وقـد
سـلفت
|
فـي
دعـوة
العبـد
مـا
قـامت
دعاويه
|
|
إن
المريــد
مــراد
والمحـب
هـو
ال
|
مبـدؤ
بـالحب
مـن
ذي
العـرش
هـاديه
|
|
فهـو
المراد
المهنا
في
الحقيقة
وال
|
محبــوب
فاســتمل
هـذا
مـن
أمـاليه
|
|
إن
كــان
يرضـاك
عبـداً
أنـت
تعبـده
|
ملاحظـــاً
نفـــي
تمثيـــل
وتشــبيه
|
|
وإن
أقامــك
فــي
حــال
فقـف
أدبـاً
|
وإن
دعــاك
مــع
التمكيــن
تــأتيه
|
|
فيفتــح
البــاب
إكرامـاً
علـى
عجـل
|
بــاب
المــواهب
بشــرى
مـن
يـافيه
|
|
تضــحي
وتمســي
عزيـزاً
فـي
ضـيافته
|
ويرفــع
الحجــب
كشـفاً
عـن
تنـائيه
|
|
وثــم
تعــرف
مــا
قـد
كنـت
تجهلـه
|
ويصـــــطفيك
لأمـــــر
لا
ترجيــــه
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يوليـك
مـا
ليـس
يـدري
الفهم
غايته
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ممــا
عـن
الحصـر
قـد
جلـت
معـانيه
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وترتــوي
مــن
شــراب
الأنـس
صـافيه
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فـي
مقعـد
الصـدق
والمحبـوب
سـاقيه
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مـن
ذاقهـا
لـم
يخـف
من
بعدها
ضرراً
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يــا
سـعد
مـن
بـات
مملـواً
بصـافيه
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وصـــل
يــا
رب
مــا
غنــت
مطوقــة
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يســلو
الخلــي
بهـا
والصـب
تشـجيه
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ومــا
تمــايلت
الأغصــان
مــن
طـرب
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علــى
النــبي
صــلاة
منــك
ترضــيه
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والآل
والصــحب
والأتبــاع
مـا
قـرئت
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مــن
ذاق
طعـم
شـراب
القـوم
يـدريه
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