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يـا
جزيـل
العطـا
نسـألك
حسن
الختام
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فــــرج
الهــــم
واكشـــف
مضـــيقه
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واجعـل
المصـطفى
شـافعي
يـوم
الزحام
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يـــوم
يفــر
الشــقيق
مــن
شــقيقه
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المعنـى
يقـول
فـي
هـوى
سامي
القوام
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قــــد
تحملــــت
مــــا
لا
أطيقـــه
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غصت
في
بحر
ما
له
طرف
يا
أهل
الغرام
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واصــــبحت
مهجـــتي
فـــي
عميقـــه
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تــوهت
بــي
سـواعي
غرامـي
والهيـام
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واركــــدت
فـــي
مراســـي
عميقـــه
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حيـن
فـي
الغرب
تجري
وحين
مشرق
وشام
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مثـــل
مـــن
ضـــل
منهـــج
طريقــه
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كـل
سـاعه
وهـي
فـي
صـفه
كالمسـتهام
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غيــــر
ســــكرى
ولا
هـــي
مفيقـــه
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رحـت
يا
اهل
الهوى
والمعارف
والذمام
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رحــت
يــا
أهــل
القلــوب
الشـفيقه
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زاد
شـوقي
إلـى
سـفح
صـنعا
أرض
سـام
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وإلــــى
كــــل
غرفــــه
أنيقــــه
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حلقهـا
مخجـل
الشـمس
والبـدر
التمام
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ومغيـــــر
الغصـــــون
الرشــــيقه
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الــذي
إن
شــربنا
علـى
ذكـره
مـدام
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ذكرتنــــــا
معتّــــــق
رحيقـــــه
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وإذا
لاح
بـــارق
ذكرنـــا
الابتســام
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عــــن
دُرَر
نـــابته
فـــي
عقيقـــه
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مـن
رسـولي
إليـه
مـن
يبلـغ
لـي
سلام
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ويجــــي
مـــن
لـــديه
بـــالحقيقه
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ويقـل
لـه
تعـال
ما
الخبر
كيف
الكلام
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مـــا
أحـــدا
شـــي
يضــيع
رفيقــه
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كيـف
تنسـى
الـذي
مـا
سمع
فيك
الملام
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مــــن
عــــدوّه
ولا
مــــن
صـــديقه
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فـي
هـواك
الهوان
وانت
له
دوله
إمام
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فــــادركه
قبـــل
يســـري
حريقـــه
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ليــت
عينـك
تـرى
حـالته
جنـح
الظلام
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ودمــــــوعه
بخــــــده
طليقـــــه
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تهجــع
النـاس
جمعـه
وعينـه
لا
تنـام
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يحســـب
الليـــل
دقيقـــه
دقيقـــه
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كيــف
يهنـاه
شـربه
ويهنـاه
الطعـام
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وهــــو
شــــارق
بـــدمعه
وريقـــه
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ردّ
قلبـه
فمـا
زاد
لقـاه
من
حين
هام
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يعلـــم
اللـــه
أيــن
جــت
طريقــه
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واصــله
فهــو
حـاجر
صـلاتك
والقيـام
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لا
تعبّــــــث
بمهجـــــه
رقيقـــــه
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والمـراد
منـك
والقصـد
يا
كل
المرام
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حفـــظ
تلـــك
العهـــود
الـــوثيقه
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مثلمـا
قـد
حفظهـا
علـى
مـر
الـدوام
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وشـــهر
بالوفـــا
فـــي
الخليفـــه
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والصـلاه
والسـلام
تغتشـي
خيـر
الأنـام
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وعلـــــى
الآل
أهـــــل
الطريقــــه
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