|
باســمِ
إلاهِـي
تحسـُنُ
البِـدايَه
|
وتصـلحُ
الأَعمـال
فـي
النهايـة
|
|
تــمّ
الصــلاة
والســلامُ
أبـدا
|
تبلــغ
طــه
المصـطفى
محمـدا
|
|
وألَـــهُ
وصـــحبَهُ
الكرامـــا
|
مــا
أمّ
وفـدٌ
بيتَـهُ
الحرامـا
|
|
والحمــدُ
للــه
كــثيراً
جَمّـا
|
علــى
جزيــل
فضـله
والنَّعمـا
|
|
فكــم
لَــه
مــن
نِعـمٍ
علينـا
|
وكــم
أيــادٍ
ســَاقَها
إلينـا
|
|
نحمــده
حمــداً
يـوافي
نِعَمَـهُ
|
ونســـتزيد
جـــوده
وكربتــه
|
|
ونبســُطُ
الكــفّ
لنيــل
رِفـدِهِ
|
وأن
نكــونَ
مــن
أخــصِّ
وفـدِهِ
|
|
وبعـد
ذا
نُهـدي
إلـى
الأحبـابِ
|
تحيّــــةً
تَهـــزأُ
بالأَطيـــابِ
|
|
النّــازلين
فـي
ربـوع
صـنعاء
|
وحبُّهُــم
لِلكُــلِّ
صــارَ
طبعــا
|
|
ونحــوهم
نُهــدِي
مـن
الأخبـار
|
بعـضَ
الـذي
نـراه
فـي
الأَسفارِ
|
|
كــان
خروجنــا
مــن
الأوطـانِ
|
لِقَصــدِ
بيـت
الواحـد
المنّـانِ
|
|
يـوم
الخميـس
وهـو
مـن
شـوالِ
|
إحـــدى
وعشـــرين
بلا
مقــالِ
|
|
ســـِرنا
بحمــدالله
ذي
الجلال
|
كقــولهم
ســار
غلام
الــوالي
|
|
ثـم
وقفنـا
يومَنَـا
فـي
مَتنَـه
|
وجآءنــا
اللــهُ
بكــلِّ
مِنَّــه
|
|
بِـالغَيمِ
مـن
قبـلِ
شروق
الشمسِ
|
فلــم
نَجِــد
لحرِّهَــا
مِـن
مَـسِّ
|
|
ولا
رأينـا
قـطّ
وعثـآء
السـَّفَر
|
ولا
أصــابَنا
مـن
الغيـم
مَطَـر
|
|
بِتنابهـا
وصـبح
يـوم
الجُمعَـه
|
سِرنا
على
اسم
الله
نسعى
جَمعَه
|
|
حـتى
أتينـا
بالضـحى
بوعانـا
|
وذاك
يـوم
السـّوق
فيـه
كانـا
|
|
وطــابت
القهــوة
فـي
بوعـان
|
وجاءنــا
مــن
خــوخِه
نوعـانِ
|
|
ثــم
مشــينا
نقطـع
الطريقـا
|
والغيــم
قــد
أظلّنـا
رفيقـا
|
|
حتّــى
أتينـا
مِسـجدَ
الحوضـَينِ
|
فيــه
أقمنـا
الظّهـرَ
ركعـتين
|
|
والعصــر
مثلـه
وطـاب
الحـالُ
|
وانتظــم
الموقــف
والمقــالُ
|
|
تجـري
بـه
مـن
تحتنـا
الأنهارُ
|
قـد
جـاوبت
تصـفيقها
الأطيـارُ
|
|
نرجـوه
غفرانـاً
وسـتراً
شامِلاً
|
مُلازمــاً
لنــا
ولطفـاً
كـاملاً
|
|
ومــن
نــداه
نطلـب
الوصـولا
|
إلـى
الحمـا
ونسـأل
القبـولا
|
|
مـن
فضـله
نرجـو
تمام
النّعمَه
|
ودفـــع
كـــل
شـــدّةٍ
وغُمَّــه
|
|
سـبحان
مولى
الجود
أهل
الكرَم
|
المبتــدي
مـن
فضـله
بـالنّعمِ
|
|
نطلبــه
يطـوي
لنـا
البعيـدا
|
وأن
يُنيــلَ
كلَّنــا
المقصـودا
|
|
حـتى
نُـوَا
في
الحِجر
والمقاما
|
ونســـتلذّ
فيهمــا
المقامــا
|
|
نعـم
وفي
الحوضين
بعض
الخُبرِة
|
أجـال
فـي
بعـض
الأمـور
فكـره
|
|
