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عواطــف
هــذا
القلــب
مختلفــاتُ
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ولكنهـــا
فــي
الحــب
مؤتلفــات
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إذا
بـرزت
شـتى
المذاهب
في
الورى
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فليــس
لهـا
يـا
هنـد
فيـك
شـتات
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يُوحِّــدُها
الــوجه
الوضــيءُ
كـأنه
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سـنا
الفجـر
منـه
تهـرب
الظلمـات
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تبـاين
إلّا
فـي
الهـوى
الخلـقُ
أنه
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عليـــه
نفــوسُ
الخلــق
متفقــات
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ومـا
هـو
إلا
الشـمسُ
والناس
حولها
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أَشــعتها
فــي
الكــون
منفرعــات
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إلا
أن
حــــبي
روضـــة
مســـتقلة
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معـاني
الهـوى
أزهارُهـا
النضـرات
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وأنَّ
شــذاها
مــا
أقــول
عـواطفي
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وهـنَّ
المنـى
تسـري
بهـا
النفحـات
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وتشـرب
مـن
دمعـي
وتشـرب
مـن
دمي
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فـــتروي
بهـــا
الأغصــانُ
والأثلات
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وفــي
كــل
يــوم
زهــرةٌ
وخميلـةٌ
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فحــتى
مــتى
لا
تُعقــدُ
الثمــرات
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أَشــادية
تلــك
الطيــورُ
ســعادةً
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فــإن
الأمــاني
تلكــم
النغمــات
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بلــى
هتفــت
حزنـاً
أَثـار
شـجونَه
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جــوىً
لــم
تُــبرِّد
نــاره
عـبرات
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وأَتقلُ
ما
في
الحزن
أن
يعصي
البكا
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وتزدحـــم
الأشـــجانُ
والزفـــرات
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بهنـدٍ
وحبيهـا
إذا
الـذكر
عـادني
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تكــاد
بقلــبي
تــذهب
الخفقــات
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وكنـــا
حفيلاً
إنســـنا
بتجـــاور
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ولهـــو
بـــه
ســاعاتنا
بركــات
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إذا
مــا
تواقفنـا
يسـارق
لحظنـا
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أحـــاديث
حـــبٍ
كلهـــا
ســرقات
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ونلبــث
مــذعورَين
نحســب
أننــا
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ضـــللنا
وأن
العـــالمين
هــداة
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ومــا
النــاس
إلا
مفسـدون
وكلمـا
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تولّـوا
بـأن
يحيوا
الصواب
أماتوا
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وكـم
موعـدٍ
وافيـتُ
يـا
هند
وافياً
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تنــمُّ
علــى
حــبي
بــه
الخطـوات
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تلاقيننــي
ملــءَ
الجوانــح
لهفـةً
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وتملأُ
قلـــب
النـــاظر
اللهفــات
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وتنســين
أن
النـاس
ترقبنـا
لـذا
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نمــر
فــتىً
تمشــي
إليــه
فتـاة
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نســير
لهوينــا
غــافلينِ
وإنمـا
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تحلّـــي
أمـــانيَّ
الصــبى
الغفلات
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وكــم
شـهدت
تلـك
المسـالكُ
حبنـا
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وتكــل
القصـور
الـبيضُ
والنزهـات
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وجـار
مـن
النيـل
المبـارك
ضـاحكٌ
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تمـــد
عليـــه
ظلهــا
العربــات
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تخـــفُّ
لـــديه
راكضـــاتٍ
كــأنه
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ســـرابٌ
عليــه
تركــض
الظبيــات
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ونحــن
بإحــداهنَّ
طــار
فؤادُنــا
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غرامــاً
وقــد
طـارت
بهـا
العجلات
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جــرت
فكأَنّــا
فـي
الفضـاء
وهـذه
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هـــي
الأرضُ
تجـــري
والهــوءُ
فلاة
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وحبّــيَ
دنيــا
أنـتِ
فيهـا
سـعيدةٌ
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وحبــكِ
لــي
دنيــا
بهــا
حظـوات
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شــكوتُ
إليــكِ
البـث
وهـو
محبـتي
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فاشــكيتني
كيمــا
تــزول
شــكاة
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وأدنيتنــي
حــتى
اتحـدنا
صـبابةً
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وذاب
فؤادانـــــا
ولا
شـــــبهات
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حــديثٌ
كنشــر
الـروض
غـب
سـمائه
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وألفاظُـــكِ
الأنـــداءُ
منتـــثرات
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إذا
نظــرت
عينــاكِ
همــتُ
صـبابةً
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فللَـــه
ممـــا
تفعــل
النظــرات
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وارشــف
مـن
فيـكِ
الحيـاة
وإننـي
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تطيـــلُ
حيــاتي
هــذه
الرشــفات
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ويُثنــى
علـى
كتفـي
ذراعـكِ
ليِّنـاً
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هـو
العـاجُ
لـولم
تجـرِ
فيـه
حياة
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يضـــرج
خــديك
الحيــاءُ
طهــارةً
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وتســحرني
مــن
ثغــرك
البســمات
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تفـوحين
طيبـاً
نـادر
العرف
منعشاً
|
إذا
عبثــت
فــي
شــَعركِ
النسـمات
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فـالثم
مـا
اسـترخى
علـيَّ
وأنثنـي
|
وبــي
مــن
غــوالي
نشـره
سـكرات
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كــذلك
كنــا
ثــم
نرجـع
والحشـا
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بــه
للتلاقــي
فــي
غــدٍ
حســرات
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طـوى
ذلـك
العهـد
الزمـانُ
وباغتت
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حـــوادثُ
دنيـــا
كلهــا
نكبــات
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كـأَن
لـم
يكـن
شـيءٌ
هنـاك
وهكـذا
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تبـــدد
أَحلامَ
الـــدجى
اليقظــات
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أطــاول
أيــامي
لعلـي
أرى
الـتي
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مضـــت
وأناديهـــا
وفــيَّ
خُفــاتُ
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أجيــبي
أحقّـاً
لا
تعـودين
وانظـري
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ففينــا
تمــادت
بعــدك
العـثرات
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ألا
أحســني
بــل
لا
تسـيئي
وإنمـا
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أنلــتِ
وإن
قَّلــت
لــك
الحســنات
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أتمـي
صـنيعاً
واغنمـي
أجـره
فقـد
|
مـــررت
ولمــا
تنقــض
الرغبــات
|
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محــالٌ
رجـوع
العمـر
بعـد
زوالـه
|
ومــا
حَييــتِ
بعـد
الممـات
رفـات
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إلـى
مَ
إلى
مَ
العيشُ
والحب
قد
مضى
|
وفيــمَ
وفيــمَ
البــؤسُ
والحسـرات
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