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أعـد
الحديث
عن
الأماني
الحفد
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واغتـم
مسالمة
الليالي
العود
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وأدر
كـؤوس
الراح
فيها
للهنا
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أيـدي
الصبا
منها
صحيفة
عسجد
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طـوراً
تطوف
بها
الشموس
وتارة
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تسـعى
بهـا
الأقمار
حول
الوقد
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مـن
كـل
وضـاح
الجبين
أغر
ذي
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شــمم
وعــز
بالشـباب
معربـد
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يلقـاك
ملتحـف
الوقـار
كلاهما
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بـادي
المشيخة
في
حداثة
أمرد
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يغـدو
بأصـناف
المسـرة
لاهيـا
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يومـاً
ويومـاً
بالمقيم
المقعد
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لا
تبصـر
العينان
منه
لذي
نهى
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إلا
خلال
ممجـــــد
ومســـــود
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إن
قـال
كان
الرأي
منه
مسددا
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أو
صـال
كـان
الخصم
غير
مسدد
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وخضــيبة
الكفيـن
مـزر
قـدها
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هيفـا
بأعطـاف
الغصـون
الميد
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نشـوانة
بالحسـن
تعبث
بالنهى
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عبث
الحوادث
بالوليد
المبتدي
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تلقـاك
فـي
ديبـاجتين
منوطـة
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مـن
فـوق
ضـاف
بالعبير
مقرمد
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أقسـى
مساسـاً
مـن
فؤاد
معذبي
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وأرق
مـن
قلـب
حزيـن
المكمـد
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مـا
بيـن
طلعـة
بـدر
تم
مشرق
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زاهـي
الجـبين
وليل
شعر
أجعد
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فتاكـــة
فتانـــة
مأســورها
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لا
يفتــدي
وقتيلهـا
لا
يسـتدي
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إن
أقبلـت
فتنـت
وإن
ولت
سبت
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مهـج
الأراقـم
دون
نيل
المقصد
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تـدني
وتبعـد
بالـذي
تومي
به
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لأخـي
العفـاف
وللبغـي
الأنكـد
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فتظنهــا
مـن
ثـم
غيـر
عصـية
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وتخالهـا
مـن
ههنـا
كالعضـلد
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وتروضــها
كخليســتين
عروبـة
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غــض
المسـاس
وحيزبـون
علكـد
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لا
ينقضـي
مـن
حبهـا
وطـر
ولا
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يـدنو
لهـا
بـالغي
عـزم
مجرد
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