|
يـا
نـديم
الصـباح
أتـرع
كئوسـك
|
وأذب
فـــي
شـــعاعها
أتراحـــك
|
|
ســوف
تطـوى
كـف
المسـاء
عروسـك
|
وتبكــي
مــع
النــدامى
صــباحك
|
|
طـف
بعينيـك
فـي
الفضـاء
الفسيح
|
وتنســم
عطــر
الصــفاء
الروحـي
|
|
تجــد
الأرض
دميــة
أفــرغ
الشـر
|
عليهـــا
صـــبابة
مـــن
قــروح
|
|
أنـــت
عنـــدي
كســـيد
مســتبدّ
|
خفيـــت
فيـــه
ذلَـــةُ
الأســراء
|
|
كلّمــا
جئتنــي
تنـادين
يـا
عَـب
|
دي
وفـــي
مقلتيــك
روح
الــولاءِ
|
|
نــادميني
ولا
تــذوقي
الشــرابا
|
بعيـــون
أصــفى
مــن
الصــهباء
|
|
لا
تقــولي
إشــراق
عينــي
غابـا
|
ودعــي
مــا
ورثــت
عــن
حــواء
|
|
أنــت
تخشـى
نـار
الغـرام
عليّـا
|
وترجــى
النجــاة
مــن
أنفاســه
|
|
يــا
صــديقي
أحسـن
ظنونـك
فيّـا
|
أنــا
أرجــو
نـداه
مـن
أقباسـه
|
|
أيهــا
الحامــل
المتــاع
تمهـل
|
أي
داع
يـــدعو
إلـــى
الإســراع
|
|
ليــس
بــدّ
مــن
الفـراق
فـدعني
|
أتمتّـــع
بغيــر
هــذا
المتــاع
|
|
يــا
حبيــبي
نيــران
حبـك
شـبت
|
فـي
فـؤادي
والمـاء
ملـء
يمينـك
|
|
إن
نــزرا
مــن
الصــفاء
يــروي
|
ه
ويفنــــى
شـــكوكه
بيقينـــك
|
|
ضــحكة
اللَـه
فـي
السـموات
رنّـت
|
وبكــاء
الإنســان
فـي
الأرض
رنـا
|
|
والمقـــادير
قـــدرت
فاطمــأنت
|
لا
تبــالي
نـاح
الـورى
أم
تغنـى
|
|
كـدت
أرتـاح
للحـديث
عـن
القـرد
|
أبـــــــا
أوّلا
وأنكــــــر
آدم
|
|
بعــد
أن
نـالني
بنـوه
بمـا
لـم
|
أجــن
أســبابه
فعفــت
العــالم
|
|
أيهــا
المضـجري
بمـا
تـدعى
مـن
|
وحـدة
فـي
الوجـود
أو
في
الشهود
|
|
لا
تصـــدع
رأســـي
فحســبي
مــن
|
عيشــي
حميــا
كــأس
ورنـة
عـود
|
|
يـا
معـانى
اللقـاء
يتمـك
الهـج
|
ر
فأصــبحت
مــن
معـاني
الفـراق
|
|
لسـت
آسـي
علـى
الحيـاة
إذا
مـا
|
شـــمتها
دون
قبلـــة
أو
عنــاق
|
|
جــوهر
الكــون
صــامت
فــي
علاه
|
فلمــــاذا
تحــــدث
الأعــــراض
|
|
إن
هـــذا
اللســان
آفــة
هــذا
|
النـــاس
ينــدى
وكلــه
أمــراض
|
|
مشــــكلات
القضـــاء
والأقـــدار
|
حيــــرت
كـــل
عاقـــل
جبـــار
|
|
والبرايـــا
مضــللون
اســتقروا
|
بالأمـــاني
علـــى
شــفير
هــار
|
|
أيهـا
الآمـل
الصـفاء
مـع
الـدهر
|
ترفــــق
بنفســــك
الوســـنانه
|
|
خـذ
أمانـا
مـن
الزمـان
فإن
ذقت
|
صـــفاء
فـــذاك
منـــه
أمــانه
|
|
ارقصـوا
رقصـة
الحيـاة
أو
المـو
|
ت
إذا
مـــات
ســـيد
أو
زنيـــم
|
|
لـن
تزيـدوهما
علـى
القـبر
قبرا
|
فيـــه
ينمـــاز
طــاهر
ورجيــم
|
|
رجـــل
يشــرب
الحميــم
ليحيــا
|
فيســــمون
صــــنعه
تــــدجيلا
|
|
وأنــاس
لــم
يمتطــوا
الأرض
إلا
|
ليزيــدوا
أهــل
الحميـم
عـويلا
|
|
أشـلعوا
فـي
بيـت
المعـرس
نـارا
|
يتنشــــق
دخانهـــا
التعســـاء
|
|
حكمــة
البــؤس
والرفاهــة
جنّـت
|
فتـــــولّى
ترويضـــــها
الجهلاء
|
|
يـا
مطـيّ
القضـاء
أضـناكم
السـي
|
ر
فثـــوروا
بطبعكــم
لا
بطبعــه
|
|
أو
فنـاموا
وانسـوا
الشـكاة
فما
|
تجـدي
ولـم
تجـد
آدمـا
بعد
وقعه
|
|
هنـــأوا
الأم
بالوليــدِ
ومــرّوا
|
بــــأبيه
يكـــرّرون
التهـــاني
|
|
وهمــو
لــو
دروا
لعــزوه
فيــه
|
فلقـــد
جــاءه
خريــف
الزمــان
|
|
أعجـب
الأمـر
فـي
التحية
أن
النا
|
س
يلقونهــــا
ســـلاماً
ورحمـــه
|
|
هيكــل
اللفـظ
فـارقته
المعـاني
|
وهـــي
نســـاكه
فأنتــج
عقمــه
|
|
حسـبوا
الـدهر
غـافلا
عـن
خطـاهم
|
فأقـــــاموا
مجانـــــة
الميلاد
|
|
رحمتـــا
للأنيــس
يصــنع
ســلوا
|
ه
ليقتــص
مــن
عــداء
العـوادي
|
|
فــي
الأناســي
مـن
يميـت
شـعوبا
|
بســـــموم
يظنهـــــن
شــــفاء
|
|
كالــذي
أغـرق
السـفين
بمـا
خـف
|
ت
مــن
المـاء
حيـن
خـاف
المـاء
|
|
أنــا
أجــتر
أمنيــاتي
إذا
لـم
|
يخلــق
الحــب
أمنيــات
جديــده
|
|
أيــن
ســمع
الحـبيب
أسـكب
فيـه
|
ملــء
جنــبي
مــن
أغـان
شـريده
|
|
كلنـا
فـي
الحيـاة
يخشى
من
المو
|
ت
فيــا
فرحتــا
لأهــل
القبــور
|
