|
أطغــت
عبــاد
اللَـه
وهـي
عبيـد
|
فــالأرض
مـن
ثقـل
الـذنوب
تميـد
|
|
قـد
صـار
عالمهـا
الجديـد
بليـةً
|
يـا
ليـت
ماضـي
العـالمين
يعـود
|
|
ويلاه
لا
إيمـــــانهم
مســــتحكمٌ
|
فيهـــم
ولا
وجـــدانهم
موجـــودٌ
|
|
لـم
يبـق
عـن
كـذب
المقال
كمائم
|
لهــم
وعــن
قبـح
الفعـال
قيـود
|
|
كـم
يـدعون
العـدل
فـي
زمـن
جرى
|
للعـــدل
فيـــه
مــأتم
مشــهود
|
|
هـم
أضـرموا
الحرب
التي
من
شرها
|
قـد
كـاد
ينقـرض
الـورى
المنكود
|
|
أمــم
البريـة
قـد
أظـل
جموعهـا
|
فـي
الغـرب
أفـق
غيمـه
البـارود
|
|
بيــض
وسـود
فـي
الصـفوف
كـأنهم
|
ســــبجٌ
ودر
والصـــفوف
عقـــود
|
|
يتــذامرون
علـى
الفنـاء
كأنمـا
|
طمــس
الخليقــة
مــأرب
مقصــود
|
|
فــي
كــل
صــوب
للحـراب
بـوارقٌ
|
أو
للمــدافع
فـي
السـماء
رعـود
|
|
أقصــمت
مــا
شـبح
يولـح
لنـاظرٍ
|
إلا
ســـــلاح
لامـــــع
وجنــــود
|
|
فـالأرض
أشـرقها
الدم
الجاري
كما
|
خنــق
السـماء
دخانهـا
المعقـود
|
|
فتحـوا
جهنـم
وارتمـوا
في
نارها
|
مــن
قبــل
أن
يرميهـم
المعبـود
|
|
نــارٌ
لـو
أن
اللَـه
لـم
يتلافهـا
|
أكــل
الوجـود
لسـانها
الممـدود
|
|
هــي
حــرب
تـدمير
ومحـو
مالهـا
|
بيــن
الحــروب
السـالفات
نديـد
|
|
طــالت
فمـات
قتيلهـا
فـي
حينـه
|
وكــذاك
مــات
أسـيرها
المصـفود
|
|
جمـدت
لهـا
الـدنيا
فما
حركاتها
|
وابيـــك
إلا
الزحــف
والتجريــد
|
|
وتعطلــت
كــل
المشــاغل
عنـدها
|
فالشــغل
فــي
أعبائهــا
محـدود
|
|
نبغـوا
بإنبـاط
الـردى
وتفننـوا
|
وتوافـــق
التوليــد
والتقليــد
|
|
مــن
جــر
تهلكــة
وأيتـم
إلـدةً
|
لأخيــه
فهــو
النــابغ
المعـدود
|
|
وتــوحش
البشــر
الأنيــس
كأنمـا
|
أبنــــاء
آدم
أضـــبعٌ
وفهـــود
|
|
فغـدت
مخالبهـا
السـلاح
المنتضـى
|
وغـدا
الوجـار
الخنـدق
المخـدود
|
|
يمشـي
المقاتـل
في
العراء
وجلده
|
أبـــداً
بريـــحٍ
شــمأل
مجلــود
|
|
ولقــد
يكــون
مـبيته
فـي
خنـدق
|
وفراشــه
تحــت
الســماء
جليــد
|
|
وأمــامه
القتلــى
فــراش
طـائر
|
عـــن
منكــبيه
وســاعد
مقــدود
|
|
والجــو
نــار
والكــرات
صـواعق
|
والقتــل
جــرف
والصــياح
فديـد
|
|
فكــأن
جـرم
الأرض
