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ســـواءٌ
يكــف
الــدمع
أم
يتصــبب
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فــؤادي
بحكــم
الحــالتين
معــذب
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رقـا
الـدمع
مـن
عينـي
والهم
ثابتٌ
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إذا
انجــاب
منـه
غيهـبٌ
جـن
غيهـب
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ســترث
عـن
الأبصـار
باديـة
الجـوى
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وهــل
يملــك
الأنفــاس
صـدرٌ
مغلـب
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وأدرجـت
سـري
فـي
جنـاني
فلـم
تزل
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تنــــم
عليـــه
جمـــرة
تتلهـــب
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لقــد
دوخــت
عزمـي
وأفنـت
تجلـدي
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كتــائب
مــن
جنــد
الأســى
تتكتـب
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فمـا
عـاج
سـلوان
علـى
ربـع
مهجتي
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وللحـــزن
فيـــه
ســاكن
لا
يرحــب
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غـدا
الصـبر
عنـدي
وهـو
زعـم
مفندٌ
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وقـد
ينكـأ
الجـرح
القـديم
المطبب
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أجــل
طرقتنــا
الحادثــات
بنكبـةٍ
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ونــاح
بوادينــا
الهـزار
المطـرب
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عشــية
لــم
نخــش
الزمـان
وصـرفه
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ولـم
نـدر
مـا
كـن
القضـاء
المغيب
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عشــية
رحنــا
كــل
يــوم
وليلــةٍ
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نجـــرر
أذيــال
الأمــاني
ونســحب
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فــوا
كمــداً
لمــا
تــولى
محمــدٌ
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محـا
اليـأس
مـا
حط
الرجاء
المحبب
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لعمــرك
جهــد
النائبــات
مصـابنا
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فــــأي
مصـــاب
بعـــده
نتجنـــب
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فمــن
مبلــغ
الأقــوام
أن
بخطبنـا
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قـد
انفـل
مـن
سـيف
النـوائب
مضرب
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مضـى
طرفـة
الدهر
الذي
غاله
الردى
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بـداراً
كمـا
يهـوي
مـن
السعد
كوكب
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مضـى
زينـة
الشـرق
الـذي
عند
ذكره
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ترنـــح
للشـــرقي
عطـــف
ومنكــب
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مضـى
عمـدة
القـوم
الـذي
شـد
أزره
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بــه
العربــي
المحــض
والمتعــرب
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كريـمٌ
بنـى
المجـد
الأثيـل
مجاهـداً
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وكــم
يقتـل
المجـد
الأثيـل
وينكـب
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مــآثره
الشــماء
فــي
كــل
غايـةٍ
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علــى
هامــة
التاريـخ
تـاج
مركـب
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لــه
فـي
مجـال
الفضـل
بنـد
مشـهر
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وفــي
طــرق
العليــا
منـارٌ
منصـب
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ودون
خطــاه
فــي
المحامــد
شــقة
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تشــق
علــى
أهــل
الكمـال
وتصـعب
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تـدرب
فـي
الأعبـاء
مـن
بـدء
عمـره
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ويــا
حبـذا
غصـن
الشـباب
المـدرب
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وســـاد
بـــأخلاقٍ
حســـانٍ
كأنهــا
|
أزاهــر
غاداهــا
مـن
القطـر
صـيب
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هـو
البحـر
فـي
أي
المعـاني
أردته
|