|
عرفــوا
البـدء
والختـام
جميعـاً
|
فاطمـــأنوا
لحالـــك
الــديجور
|
|
لا
تلـم
مـن
تعيـش
فـي
كنـف
العر
|
ض
فقــد
آدهــا
صــراع
الحيــاة
|
|
ربمــا
ضــم
شــامخٌ
مـومس
النـف
|
س
وفـــي
وجههــا
حيــاء
فتــاة
|
|
أيهــا
العصــر
لاتتــه
إن
كـوخى
|
ليــس
يخشــى
قســاوة
الزلــزال
|
|
أنــا
فيــه
ســلطان
نفـي
وسـكا
|
نـــك
عبـــدان
نســوة
أو
مــال
|
|
قـال
لـي
الحـظ
مـرة
وهـو
يجـري
|
خشـية
اللمـس
مـن
ذراعـي
المديد
|
|
ســوف
آتيـك
طائعـا
بعـد
أن
يـن
|
شـر
مـا
فـي
الغيـوب
مـن
تجعيـد
|
|
غمـرات
السـكون
فـي
الليـل
تنسي
|
نــي
أفـانين
مـن
ضـجيج
النهـار
|
|
وحــدتي
معبــدي
وشــعري
تســبي
|
حــي
فبعــدا
للنــاس
مـن
سـمّار
|
|
قــل
لمــن
طـاول
السـماء
عتـوّا
|
لا
علـــوّا
وعـــثيراً
لا
غمامـــا
|
|
انكمــش
قبــل
أن
تمزّقـك
الريـح
|
وتــذروك
فــي
الجــواء
حطامــا
|
|
أنـــت
رجـــسٌ
مــذوّب
فــي
كئوس
|
ملئت
مــــن
طهـــارة
الإيمـــان
|
|
كيــف
أسـطيع
أن
أروّي
بـك
الـتر
|
ب
ومنــك
ارتــوت
ظمـاء
الأمـاني
|
|
أتقـــولين
إننــي
لســت
إنســا
|
نــا
لمــا
شـمته
مـن
اسـتحيائي
|
|
أنــت
جمـر
شـبته
أنفـاس
ماضـيه
|
فمـــا
ينطفـــى
بغيــر
المــاء
|
|
ملــء
عينيــك
غمــرة
مـن
غمـام
|
أفعمتهــا
الأيــام
دمعــا
سـخيا
|
|
فاســكبيه
ينبــت
أزاهــر
نسـيا
|
ن
فلا
تـــذكرين
بعــد
الشــجونا
|
|
كـم
علـى
الأرض
مـن
بينهـا
حيارى
|
ضــللتهم
فــي
بيــدها
النكبـات
|
|
ســبقوا
العمـر
فـي
طلاب
الأمـاني
|
فــإذا
العمــر
والأمــاني
فتـات
|
|
يـــا
حبيبـــا
يعـــزه
أن
أذلا
|
ســوف
أنســاك
قبــل
أن
تنسـاني
|
|
وكفـــاني
مـــا
ذقــت
نهلا
وعلا
|
أيهــا
الخالــد
الــذي
أفنـاني
|
|
أنقـذيني
يـا
كـأس
مـن
عبث
النا
|
س
فهـــم
فـــي
وقــارهم
مســلاة
|
|
ربمــا
كـان
فـي
المـواخير
نسـا
|
ك
وفــي
المعبــد
الطهـور
عصـاه
|
|
لاتنــاد
الســاقي
فكـم
مـن
كئوس
|
مفعمـــات
شــربتها
مــن
يــديه
|
|
خلتهـا
سـلوة
الفـؤاد
عـن
الجـم
|
ر
فكــانت
جمــرا
يزيــد
عليــه
|
|
يـا
سـقاة
الغـرام
بـالأعين
النج
|
ل
كئوســـا
مشـــبوبة
القطــرات
|
|
هــا
هنـا
ظـامىء
يحـن
إلـى
كـأ
|
س
يفـــدى
حبابهـــا
بالحيـــاة
|
|
يـا
رهيـب
السـكون
يا
ليل
ما
أع
|
جــب
حـالي
علـى
الغـرام
وحالـك
|
|
أنــت
فــي
هجرهــا
عجـوز
تمطـى
|
ولــدى
القــرب
شــامخ
يتهالــك
|
|
إن
رأيــت
الســهوم
فـي
نظراتـي
|
والبكــاء
الحزيــن
فـي
كلمـاتي
|
|
فاعــذريني
فقــد
تحطمــت
الكـأ
|
س
وكــــانت
عبـــادتي
وصـــلاتي
|
|
صــدىء
الحـر
فـي
يمينـك
يـا
دن
|
يـــا
ودام
النقـــاء
للأكـــدار
|
|
أربيــع
الحيــاة
يقســم
للشــو
|
ك
ويبقـــى
الخريـــف
للأزهـــار
|
|
يـا
طهـاة
الحظـوظ
حسـبكم
الصـم
|
ت
دليلا
علـــى
شـــقاء
الجيــاع
|
|
تســمنون
الــذئب
الســمين
ليـس
|
تشـري
على
الشاة
فيه
داء
الصراع
|
|
يــا
صــحارى
الحرمـان
مـا
أصـن
|
ع
اليـوم
وقد
هزني
نداء
الروابي
|
|
لا
تلـومي
سـؤلي
فقـد
آدنـي
السي
|
ر
ولمــا
أفــز
بغيــر
الســراب
|
|
لهــــف
قلـــبي
مـــتى
ينـــال
|
أمانيه
فيعلو
فوق
الزمان
الساخر
|
|
فـي
ربيـع
الشـباب
يرجـو
ويخشـى
|
وهـو
بيـن
المنـى
وبيـن
المقادر
|
|
يــا
دمــاي
الـتي
أضـعت
شـبابي
|
أتغنــى
بحســنها
فــي
الخيــال
|
|
أنــت
مثلـي
غريبـة
غربـة
الـدر
|
ة
تفنــى
فــي
حمــأة
الصلصــال
|
|
لســت
أدري
أفــي
الأناســي
خيـر
|
يرتجــى
أم
أرضــى
بهـا
أشـرارا
|
|
حيرتـي
حيـرة
الشـريد
علـى
القف
|
ر
يرجــى
نــورا
فيشــرب
نــارا
|
|
إيـه
يـا
مخرجـي
الروايـة
هل
كا
|
ذن
عليكــم
فـي
نقـص
دوري
جنـاح
|
|
أنــا
مثلتـه
مـرارا
فمـا
ارتـح
|
ت
ومــن
لــم
يمثلـوه
اسـتراحوا
|
|
كـل
هـذا
الجمـال
للقـبر
يـا
رب
|
ألامــا
أشــقى
ضــحايا
الجمــال
|
|
عبـــدوه
ربـــا
يميــت
ليحيــى
|
وهــــداه
مجمـــع
مـــن
ضـــلال
|
|
إن
رأيـت