مخسـوف
الـثرى
|
وكــأن
بنيــان
الســما
مهــدود
|
|
كـم
مـن
رحيـم
القلـب
أسلم
أهله
|
للجــوع
حيــن
اضــطره
التجنيـد
|
|
أجليـــدة
أم
البنيــن
وعنــدما
|
طفــل
يـبيت
علـى
الطـوى
ووليـد
|
|
يـا
حسـرة
تلـك
الجـوازل
خانهـا
|
رغــد
المعيشــة
والهـديل
بعيـد
|
|
فرغــت
حواصــلها
وأنسـل
ريشـها
|
ثــم
اعتراهــا
بعــد
ذاك
همـود
|
|
هـذا
جنـاه
بنـو
التمدن
فاعجبوا
|
كيـــف
التمــدن
متلــف
ومبيــد
|
|
زعمـوا
القتـال
لأجل
منفعة
الورى
|
دعــوى
تقــال
ومـا
هنـاك
شـهود
|
|
قــد
صـوروه
مطـرةً
تحيـي
الـثرى
|
والنبـت
مـن
بعـد
القطـار
يجـود
|
|
فـإذا
الـثرى
قـد
هـار
حـتى
أنه
|
لــم
يبــق
منــه
للنبـات
صـعيد
|
|
أو
ليـس
شـبان
الزمـان
هم
الأولى
|
أفنــت
سـوادهم
المنايـا
السـود
|
|
أســفاً
بفاتحــة
الحيـاة
تفتحـت
|
فــي
الـترب
أرمـاس
لهـم
ولحـود
|
|
ويـل
الأولـى
جـروا
إليهـم
حتفهم
|
أن
النكيـــر
عليهـــم
لشـــديد
|
|
حرمـوا
البريـة
عونهـا
وعتادهـا
|
فــالكون
منهــوك
القـوى
مجهـود
|
|
وكـذا
السـوا
عـدان
غـدت
مبتورة
|
لــم
تغــن
عنهــا
أعيـن
وخـدود
|
|
لـو
كـان
فتيـان
الخليقـة
بيننا
|
مـا
كـان
هـذا
الضـنك
والتنكيـد
|
|
جلـب
الخـراب
إلـى
البسيطة
كلها
|
أهــل
الرئاسـة
والملـوك
الصـيد
|
|
عجبـاً
لرهـط
قومـوا
أمـم
الـورى
|
وهـم
علـى
الفـرش
الـوثير
قعـود
|
|
العصـر
عصـر
الموبقـات
وإن
بـدا
|
فــي
عينــك
التحسـين
والتجويـد
|
|
لا
تخـــدعنك
للجنـــازة
زينـــة
|
تحــت
القطيفــة
والحريـر
صـديد
|
|
منـوا
عليهـا
أنهـم
وهبـوا
لنـا
|
مدينـــةً
نعلـــو
بهــا
ونســود
|
|
مدينـــة
أضـــحت
لنــا
نديمــةً
|
قولـوا
لهـم
لا
كـان
هـذا
الجـود
|
|
ردوا
إليكــم
كــل
مــا
أعطيتـم
|
إن
الرديــــء
لأهلـــه
مـــردود
|
|
فســدت
طبـاع
العـالمين
وأخلقـت
|
حلــل
الفضــائل
والزمـان
جديـد
|
|
وتأصــل
الكــذب
الصــميم
كـأنه
|
وأبيــك
مــع
مولــودهم
مولــود
|
|
لا
عنــدهم
شـرف
الحفـاظ
ولا
لهـم
|
قـــول
بمــا
هــم
وادون
أكيــد
|
|
لــو
كــان
عاصـرهم
لبيـدٌ
برهـةً
|
يـا
ليـت
شـعري
مـا
يقـول
لبيـد
|
|
دفنـوا
الضـمائر
في
حفائر
بغيهم
|
لا
لـــوم