توهّمــا
بــأنَّ
بعــض
الحُمُــرِ
|
غَــاوَى
بـه
مسـافِرٌ
أو
سَمسـَرِي
|
|
قيــل
لــه
هـل
حَجمُـهُ
كَحَجمِـهِ
|
قــال
نَعَــم
وجِســمُهُ
كجِســمِهِ
|
|
وحيـن
أكـثروا
عليـه
الكَركَرَة
|
قــام
إليــه
مُسـرِعاً
لينظُـرَه
|
|
وقَــاس
بَعــدُ
طــولَه
وعَرضــَه
|
وقــال
قــد
عرفتـه
بالغُرضـَه
|
|
قيــل
لــه
فاجعـل
لـه
عَلامَـه
|
وقِيـسَ
علـى
قـولي
تكـن
علاّمَـه
|
|
ثـم
قصـدنا
العِجزَ
بعد
القهوَه
|
وفــي
الطبــاع
راحـةٌ
ونَشـوَه
|
|
وفيـه
دبَّـت
في
الجسوم
الرَّخوه
|
لأنّنــا
فيــه
عَـدِمنَا
الهَجـوه
|
|
ولـم
تطـب
فيـهِ
لنـا
القهاوي
|
والقــوم
بيــن
عَــاطِشٍ
ورَاوي
|
|
فــأجمَعَ
الـرأيُ
بغيـر
لَعثمَـه
|
أن
المَسـَا
مستحسـنٌ
فـي
الأكمه
|
|
أكمـــه
تُنســَبُ
لاِبــنِ
مهــدي
|
رابيـةٌ
فـي
القـاع
مثل
النّهدِ
|
|
كـان
وصـولُنا
بهـا
بعدَ
الغدا
|
ثـم
دخلنـا
فـي
رباهـا
مسجدا
|
|
قِلنـــا
إلــى
صــلاة
الظّهــرِ
|
حـتى
اسـترحنا
مـن
سموم
الحرِّ
|
|
ثــم
صــعدنا
بعــده
ديوانـا
|
كـاد
يكـون
فـي
البنا
إيوانا
|
|
أخشـابه
فـي
سـقفِه
إحـدى
عشَر
|
وقاعــة
مفروشــة
فيهـا
حِصـَر
|
|
فطـاب
فيـه
جمـع
شـمل
الخُبرِه
|
قـد
حَسـُنَ
المـدكا
به
والسَّمره
|
|
وعـاد
إشـكال
الحمـارِ
ثانيـا
|
أشــدَّ
ممـا
كـان
قبـلُ
باديـا
|
|
فبعضــهم
أنّــثَ
بعــض
الحُمُـرِ
|
وظنّــه
البغلــةَ
غيـر
ممـتري
|
|
وبعضــهم
قــال
بـأن
الصـَّرما
|
غـاوَى
الخُطـامَ
بالحمار
جازما
|
|
وجزمُـــوا
بـــأنه
المغــاوي
|
كقـــولهم
وَرَاكِـــبٌ
بِجَّـــاوي
|
|
وصـار
بعـض
النـاس
فيه
تاجرا
|
مُقَطِّعـــاً
لِشاشـــِه
مَيَـــازِرا
|
|
يأخــذُ
بـالمئزَرِ
منهـم
شاشـا
|
أو
مـا
خلا
أو
ما
عدا
أو
حاشا
|
|
وقَبـل
وقـت
الفجـر
يـومَ
الأحدِ
|
كـانَ
الشـِّداد
للحميـر
عـن
يد
|
|
ثـم
أقمنـا
الفجرَ
بعد
الدّلجَه
|
وبعــده
المسـير
نحـو
الشـِجَّه
|
|
فلـم
نـزل
نرقَـى
عليهـا
صُعُدا
|
حـتى
بلغنـا
رأسَهَا
بعد
الغَدَا
|
|
ثـم
سـرحنا
بعـد
ذاك
الهَجَـرَه
|
بِزفَّــــةٍ
مضـــمرةٍ
ومَحجِـــرَة
|
|
حتّـى
بلغنـا
بيت
مَهدّيّ
الزّبَير
|
كافـاه
عنـا
ربُّنَـا
بكـلِّ
خَيـر
|
|
أنزلنــا
فــي
مَنظَــر
رحيبَـه
|
مجـــدّداً
رَيحَـــانَهُ
وطيبَـــهُ
|
|
ولـم
يـزل
يبـذل
مـن
إكرامـه
|
للكــلّ
مـا
نعجـز
عـن
نظـامِه
|
|
وكــلّ
مــن
يحضـر
مـن
وفـودِه
|
لا
بـد
مـا
يتحفنـا
مـن
عُـودِه
|
|
وبعضـــهم
يتحفنـــا
بعِطـــر
|
حـتى