المجنـون
يعبـث
بالنـا
|
ر
فلا
تقرعـــى
بنــان
النــدامه
|
|
هــو
عقــل
الحيـاة
خبلـه
الشـك
|
فأنســـــاه
نــــوره
وظلامــــه
|
|
عجلـى
الخطـو
قبـل
أن
يشرق
الفج
|
ر
فنمضــــى
مفرّقيـــن
مكانـــا
|
|
نحـن
فـي
الليـل
طـائران
سـعيدا
|
ن
نغنّـــى
بالفرحـــة
الأكوانــا
|
|
قبلينــي
يـا
ربّـة
الحـب
إن
شـئ
|
ت
وإن
شـــــئت
قبلــــى
الأطلالا
|
|
نحــن
يــان
فـي
الشـقاء
وإن
زد
|
ت
عليهـــا
الحنيــن
والتســآلا
|
|
يـا
بنـى
الأرض
لسـت
منكم
وإن
عا
|
شــرتكم
عشــرة
العـزوف
العيـوف
|
|
مكــــرة
لا
مخيّــــر
وفنــــائي
|
كوجــــودي
مقيــــد
بـــالظروف
|
|
دنّــس
الــواعظ
القــدير
فـأخفى
|
رجســـه
فـــي
غلائل
مــن
بلاغــه
|
|
أحرقـــوه
فليـــس
أخطــر
منــه
|
ودعــوا
الشـمس
كـي
تسـد
فراغـه
|
|
أسـعديني
فـي
مـأتم
الحـب
والقل
|
ب
إذا
مـــا
أردت
أن
تســـعديني
|
|
أودعينـــي
أنـــدبهما
وأطهـــر
|
صـــلواتي
براهبـــات
الجفـــون
|
|
يـا
بنـة
الحـب
والشـباب
هـبيني
|
لـم
أكـذب
مـا
قلـت
فـي
النسيان
|
|
مـا
تقـولين
حينمـا
يبعـث
الحـب
|
رفاتــــاً
مكفّنــــا
بالأمـــاني
|
|
أرضـعي
الطفـل
يـا
مهـاة
فقد
جا
|
ع
ولا
تـــوقظيه
إن
كــان
نامــا
|
|
أو
فقــولي
ألسـت
ترجيـن
أن
لـو
|
لــم
يكــن
كـي
لا
يثقـل
الأيامـا
|
|
أنــا
فجــر
طــوته
راحــة
ليـلٍ
|
مســـتخفّ
بــالكون
والكائنينــا
|
|
آه
لـــو
شـــلّ
فــانفلتّ
لأحيــي
|
أو
أحـــيّ
بنـــوريَ
الحائرينــا
|
|
سـجنتني
الأقـدار
فـي
قفـص
الطـي
|
ن
ولــم
تنــس
أن
تشــدّ
وثــاقي
|
|
ليتهــا
تفقــد
العنــان
لأفنــى
|
ولتفنـــى
شـــقاوتي
واحــتراقي
|
|
لسـت
عبـد
النفاق
يا
قوم
فامضوا
|
واســتعينوا
بمــن
يعيـش
نفاقـا
|
|
حسـبكم
أننـا
تـوائم
فـي
القيـد
|
وإن
كنــــت
أوثـــر
الإنطلاقـــا
|
|
أيهــا
الفيلســوف
أنفقــت
أيّـا
|
مـــك
فيمــا
لا
يشــترى
برمــاد
|
|
بيننـــا
قصــة
الوجــود
فحــدث
|
أهــيَ
زادت
عــن
يقظــة
ورقــاد
|
|
ســائل
الأرض
هــل
خلــت
لحظــات
|
مـن
تلقـى
الأمـوات
فـي
كـل
حيـن
|
|
ثــم
دعنـى
إن
لـم
يرقـك
حـديثي
|
عنـك
يـا
بـن
الرقطـاء
والتنيـن
|
|
حــدثوا
القــرد
مـرة
عـن
جميـل
|
وصــــفوه
بأجمــــل
الأوصــــاف
|
|
فلـوى
ذيلـه
احتجاجـا
وقـال
الي
|
وم
ضــــاعت
شـــريعة
الإنصـــاف
|
|
رب
مــا
أعجــب
الأناســيّ
حــولي
|
يتغنــــون
والمجـــازر
تبكـــي
|
|
فـاعف
عنـي
إمـا
شـككت
فمـن
صـن
|
عــك
يــا
خــالقي
يقينـي
وشـكى
|
|
عبـــد
الأقــدمون
أربــاب
فكــر
|
وشــدوا
فــي
تقديسـها
الألحانـا
|
|
وعبـــدتم
أنتــم
عبيــد
تــراب
|
وبــــذلتم
حيـــاءكم
قربانـــا
|
|
يـا
حبيـبي
مـاذا
ترجـى
من
الهج
|
ر
أذل
الفــــؤاد
أم
نســــياني
|
|
أي
ذنــب
جنيــت
فـي
الحـب
حـتى
|
تســتبيك
الــدموع
مــن
أجفـاني
|
|
رجعــي
يــا
طيـور
أغنيـة
الفـج
|
ر
فقـــد
حــنّ
هــاجري
للقــائي
|
|
واســجدي
إن
ألــمّ
يجمعــه
الـل
|
ه
مـــذيبُ
الجفـــون
والأحشـــاء
|
|
لا
تنــادي
يـا
سـيدي
فلفقـد
ضـم
|
ك
بـــي
واحـــد
مـــن
الآبـــاء
|
|
نحن
سيان
في
السيادة
لكن
القضاء
|
الأعمـــــى
أســـــاس
الــــداء
|
|
هــذه
المخرجــاتُ
مــن
كبـدِ
الأر
|
ض
تعيــن
المســكين
فـي
بلـوائه
|
|
رحمتـا
للغريـق
فـي
مـائج
الـتي
|
ه
يخــال
البأســاء
فـي
نعمـائه
|
|
يـا
صدى
الصوت
ضعت
مثل
ضياع
الص
|
وت
بــل
أنــت
زدت
عنــه
ضـياعا
|
|
أنــت
مثّلــت
لــي
أمــانيّ
لمـا
|
لـم
تجـد
فـي
أفـق
الحياة
شعاعا
|
|
كتــب
اللــه
لــن
يضــيع
تقــيّ
|
فلمـــاذا
أرى
شـــقاء
التقـــي
|
|
ملــء
ديـر
الأحـزان
رهبـان
دمـع
|
كـــل
بــرّ
منهــم
بــألف
نــبيّ
|
|
أيهـا
الضـاحكون
فـي
مأتم
الجسم
|
ســـلاماً
مـــن
ضـــاحكٍ
مجهـــول
|
|
لمعــة
البشــر
فـي
مـآقيه
بـرق
|
يتنـــدّى
بالهـــاتن
المغلـــول
|
|
قبلــة
الشــمس
للزهــور
جحيــم
|
أخمــــدَتهُ
جــــداول
الأنـــداء
