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لـك
السـعد
أسـعد
يا
صبا
ما
المشامُ
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أنفــحُ
خزامــى
فــاح
أم
ذا
بشــامُ
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فهــل
عــن
ربيــعٍ
بالأطـايب
جئتنـي
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فطــاب
بهــا
مصــر
الفــؤاد
وشـام
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فبــالله
خبّــر
بالحقيقـة
يـا
صـبا
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لـك
الخيـر
مـا
هـذي
الـبروق
تُشـام
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هـل
ابتسـمت
بالبشـر
غادقـةُ
الهنـا
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أو
افـــترّ
ثغــرٌ
أو
أديــر
مــدام
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فقــال
نعــم
أوقــات
سـعدك
أشـرقت
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ومنهــا
تــراءى
البـدر
وهـو
تمـام
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وفيــه
صــفت
عكّارنــا
حيـث
أصـبحت
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لهــا
فـي
علا
السـعد
الكـبير
خيـام
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ولاحـت
بهـا
شـمس
السـعود
لمـن
غـدا
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عليّــاً
لــه
ســعد
الســعود
مقــام
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ومـا
نـور
هـذي
الشمس
عندي
سوى
جُدَا
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أيــادٍ
تفيــض
الجــود
وهــي
غمـام
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أيــادٍ
أرتنــا
كفَّهــا
خيــرَ
راحـةٍ
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لإحيــا
مــواتِ
الفضــل
وهــي
رِمـام
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قصـوري
ببـاب
المـدح
قـد
سـدّ
طاقتي
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ولــو
أنّ
لــي
عقــد
النجـوم
نظـام
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كمــيٌّ
تــراه
فــي
الكتـائب
باسـماً
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بثغــرٍ
كزهــر
الــروض
وهــو
كِمـام
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رمــاح
حمــامٍ
زيّــن
الهـام
همزهـا
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كأغصــــان
روضٍ
فــــوقهنّ
حَمــــام
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فتبصــره
مــن
تحــت
حــاجب
قوسـها
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عيـــونٌ
تــرى
لامــاً
ومــا
هــي
لام
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يخــوض
بحــر
الحــرب
وهــو
ملثّــمٌ
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وليـــس
لبــدر
التــمّ
ثــمَّ
لثــام
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يشـبّ
بنـار
الحـرب
حيـث
الظمـا
لها
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شـــرارٌ
ومعقـــود
القتــام
أُيَــام
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وفــي
نصــب
محــرابٍ
بجــامع
صـولةٍ
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تصــلّي
ســيوفُ
الهنــد
وهــو
إمـام
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فقــل
لمجـاريه
اقتصـر
لسـت
قـائلاً
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تجــاري
أُكامــاً
حيــث
أنــت
إِكـام
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فهــذا
علـيٌّ
أسـعد
الجـدّ
فـي
العلا
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لـــه
الســعد
عبــدٌ
والزمــان
غلام
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محــت
آيــةَ
الطــائيّ
ســورةُ
جـودِه
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كآيـــة
ليــلٍ
قــد
محاهــا
عَيــام
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هـو
البحـر
لكـن
بَـرّ
سـاحله
النـدى
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وقـد
خـاض
خـاض
النـاس
فيـه
وعاموا
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وإنّـي
بهـذا
البحـر
فـي
المدح
سابحٌ
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وإن
عـــذل
العــذّال
فيــه
ولامــوا
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ومـورد
مـدحي
لـي
شـفاءٌ
مـن
الظمـا
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ومــــدح
ســــواه
علّـــةٌ
وزُنـــام
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وكـــلّ
دعــيٍّ
يــدّعي
غيــره
ادعُــهُ
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إلــى
مــا
عليــه
البيّنــات
تقـام
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ففجـــر
ســواه
فــي
المكــارم
أوّلٌ
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وهـــذا
هـــو
الثــاني
عليــه
عَلام
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فكــم
كــأس
أنـسٍ
مـن
مـدامِ
طبـاعه
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تــدور
علينــا
حيــث
نحــن
نــدام
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وألفـــاظه
الســحر
الحلال
وغيرهــا
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إذا
ســـمعت
أذنـــاي
فهــي
حــرام
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فما
أحنف
في
الحلم
أو
معن
في
الندى
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وهــــذا
لكــــلٍّ
عـــروةٌ
وعصـــام
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فلــولا
نــداه
لـم
يقـم
بيـت
شـاعرٍ
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وهــل
قــام
بيــتٌ
ليـس
فيـه
دِعـام
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وليــس
لمثلــي
مقصــدٌ
فــي
زمـانه
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ســواه
ومـا
لـي
فـي
الكـرام
مـرام
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وأيــن
كــرام
النـاس
أيـن
عظـامهم
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بلــى
بــالبلا
تحــت
الـتراب
عظـام
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ذوَى
روضُ
أهـل
الفضـل
مـن
ثمرِ
الندى
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ولـــم
يبـــق
إلّا
خـــروعٌ
وثُمـــام
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فيمّـم
حمـى
جار
الرضا
المرتضي
الّذي
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لــه
بالوفــا
عهــدٌ
لنــا
وذمــام
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دعانـــا
بعيـــن
درّعتنـــا
بلامــه
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ويـــاءٍ
يميـــنٍ
لليســـار
لِـــزام
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ربيــع
العلا
ترعــاه
عيــن
عنايــةٍ
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وعنـــه
عيـــون
الحاســدين
نيــام
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لقــد
أنجبتــه
المكرمــات
وبعــده
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تــولّت
عقيمــاً
وهــي
بعــد
عَقــام
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فيـا
بـدر
سـعدٍ
لاح
فـي
ليـل
كربنـا
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فلاح
المنــا
والقصــد
وهــو
تمــام
|
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ويـا
غصـن
روض
الفضـل
مـا
قـطُّ
هـزّه
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نســــيم
ســـوادٍ
راكـــدٍ
ومـــدام
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إليــك
نحــثُّ
اليعملات
مــن
الثنــا
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وأنــــت
لــــدرٍّ
قُلِّـــدَته
نظـــام
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فلــولاك
مــا
فــاه
اللسـان
بمدحـةٍ
|
كــــدرٍّ
ولا
درّ
النظــــام
يُســــام
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ولــولا
صـفا
جـدواك
عكّـار
مـا
صـفت
|
ولا
راق
منهــا
الــورد
وهــي
صـَوام
|
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ألا
فـي
سـبيل
اللـه
عيـن
العلا
بهـا
|
علــى
أهلهــا
رعيـاً
سـهرت
فنـاموا
|
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وهــاكَ
رعــاك
اللــه
بنــتَ
قريحـةٍ
|
لهـــا
فـــي
علــيٍّ
صــبوةٌ
وغــرام
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