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خـذا
حيـث
أمـت
عاديات
السوانحِ
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وكونـا
ببعـدٍ
عـن
بوار
البوارحِ
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وإن
جزتمـا
روضـاً
صـَباه
تنفّسـت
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بــألطف
أنفــاسٍ
وأزكــى
روائح
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فعوجــا
علــى
أفيـائه
وعيـونه
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ومـا
سـال
منها
فوق
تلك
الأباطح
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فــذلك
وادي
جلّــق
مــن
ترفّعـت
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فضــائلها
عـن
كـلّ
مثـنٍ
ومـادح
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ولا
ســيّما
لمّـا
تسـامت
بروجُهـا
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بأكمـل
بـدرٍ
فـي
سما
الفضل
لائح
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فبـاهتٌ
بـه
الأفلاك
طـراً
فأصـبحت
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جميـع
الـورى
تثني
عليها
بصالح
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وقـد
رقصـت
فيهـا
جواري
مياهها
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بجنــك
ودف
عنـد
لحـن
الصـوادح
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ولـم
لا
وقـد
فـازت
بـأكرم
نازلٍ
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وأعــذب
بحــرٍ
بالفضـائل
طافـح
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يقيســونه
بــالبحر
جهلاً
بفضـله
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وهـل
يستوي
العذب
الفرات
بمالح
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تسـربل
جلبـاب
الكمـال
فلم
يدع
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طريقـاً
لأقـوال
العـدوّ
المكاشـح
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وقـد
بـات
نجمـاً
للهداية
ثاقباً
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رفيعاً
ويعلو
النجم
عن
نبح
نابح
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جوادٌ
جرى
في
حلبة
الفضل
فانتهى
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إلـى
قصـبات
السبق
قبل
الجحاجح
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إذا
هــزّ
خطّــي
اليـراع
عـدلته
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بخيـر
سـماكٍ
فـي
الكـواكب
رامح
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وقـد
سـاد
مـن
سادوا
بخفّة
روحه
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وميــزان
لــبٍّ
بالمكـارم
راجـح
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وكـفٍّ
تكـفّ
الفقـر
عـن
كـلّ
بائسٍ
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وتسـخو
بهـا
كفّ
البخيل
المصافح
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سـحاب
نـدى
يُستصغر
البحرُ
عندها
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ويفنـى
بها
دمع
العيون
النواضح
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فيا
أيّها
المولى
الّذي
شاع
فضله
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وبــات
كفجــرٍ
فـي
البريّـة
لائح
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أهنّيــك
بـل
نفسـي
أهنّـي
لأنّنـي
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بلقياك
قد
زال
الجوى
من
جوانحي
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فـأهلاً
وسـهلاً
مرحبـاً
خيـر
قـادمٍ
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قـدمت
ففزنـا
بـالمنى
والمنايح
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ونافقنـا
الـدهر
الخؤون
فجاءنا
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ذلـولاً
ضـئيلاً
جانحـاً
غيـر
جامـح
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ويـا
طالمـا
قـد
عضّنا
منه
ناجذٌ
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رمـى
اللـه
أنياباً
له
بالقوادح
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ومـا
انفـكَّ
إلّا
والقريحة
كاسمها
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وحــدّ
ظُبــاه
جــارحٌ
لجــوارحي
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فســامح
محبّـاً
حـال
دون
قريضـه
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جريــض
عـراه
بـارك
غيـر
نـازح
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فمثلـك
مـن
يبـدي
الجميل
تكرّماً
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ويسـتر
بالحسـنى
وجـوهَ
القبائح
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