|
|
هكـــذا
قبلــة
المشــوق
لطيــف
|
مــن
هـواه
ينسـاب
فـي
الظلمـاء
|
|
أيهــا
الزاهـدون
فـي
غمـرة
الإث
|
م
ســـلاماً
مـــن
زاهــدٍ
عبقــري
|
|
أطلـق
الخيـر
روحـه
وقضـى
وكانت
|
قــائدي
إذ
أتيــهُ
فــي
صـحرائك
|
|
يـا
بنـة
الخمـر
والسنا
أسكريني
|
ودعينـــي
أعـــب
مــن
أضــوائك
|
|
فنيــت
جمــرة
الضــلوع
وكــانت
|
قــائدي
إذ
أتيــه
فــي
صـحرائك
|
|
حينمــا
تســمعين
أغنيــة
الحـب
|
فلا
تهــــزئي
بمـــا
تســـعمينا
|
|
إنـــه
حــاطب
يجــوب
الليــالي
|
علّـــه
يصــطلى
فــؤاداً
حزينــا
|
|
أيهـا
الكـوكب
المشـعّ
مـن
الشـر
|
فــةِ
نــورا
يضـيء
قلـب
النهـار
|
|
كــم
ألــوف
تمــر
دونـي
فلا
تـع
|
رف
مـــا
بيننــا
مــن
الأســرار
|
|
عجــب
اللــه
مــن
فقيــرٍ
يزَكّـي
|
وغنـــــيّ
يحنّــــطُ
الأمــــوالا
|
|
لــي
قلــب
يزيــن
البـؤس
للنـا
|
س
ويرجــو
لـو
كـان
أبـأسَ
حـالا
|
|
يــا
شــروق
الحيـاة
أنسـيتُ
لألا
|
ءك
إذ
ضـــــمني
ظلام
الغــــروب
|
|
مـن
يجيـر
الغـدير
يـروى
جـدوباً
|
ثــمّ
لا
ترتــوي
شــفاه
الجــدوب
|
|
أقمار
في
الحب
ما
أخسر
الربح
إذ
|
ا
كنـــــــت
رابــــــح
الأوراق
|
|
ملــء
كفيــك
خــافقي
فــاحفظيه
|
ليغنيــــك
غنــــوة
الأشــــواق
|
|
يـوم
أن
هـزن
ينـداء
الليالي
ال
|
بيـض
مـن
ناظريـك
خنـت
اصـطباري
|
|
حــدثيني
أتخطىــء
العيـن
حسـنا
|
أم
غرامــــي
مضـــلّل
الأقـــدار
|
|
مــا
هيــامي
بنيــل
قلبــك
إلا
|
خـــدر
مـــن
ســـلافة
النظــرات
|
|
وحنينـــي
إليــك
وهــو
يمينــي
|
أنقــذيني
مــن
حرقــة
الزفـرات
|
|
يـــوم
أن
قلـــت
لـــي
أحبـــك
|
بـاللحظِ
أذَبتُ
الفؤادَ
شوقاً
وشعرا
|
|
ليـتَ
سـترَ
الغيـوبِ
يـؤذن
بـالفر
|
قــةِ
حــتى
أســقيك
حبّـاً
وطهـرا
|
|
أيّ
قلــبينِ
فــي
الصـبابةِ
قلبـا
|
نـــا
ومـــن
أيّ
عـــالمٍ
قدســيّ
|
|
جمعتنــا
علــى
طريــق
الأمــاني
|
ربّــةُ
الــدمع
والبكــاءُ
الخفـيّ
|
|
يـا
شـعاعَ
الصـفاءِ
فـي
أفق
الحبّ
|
ســـلاماً
مـــن
مدلـــجٍ
حيـــران
|
|
فجــرَ
الــدمع
فــي
مــآقيه
حـبّ
|
عبقـــريّ
النـــوال
والحرمـــان
|
|
أي
ديــنٍ
يحـرّم
الـدمع
والشـكوى
|
علـــى
عاشـــقٍ
بـــراهُ
حنينــه
|
|
لا
تلمنـــي
إذا
بكيـــتُ
فقلــبي
|
صـــمتُه
كفــره
ونجــواه
دينــه
|
|
يـا
شـفاه
الحـبيب
إنـك
في
الرس
|
م
ســــرابٌ
وقبلــــتي
ظمـــآنه
|
|
ليتنــي
إذ
نســيته
فيــك
أنسـى
|
عـــبراتي
إمــا
ذكــرتُ
حنــانَه
|
|
أيّ
ســـرٍّ
تطــوى
خفايــاهُ
عنّــي
|
حينمـــا
ألتقيـــك
فـــي
الأحلام
|
|
تنشــرين
الضــياء
ثــم
تغيــبي
|
ن
فلا
تنشــــقينَ
عطـــر
ســـلامي
|
|
صــبواتي
ضــاعت
فــرُدّى
علـىّ
ال
|
يــومَ
مــا
تكنزيـن
مـن
صـبواتي
|
|
واعــذريني
وقــد
بخلـت
إذا
طـا
|
لــت
علـى
نضـرة
الصـبا
حسـراتي
|
|
حلــــف
الكــــافرون
بــــالحُبّ
|
فمـــاذا
أبقـــوه
للمؤمنينـــا
|
|
يـا
فـؤادي
مـاذا
عليـك
إذا
خنت
|
هواهـــا
فلا
تعـــاني
الشــجونا
|
|
ذمّمــوا
مــن
كرهتمــوه
وحيّــوا
|
بالتهاليـــــلِ
ن
تحبّبتمـــــوهُ
|
|
مـا
أرى
العـدل
بينكـم
غيـر
بيتٍ
|
رافعـوه
فـي
النـاسِ
هـم
هـادموه
|
|
حبّـــذا
لــو
جهلــت
أنــيَ
حــيٌّ
|
لأقضــي
الحيــاة
صــافي
الحيـاة
|
|
أنـا
أمشـى
فـي
النـاس
بائع
خبزٍ
|
زاهــداً
فيــه
قانعــاً
بالفتـات
|
|
يا
ضميري
أكلّما
قدّمَ
الدهر
نضاراً
|
دفَعتَـــــــــه
مهتاجـــــــــا
|
|
هَبـه
خلـواً
مـن
السـنا
أفلا
يجمل
|
بــــي
أن
أُنيلــــه
محتاجــــا
|
|
لا
تحــدّث
عــن
النبــوة
والـوحي
|
وحـــدث
عـــن
بــاعث
الأنبيــاء
|
|
لــم
لــم
يجعــل
النـبين
فـرداً
|
ســــرمدي
الكتـــاب
والأنبـــاء
|
|
لا
تقـل
لـي
تطـوّر
الكـون
والكـا
|
ئن
حـــتى
تزيـــد
فــي
تســآلي
|
|
وانطلــق
تبصــر
الوجـود
مثـالا
|
فقـــدت
فيـــه
غيــرة
المثــال
|
|
صـور
الكـائنين
أدعـى
إلى
السخر
|
ســواء
فيــه
الــثرى
