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ثقــي
بأمـانتي
إن
طـال
مكـثُ
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فمـا
فـي
مـذهبي
للعهـد
نكـثُ
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ثكلـت
الـروح
مهـدرة
إذا
مـا
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جــرى
منّــي
لســر
هـواك
بـث
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ثـوت
منـك
المـودة
فـي
ضميري
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ومــا
لسـواك
جـوز
فيـه
لبـث
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ثلمـت
عـرى
المـودة
إن
يكنلي
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بمــا
لا
تشــتهين
هــوىً
وحـث
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ثـرى
آثـار
نعلـك
كحـل
عينـي
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ولــذتها
بــذلك
حيــن
أحثـو
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ثمــار
ســريرتي
رعيـت
غثـاءً
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ومـــن
إلاك
يرعاهــا
ويعثــو
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ثملــتُ
بخمـر
حبـك
منـذ
حيـن
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كــؤس
غــذاي
فيــه
دم
وفـرث
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ثبـت
علـى
مـرادك
فـي
ضـميري
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فــإن
عجلا
وإن
ريثــا
فريّــث
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ثقيــل
حمـل
أعبـاء
التصـابي
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لــي
الثلثـان
والعشـَّاق
ثلـث
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ثلاث
هــنّ
أصــل
ســقام
جسـمي
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وفـي
عقـد
الفـؤاد
لهـن
نفـث
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ثناياهـــا
وطـــرفٌ
بـــابلي
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وفــرع
يشــبه
الــديجور
كـتُّ
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ثبـوتي
فـي
الهوى
العذري
قوي
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دليــــل
أن
ســـِرِّيَ
لا
ينـــث
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ثقـاة
العشـق
قـد
عرفت
مقامي
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فهـل
مـن
بعـد
هذا
الحال
بحث
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ثـواب
الحـب
لـولا
الصـبر
إثم
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ورحـل
الصـبر
لـولا
العـزم
رث
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ثنيـت
عـن
النسـيب
عنان
شعري
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فغــاداتُ
القـوافي
منـه
شـعث
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ثــواقب
محصــنات
الكــر
إلاَّ
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بمــدحي
لابــن
إسـماعيل
غـرث
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ثمــال
المرمليـن
عزيـز
مصـر
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مليـك
العـرب
وابلهـا
الملـث
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ثريـا
أمـن
هـذا
الـدين
ممـا
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نحـــاذره
وللراجيـــن
غــوث
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ثعــاب
كــل
ذي
كـرم
إذا
مـا
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إليــه
نســبته
ونــداه
غيـث
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ثيـاب
العـرض
لحـن
عليـه
بيض
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وخلـق
وهـو
ذو
العزمـات
دمـث
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ثنــاء
المــادحين
عليـه
حـقٌّ
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لــه
مــن
فعلــه
بـذرٌ
وحـرث
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ثفال
رحى
النزال
إذا
استدارت
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بشـــدة
بأســه
ليــثٌ
فليــث
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ثبـات
جنـانه
فـي
الحرب
عادت
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بـه
الأعـداءُ
بيـن
يـديه
تجثو
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ثغـور
النصـر
باسـمة
إذا
مـا
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تجهـــز
جحفـــل
وتلاه
بعـــث
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ثبــات
ينفــردن
علــى
طـوامٍ
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يميـن
الريـح
ان
يسـبقن
حنـث
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ثـواني
عطفهـا
في
الحرب
تيهاً
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وتيــه
الصـافنات
الجـرد
إرث
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ثللـن
عـروش
أهـل
البغـي
لما
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بــدا
عصـيانهم
والبغـي
خبـث
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ثـبي
يـا
هنـد
نحـو
عزيز
مصرٍ
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فكــــل
مملــــك
إلاه
غــــث
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ثميـن
المـال
فـي
يـده
رخيـص
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وللبأســاء
مــن
جــدواه
جـث
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