تحيــرت
فــي
أي
المنــاقب
تطنــب
|
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منــاقب
لــو
رام
المعــرف
وصـفها
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لقـــل
لـــديه
الجــوهري
وثعلــب
|
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فيــا
عصــبة
النــواب
هلا
ذكرتــم
|
أخــاكم
إذا
صــر
اليـارع
المشـطب
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لـه
الخـاطر
والوقاد
والحكمة
التي
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بأكنافهـــا
روض
الأمـــاني
مخصــب
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روى
الـبرق
منعـاه
فأصـعق
بالنبـا
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يــدك
مــن
الصـبر
الجميـل
ويحـزب
|
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بليــلٍ
مــن
الأشــجان
ضــاوٍ
هلالـه
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وعقــد
الثريــا
دمعــه
المتصــبب
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كـأن
السـماك
الرامـح
اعتقل
القنا
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لثـأر
أخ
والنسـر
فـي
الجـو
مـوكب
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كـأن
بنـي
نعـش
علـى
نعـش
مـن
ثوى
|
نــوائح
ترثــي
المكرمــات
وتنـدب
|
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كــأن
بشــير
الصــبح
أجفـل
رهبـةً
|
مـــن
الأرض
يــدنو
تــارةً
وينكــب
|
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كــأن
عبــوس
الأفــق
يلطــم
خــده
|
فلا
عليـــه
أحمــر
اللــون
أصــهب
|
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كـأن
الضـحى
قـد
شـق
جلبـابه
أسـى
|
فلــم
يــدر
أنــي
بعــده
يتجلبـب
|
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كــأن
زفيــر
القــوم
صـار
ضـبابةً
|
أنـاقت
علـى
الغـبراء
الجـو
أكهـب
|
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غـداة
اختـتى
بالنطق
من
كان
ناطقاً
|
وأعجــم
بالإنشــاء
مـن
كـان
يعـرب
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طوى
اللحد
من
آثاره
الغر
ما
انطوت
|
تشـــرق
مـــا
بيــن
الملا
وتغــرب
|
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بكنــه
الأدانــي
والأقاصـي
وأقبلـت
|
علـى
رمسـه
الأحيـاء
في
الموت
ترغب
|
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تســـيل
مــآقيهم
بنــار
شــجونهم
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وبالنــار
ينشــق
الســحاب
ويسـكب
|
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شــهيد
حفــاظٍ
رام
إيفــاء
عهــده
|
فــأرداه
تيــارٌ
مـن
الحتـف
يزعـب
|
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وكــان
لـه
عـن
حومـة
الشـر
معـدلٌ
|
لــو
أن
التــوقي
مـا
يحـب
ويطلـب
|
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جـزى
اللَـه
مـن
صبوا
الدماء
بفتنةٍ
|
يضــج
لهـا
الـدين
الحنيـف
ويغضـب
|
|
إذا
مــا
أضــل
اللَــه
أحلام
معشـرٍ
|
فــاعجم
لفــظٍّ
مــا
يقـول
المـؤنب
|
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لقـد
وجـدوا
الدسـتور
لدناً
وفاتهم
|
بــأن
ختــام
الرمــح
نصــلٌ
مـذرب
|
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فـــدونهم
جنـــداً
كآســاد
بيشــةٍ
|
يفتـــش
عمــن
قــد
بغــى
وينقــب
|
|
كـأن
الـثرى
لـم
يـرض
مـس
دمـائهم
|
فــدار
علــى
الأعنــاق
حبـل
مكـرب
|
|
فلا
تعـــش
الأحـــرار
إن
دفـــاعهم
|
عــن
الحــق
مـا
فـي
شـأنه
مـتربب
|
|
حمالــك
يــا
رب
الحصــافة
مصـطفى
|
وكيــف
بحكــم
مــا
عليــه
معقــب
|
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وعزمــك
فــي
كــل
النـوازل
وافـرٌ
|
وعــودك
فــي
كــل
المجــامر
طيـب
|
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لئن
دهــم
الــرزء
الـذي
جـل
جلـه
|
فــأنت
فتــاه
والعــذيق
المرجــب
|
|
مـن
الحامل
الخطب
الجسيم
الذي
عرا
|
إذا
كــل
عنــه
الأحــوذي
المجــرب
|
|
ومــا
نكـد
الـدنيا
جديـداً
وإنمـا
|
يجــد
علــى
مــر
الســنين
ويقشـب
|
|
فحــتى
م
نغــري
بالأصـائل
والضـحى
|
ونــذهل
عــن
ســاجي
الظلام
ونضـرب
|
|
يـود
الفـتى
طـول
الحيـاة
ولو
غدا
|
علــى
الجمـر
مـن
أتراحهـا
يتقلـب
|
|
سـقى
اللَـه
محبـوب
الرخاء
فلم
يكن
|
علــى
بــابه
فـي
العـالمين
مخيـب
|
|
ســتبقى
عظـات
الكـون
مغلقـةً
لنـا
|
ولـو
أسـهب
الشـرح
الزمـان
المؤدب
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