والثريــا
|
|
يـا
قـروداً
منقوصـة
الخالق
غيبي
|
لأرى
المـــوت
مســتنير
المحيــا
|
|
أنــا
ســكران
فاعــذريني
إذ
أي
|
قظــت
الكــأس
نــائم
النــزوات
|
|
تــاه
عقلــي
فلا
أقـلّ
مـن
النـس
|
يــان
أجــروه
كـي
يطـول
سـباتي
|
|
غــافليني
وأترعــي
الكـأس
حـتى
|
لا
أرى
الرجــس
فــي
يــد
قدسـيّه
|
|
رب
جمـرٍ
يـا
أخـت
يطفـأ
بـالجمر
|
وحـــي
يحيـــا
بكــاس
المنيّــه
|
|
يـــادموعي
مــاذا
يكفّــك
عنــي
|
أنــا
فــي
مهمـهٍ
فكـوني
غمامـا
|
|
ليـس
فـي
النـاس
مـن
يصاب
فأبكي
|
ه
ولـو
كـان
فـي
التقـاة
إمامـا
|
|
ثــورتي
ثــورة
الجــواد
نفــاه
|
حظّــــه
فــــي
مهـــاجر
البخلاء
|
|
كــم
تمنيّــت
صـفو
يـوم
فلـم
أع
|
ط
ســوى
خيبــتي
وطــول
عنــائي
|
|
إيـه
أشـلائي
الطريحـة
فـي
النـا
|
س
لقــد
كنـت
ملـء
عيـن
الأمـاني
|
|
أولــم
يكــف
هــاجري
أن
كأســي
|
فرغـــت
مـــن
ســلافة
النســيان
|
|
لسـت
أنفـي
ضرورة
الفرق
بين
الن
|
اس
فيمـــا
يعطـــون
مــن
أرزاق
|
|
غيـر
أنـي
أريـد
أن
أسـأل
القـا
|
ســـم
ألّا
يزيـــد
فـــي
إملاقــي
|
|
يــا
إلهـي
أثقلـت
أرضـك
بالنـا
|
س
فنــاءت
ومــا
تطيـق
احتمـالا
|
|
لـم
هـذا
الإسراف
في
الخلق
يا
رب
|
أهــــديا
تريــــدهُ
أم
ضـــلالا
|
|
قيــل
إنّ
الخلــود
للطيّـب
الـذك
|
ر
يــردُّ
الحيــاةَ
بعــد
المَمـاتِ
|
|
نبّئونــــي
أللخلــــودِ
خلـــودٌ
|
ثـــم
داووا
عقــولكم
بالســُبات
|
|
أغــرق
اللَـه
ضـاحكاً
مـن
برايـا
|
ه
يمنّـــون
ميتهـــم
بـــالخلود
|
|
يـا
غـرور
الفـانين
حسـبك
لهـوا
|
وكفــــاهم
مناحـــة
المفقـــود
|
|
سـوف
أطويـك
يـا
ليـاليّ
في
الغي
|
ب
كطـــي
لســـالفات
الليـــالي
|
|
بيـن
كـأسٍ
حمـراء
مـن
نـار
ليلا
|
ي
وشــكى
فــي
عودهــا
للوصــال
|
|
ويــح
مــن
طنــب
الزمـان
عليـه
|
خيمـة
الحـزن
فـي
ربيـع
الشـباب
|
|
تخــذ
الليــل
والمـدامع
والشـع
|
ر
عزاءعــــن
فرقـــةِ
الأحبـــاب
|
|
أنكــري
إن
قــدرت
حــزن
أغـاري
|
دي
وقـد
أنكـرت
الغـرام
الحزينا
|
|
أنـت
كأسـي
فـي
حانة
الحب
والشع
|
ر
فكـــوني
عقلا
أكـــن
مجنونــا
|
|
بيــن
جفنيــك
حانــةٌ
مـن
لحـاظٍ
|
مســكرات
حينــاً
وحينــاً
سـكارى
|
|
بــارك
اللَـه
مـا
بهـا
مـن
كئوسٍ
|
جمَعــت
هــدأةَ
الـدجى
والنهـارا
|
|
عطرينــــي
بطيــــب
أنفاســــك
|
الحمـراءِ
وافنـى
صـبابةً
وعناقـا
|
|
أنـت
حيـرى
بـدَت
لحيران
في
القف
|
ر
فــزادت
شــمس
الهـوى
إشـراقا
|
|
اهــزئي
بالشـقاء
مـادامت
الكـأ
|
س
ومـــا
دام
حبنـــا
فينانـــا
|
|
إنّ
مــن
قــدّر
الشــقاء
علينــا
|
خلــق
الكــأس
والهــوى
نسـيانا
|
|
لا
تلُمنــي
إذا
نقمـت
علـى
النـا
|
س
فقـــد
مضـــّنى
ضــلال
النــاس
|
|
كلّمـــا
داويــتُ
جرحــى
حنونــاً
|
قــــذفوني
بضــــَيعة
الإحســـاس
|
|
سـأل
الطفـل
والـديه
عن
الشيطان
|
فاستضــــحكا
حنانـــاً
وســـخرا
|
|
وهــو
شــرٌّ
لخالــد
قيّـد
العقـل
|
وأخفـــى
تحــت
المخــاوف
ســرّا
|
|
أيّهــذا
الشــيطان
إن
تـكُ
عبـداً
|
فأنــا
اللَــه
خــالق
الشــيطان
|
|
لــم
أدنّــس
نفســي
بخلقــك
إلّا
|
حينمــا
كــت
مــن
بنـي
الإنسـان
|
|
لــك
منّــي
تشــوق
يُرمِــض
الـرو
|
ح
ولـــي
منــك
خالــد
الأعــذار
|
|
آه
مــن
خــافقي
ومــن
أمنيــات
|
غرقـــت
فـــي
مســابح
الأقــدار
|
|
أنــا
كلّــي
منـى
فمـاذا
تمنيـن
|
أجيــــبي
مريــــدةً
لا
مـــرادَه
|
|
إن
أكـــن
معبــدا
فــأنت
إلــه
|
أفرَدَتـــه
خـــواطري
بالعبــاده
|
|
اعـفُ
عنّـي
يـا
رب
إن
ضـاع
عمـري
|
بيـــن
شــكّى
وحرقــتي
وكئوســي
|
|
ليــس
فــي
النـاس
خيـرٌ
وحظـوظي
|
خُبّلَــت
فالســعود
مثــل
النحـوس
|
|
ســبحى
يــا
نجــوم
لِلَــه
ربــي
|
وهـــــو
رب
النجـــــوم
والأفلاك
|
|
إنّ
مـن
لا
يسـبّح
اللَـه
فـي
الكـو
|
ن
بعيــــدٌ
عـــن
ســـاحة
الأملاك
|
|
لا
تقــولي
ســهام
عينــيّ
حمــرا
|
ء
تغنّــى
شــوقا
وتســقى
حمامـا
|