يأخـــذهم
ولا
تفنيـــد
|
|
فـالظلم
فـي
كنـف
الحضـارة
رائع
|
والعـدل
فـي
قفـر
القفـار
شـريد
|
|
كـــل
الوجــود
طماعــةٌ
وخلابــة
|
وجــزاء
مصــطنع
الجميــل
جحـود
|
|
والناس
قد
خاضوا
الفواحش
فارتمى
|
فيهــا
فتــاهم
والفتـاة
الـرود
|
|
فشــت
الـدعارة
والزعـارة
جهـرة
|
والحــاكمون
علـى
العبـاد
رقـود
|
|
يـا
أيهـا
العظمـاء
سـواس
الورى
|
أفمــا
بكــم
حـر
الخصـال
حميـد
|
|
أغرقتــم
الثقليـن
فـي
أطمـاعكم
|
تلــك
الخضــارم
مـا
لهـن
حـدود
|
|
حركتــم
الــدنيا
بمــا
أحـدثتم
|
أفمــا
لهـا
حـتى
المعـاد
ركـود
|
|
ي
كـــل
وجـــه
فتنــةٌ
مشــبوبةٌ
|
أفمــا
لتلــك
النــائرات
خمـود
|
|
مـا
أكـثر
الحمقـى
فهم
قد
عكروا
|
وغـدا
سـواهم
فـي
الغـدير
يصـيد
|
|
يرجـو
بكـم
دفـع
الخطوب
وقد
نرى
|
إن
الخطــوب
مــع
الزمـان
تزيـد
|
|
وخلافكـــم
أصـــل
البلاء
وســـره
|
هـــذا
يخــرب
حيــن
ذاك
يشــيد
|
|
لـو
كـان
نصـر
الحـق
من
غاياتكم
|
جمــع
الشـتات
المطلـب
المنشـود
|
|
وعنــت
لكـم
كـل
الشـعوب
فإنمـا
|
شـــأن
الخلائق
قـــائد
ومقـــود
|
|
كـم
تطـرئون
العـدل
فـي
كلماتكم
|
والعــدل
أجمــع
عنــدكم
مفقـود
|
|
هــذي
القلادة
قـد
وصـفتم
حسـنها
|
حـــتى
عرفنــاه
فــأين
الجيــد
|
|
أكــثرتم
رقــم
العهــود
فإنمـا
|
قـــد
كلــت
الأقلام
وهــي
حديــد
|
|
كــم
مــن
رقيـم
أصـبحت
فقراتـه
|
عبثــاً
كــأن
العهـد
فيـه
قصـيد
|
|
إن
كنتــم
أخفرتـم
مـا
قـد
مضـى
|
مهلاً
فمـــاذا
ينفـــع
التجديــد
|
|
العهــد
كالقــانون
يقبـح
نقضـه
|
وكلاهمـــا
فـــي
بــابه
تقييــد
|
|
فـإذا
وهـي
قيـد
المـروءة
بينكم
|
فــالخلق
فوضــى
والـدمار
عتيـد
|
|
كــم
قــد
سـمعتم
للقـوي
جـداله
|
فــي
الأمــر
وهــو
مكـابرٌ
مريـد
|
|
ثــم
احتقرتــم
للضــعيف
مقـاله
|
مــن
غيــر
ذنـبٍ
والمقـال
سـديد
|
|
بالسـيف
تمتنـع
الحقـوق
وتحتمـي
|
والقــول
دون
الصـول
ليـس
يفيـد
|
|
فـاعلم
طبـائع
أهـل
عصـرك
إنمـا
|
هــذا
لهــا
التعريـف
والتحديـد
|
|
مـا
زال
فـي
البشر
الضعيف
معاشر
|
ســنن
الهدايــة
دونهــم
مسـدود
|
|
لا
بــد
يصـحو
النـاس
كـل
النـاس
|
ســكر
الضــلال
ويحطــم
النـاجود
|