|
إن
عيـــن
الأقــدار
أفتــكُ
إيلا
|
مــاً
علـى
خـافقي
وأمضـى
سـهاما
|
|
عجلـوا
السـير
بالفقيـد
إلـى
قب
|
رٍ
ينـــاديه
تربـــه
والرجـــام
|
|
وترفّــق
يـا
قـبر
إن
كنـت
جوعـا
|
نَ
فمنّـــا
الطعـــامُ
والإطعـــام
|
|
يـا
أبـي
آدم
الحزيـن
علـى
الفر
|
دوس
ترجـو
مـن
غاصـب
الحـقّ
حقّـا
|
|
مـا
الـذي
ضـرّ
لـو
نقمـت
لما
نا
|
لـــكَ
بالإنتحــارِ
كــي
لا
نشــقى
|
|
يـا
لبـاب
الحياة
يا
فنّ
ما
أسعد
|
نــي
إن
أضــعت
فيــك
اللبابــا
|
|
هـم
يقولـون
جـنّ
بـالفكر
والشعر
|
ألا
مــا
أسـمى
الجنـون
الصـوابا
|
|
ســأُريكم
آيــات
فكــري
وشــعري
|
علكــم
ترتضــون
منــي
الغـرورا
|
|
لعنَتنــي
الحيـاة
إن
ضـاع
عمـري
|
خافيــاً
رغــم
رفعــتي
مغمــورا
|
|
أيهــا
الفــارغون
إلّا
مـن
المـا
|
ل
ومـــن
حاشـــد
مــن
الألقــاب
|
|
لا
تظنّـوا
الحيـاة
مـا
تخـرج
الأر
|
ض
فلألاؤهــــا
خــــداع
ســــراب
|
|
إجــر
يـا
نيـل
باكيـاً
فعلـى
أر
|
ضـكَ
تجـري
الحظـوظ
جـوراً
وظلمـا
|
|
حـرمَ
المالـكُ
الأصـيلُ
وعـاف
الـض
|
يــف
مــا
يقتنيــه
أكلاً
وهضــما
|
|
أيهـا
الشـاربون
مـن
كـرمِ
النـي
|
ل
رويـــداً
فالظـــامئون
كــثير
|
|
لكــم
القصــرُ
والبنــاءُ
عليهـم
|
وهــدى
العــدل
بينكُــم
يسـتجير
|
|
وحـدتي
هجـرَةٌ
إلى
الفكر
في
الكو
|
نِ
وكـوني
فـي
النـاس
هجـرة
فكري
|
|
ليــتَ
حبــل
الوجـود
يقطـع
عنـي
|
ليمــدّ
الفنــاء
أســباب
قــبري
|
|
عبــثُ
النــاس
بالصــداقة
ألهـا
|
نـى
عـن
الفكـر
في
حياة
الصداقه
|
|
ليتهــم
قـابلوا
حنـاني
بتَحنـان
|
وخّلـــوا
زورَ
الـــثرى
ونفــاقَه
|
|
أنــا
مـن
عـالم
الأراجيـف
أقبَـل
|
تُ
فمــــن
أيّ
عــــالمٍ
أقبَلـــت
|
|
آه
لـو
كنـت
غيرمـا
أنـت
فـي
قل
|
بـي
ومـن
أنـت
يـا
تـرى
مـن
أنت
|
|
صــرخةُ
الشـكّ
فـي
دمـي
أفزعتنـي
|
فـــأريني
اليقيـــنَ
حتّــى
أراكِ
|
|
أو
فغيــبي
عنّــي
فمـا
أنـتِ
إلّا
|
ردّةٌ
فــــي
خــــواطرِ
النســـاكِ
|
|
أنــا
قدّســتُ
فـي
الغـرامِ
سـناه
|
وخلقـــتُ
النهــارَ
مــن
إظلامِــه
|
|
ليتهـــا
حيـــن
قدّســته
ظلامــاً
|
ســـجدَت
مـــرّةً
علـــى
أقــدامه
|
|
أيّهـا
القـائلون
بالنـار
والجـنّ
|
ة
والحشــر
فــي
غــد
والحســاب
|
|
حســبُكم
أنّكُــم
تخــافون
أوهــا
|
مــاً
وحســبي
بقيّــةٌ
مــن
صـواب
|
|
كِـدتُ
أفنـى
روحـي
وعقلـي
وجسـمي
|
باحثــاً
عــن
مظَنّــةٍ
مـن
حقيقـه
|
|
فــإذا
الكــون
مــن
جمـادٍ
وحـس
|
خـــادعٌ
لا
يزيــل
عنــه
بريقــه
|
|
أيهـا
النـائمون
فـي
غمـرةِ
اللي
|
لِ
أفيقــوا
علــى
ســنا
إشـراقي
|
|
أنــا
روحٌ
مجنّــح
النــور
لـولا
|
ســجن
أرضــي
خلّــدتُ
فـي
الآفـاق
|
|
أنكــروا
الحـبّ
طـاهرا
وأغـاروا
|
بقَنـــاهُم
علـــى
معاقــل
حبّــي
|
|
إنهـا
فـي
السـماء
يـا
قـوم
ديرٌ
|
ناســــكوه
ملائكُ
اللَـــه
ربّـــي
|
|
أيهــا
الأغنيـاءُ
هـل
حـرم
اللَـه
|
عليكــــم
مــــآدبَ
الفاقــــات
|
|
أطعمـوا
البائسَ
الفقيرَ
فإن
جعتُم
|
فعيشــوا
علــى
صــدى
الـذكريات
|
|
حــدّثوني
عــن
آدم
يــوم
ضــاعت
|
مــــن
يَـــديه
قلادةُ
التخليـــدِ
|
|
ليتهـم
حـدّثوا
عـن
المنعـم
الغا
|
صـــبِ
يجــزى
عــتيقه
بــالقيود
|
|
عبــدَ
القبــطُ
ي
صـليبهم
المُبـدَ
|
عِ
ذكــرى
الشـهيد
فـي
أورشـليما
|
|
ربمــا
كـان
فـي
النصـارى
يهـودٌ
|
يحسـبون
الشـهيد
موسـى
الكليمـا
|
|
يـا
إلهـي
المشاع
في
النور
والأن
|
ســام
والـروض
والجمـال
الحنـون
|
|
أنــا
يــا
رب
عابــدٌ
لــك
حـتى
|
فــي
شـكوكي
عبـادتي
فـي
يقينـي
|
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طـاف
بـي
طـائفٌ
مـن
الـوهم
زيّـا
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فٌ
فشــبَّ
النيــران
فــي
أصـغريّا
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وطــوَتني
ذكــراهُ
فـاحتبسَ
الـدم
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عُ
وأصــــلى
بنـــاره
مقلتيّـــا
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أيّهـا
الشـك
يـا
بـن
أيّـام
عمري
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ولَيــاليّ
فــي
الشــقاء
الطويـل
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أنــت
حبّبـتَ
لـي
المنيّـةَ
والقـب
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رَ
فأمســـت
لقياهمـــا
تــأميلي
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خبّلتنـــي
وشــايَةُ
الآثِــم
الــف
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ذِّ
وأفنــت
صــفاء
نفســي
وعمـري
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فليَــشِ
العــالمونَ
أللَــهُ
يـدري
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أنّنــي
مــا
صــنعتُ
غيـر
الخيـر
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بيــن
جنـبيّ
طـائرٌ
فـي
السـماوا
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تِ
ولكنّــــهُ
كســــيرُ
الجنـــاح
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كلمّـــا
رفــرف
النســيمُ
عليــه
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ظـــنّ
فيـــه
تنهّــدات
الريــاح
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يــا
صــديقي
أبــا
العلاءِ
سـلاماً
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رطّـــب
اللَــه
نفحــهُ
بــالودادِ
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أنــت
أُنسـي
فـي
وحشـتي
ويقينـي
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فــي
شـكوكي
ويقظـتي
فـي
رقـادي
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فلســفاتُ
الأنغــامِ
أعمــق
غـوراً
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فــي
خيـالي
مـن
فلسـفات
الأنيـس
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وهــي
خرســاءُ
ليــس
تنطــقُ
إلّا
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بلُغــــاتٍ
مــــن
أرجـــلٍ
ورءوس
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أيّهــا
الســامرُ
الملـوّحُ
بـالنش
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وَةِ
مــن
ســكره
بخمــر
الأغــاني
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إبــكِ
مثلــي
علــى
أغـانٍ
تلاشـَت
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فــي
حنايــا
الصــدور
والأفنـان
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قـــال
شــيخٌ
لزوجــه
ذات
يــوم
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داعيــاً
صــانك
الإلــه
القــدير
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فتَـــوالى
دعاؤُهـــا
أن
تـــراهُ
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مثلمــا
كــان
والشــباب
نضــير
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بينمــا
كنـت
سـائراً
فـي
طريقـي
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إذا
بشــيخٍ
قــد
حطّمتـه
السـنون
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قلــت
يـا
شـيخُ
هـل
سـئمت
فعيّـت
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شـــفَتاهُ
وجـــاوبتني
العيـــون
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قــال
لـي
ميّـتٌ
يسـيرُ
بـه
النـا
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سُ
أرحنـــي
مــن
ضــجّة
الأحيــاء
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قلــتُ
هـل
أزعجتـكَ
نائحـةُ
القـو
|
مِ
وفــي
نوحِهــا
حيــاةُ
الفنـاء
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قلــت
يومــاً
لشـاعر
أنـت
مثلـي
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قـال
فـي
الحظ
قلت
بل
في
الأماني
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قــال
يـا
صـاحبي
معانيـك
مثلـي
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قلــت
لا
قـال
فـالمُنى
كالمعـاني
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صـمتُ
يومـا
عـن
الطعـام
فمـا
جع
|
تُ
لأنـــي
أردتُ
هـــذا
الصــياما
|
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وأكلــت
الطعــام
يومــا
بلا
شـو
|
ق
فمــا
زلــتُ
لا
أحــبّ
الطعامـا
|
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قــال
نـثرى
يومـا
لشـعري
سـلاماً
|
يــا
أخـي
يـابنَ
والـدي
ووليـدي
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فــردَدتُ
الســلام
شــعراً
فــألقى
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فــوقَ
وجهــي
الســلام
كـالمردود
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قلـــتُ
يومـــا
لطــائرٍ
عبقــريّ
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هـــل
تمنّيــتَ
مــرّة
أن
تطيــرا
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فـرأى
فـي
الجـواب
عـبئا
يسـيرا
|
لـــم
يكلـــف
جنــاحه
تفكيــرا
|
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عجمتنــي
الأيــام
طفلا
فمـا
لنـت
|
لأنّــي
مــا
كنــت
أدري
الهمومـا
|
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ثــم
شــاءَ
الزمــان
أن
يتمنــى
|
فتمنّــــى
لعـــوديَ
التحطيمـــا
|
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برحَــت
بــي
الآلام
يومــا
فـأعول
|
تُ
كـــأن
الآلام
بنـــت
الخلـــود
|
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ليتنــي
مـا
خلقـت
أوليـتَ
نفسـي
|
خلِقَـــت
مــن
حجــارة
أو
حديــد
|
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بـتُّ
ليلـى
مسـهّدا
بعـد
أن
أنـبئ
|
تُ
أنـــى
مســافر
فــي
الصــباح
|
|
أترانـــا
نعصــى
لأنّــا
جهلنــا
|
أن
للمـــوت
موعـــداً
كــالرواح
|
|
حـــدّثونا
عــن
ابــن
آدم
لمــا
|
قتلتــه
الأحقــاد
مــن
هــابيلا
|
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ليتهــم
حـدثوا
عـن
القاتـل
الأخ
|
رق
يبكـــى
شـــقيقه
المقتــولا
|
|
مكــث
الفيلســوف
خمســين
عامـا
|
باحثـــا
عــن
حقيقــة
لحيــاته
|
|
ورأى
النـــاس
بحثـــه
فرمـــوه
|
بــالجنوه
المشــاع
فـي
خطراتـه
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|
مــا
تكـونين
يـا
أمـاني
شـبابي
|
وأنــا
مــن
أكــون
بيـن
صـحابي
|
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أنـت
ذاتـي
المجهولـة
الذات
عني
|
وأنــا
منــك
مثـل
لمـح
السـراب
|
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كــان
عنــدي
خدامــة
كايَــدَتني
|
ذات
يـــوم
فمزّقَتهـــا
عصـــايا
|
|
ثــم
غمغمــت
أعــذر
اللـه
لمّـا
|
طــرد
الجــدّ
لارتكــاب
الخطايـا
|
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بيــن
عيشــي
وبيـن
مـوتي
فـروقٌ
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هـــي
عنــدي
يســيرةُ
العرفــان
|
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غيــر
أنــي
أرى
حيــاتي
هــانت
|
وهـــوان
الحيــاة
ســرّ
هــواني
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وهـــب
اللــه
لابــن
آدم
أرضــا
|
باركتهـــا
الســـماء
بالأمطــار
|
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وأرى
الأرض
لــم
تكــن
غيـر
قـبر
|
جمّلتــــه
الأقـــدار
بالأشـــجار
|
|
يـا
يـد
اللَـه
باركي
في
يد
الفت
|
نـــة
ســـهماً
مجنّحـــا
دمويّــا
|
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لـم
يـدع
فـي
جـوانحي
نبـع
حـزن
|
لـــم
تفجّــره
بالبكــاء
شــجيّا
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