سـرى
في
الجوّ
طيبُ
النَّشرِ
|
|
وهـــذه
قاعـــدة
مستحســـنه
|
ما
قد
رأينا
مثلها
في
الأمكنَه
|
|
لــولا
المقــام
لأقمنَـا
عشـرا
|
لمّـا
رأينـا
كـلَّ
مـا
قـد
سَرَّا
|
|
لكنّهــا
الاشـواق
نحـو
الحـرمِ
|
تحثنـا
علـى
السـّرَى
في
الظّلَمِ
|
|
فنسـأل
اللـه
المعيـد
المبدي
|
يَـروي
لنـا
فـي
الأرض
كـلَّ
بُعدِ
|
|
حــتى
نحــلّ
البلـد
الحرامـا
|
ونبلــغُ
المقصــودَ
والمرامـا
|
|
ويُقبَــلُ
الكُــلُّ
بمحـضِ
الفضـلِ
|
مُوَفَّقـــاً
لطّيبـــات
الفعـــلِ
|
|
فالعبــد
مــاله
ســوى
مـولاهُ
|
مهمـــا
أراد
مطلبــاُ
دعــاهُ
|
|
إذا
دعـــاهُ
عبـــدُهُ
أجــابَه
|
ونــال
مــن
إحســانه
طِلابَــه
|
|
مـا
زال
يولينـا
الجميل
فضلاَ
|
بجــوده
صــار
العسـيرُ
سـهلا
|
|
ويــومَ
الاثنِيـن
أقمنـا
قَسـرا
|
إكرامُـهُ
أضـعافُ
مـا
قـد
مَـرَّا
|
|
إكرامُـه
للضـّيفِ
يُنسـيهِ
الوطن
|
لمـا
يـرى
مـن
فعلِهـم
كلَّ
حسن
|
|
يـوم
الثلاثـاء
مع
طلوعِ
الشمسِ
|
سـِرنا
ولـم
نجـد
لهـا
مـن
مَسّ
|
|
لأنّــــه
أظلَنــــا
الغمـــامُ
|
وعمّنــا
مــن
ربّنــا
الإنعـامَ
|
|
ولـم
يـزل
يـدنُو
بِنـا
النّقيلُ
|
نقطعـــه
وَثبـــاً
ولا
نَقيـــلُ
|
|
وقــد
أظلّنــا
بــه
الغمــامُ
|
كـــأنّه
مــن
فوقنــا
خيــامُ
|
|
فلــم
نــزل
ننـزل
فـي
ظلالِـه
|
والحمـــدلله
علــى
إفضــالِه
|
|
حــتى
بلغنـا
مطـرح
المراحِـضِ
|
مـــن
دون
مــانعٍ
ولا
معــارضِ
|
|
فــأنزل
اللـهِ
بهـا
الأمطـارا
|
قـد
بـرَّدَت
مـن
سـوحه
أقطـارا
|
|
ومـن
طلـوع
الشمس
يوم
الأربعا
|
سـرنا
إلـى
لَعسَان
نمشي
أجمعا
|
|
وفيـه
أدركنـا
الغداءَ
والعَشا
|
وبعـده
سـِرنا
إلـى
وقت
العِشا
|
|
وكـان
مَمسـَانَا
البَحيح
فاستَمَد
|
للنّــوم
فيـه
كـلُّ
مـاشٍ
ورقـد
|
|
والصـبح
في
يوم
الخميس
باجِلا
|
ســرنا
إليــه
راكبـاً
وراجلا
|
|
حـتى
بلغنـا
قلعـة
الشيخ
علي
|
حميـــدةٍ
وهــي
أعــزّ
معقــل
|
|
فجَمّــل
اللــه
علــي
حميــدَه
|
أفعـــاله
صـــالحة
حَميـــده
|
|
أنـــال
كــلَّ
وافــدٍ
مُــرَادَه
|
فمــا
علــى
إكرامــه
زِيـادَه
|
|
وليلـة
السـبت
حِمـدنَا
المسرى
|
عنـد
الصباح
إذ
رأينا
البحرا
|
|
وجاءنــا
فـي
بنـدر
الحُدَيـدَه
|
يوســف
فــي
طلعتـه
السـعيده
|
|
آنسـنا
بالبشـر
من
بعد
القِرى
|
فلا
تَسـل
مـن
جـوده
عمّـا
جـرى
|
|
وبعــده
جــاء
الأميـر
سـامرا
|
مصـــليّاً
مســـلّما
مجـــابرا
|
|
قِلنــا
وقُلنـا
للنفـوس
فـوزي
|
بقـاتِه
المشـهورة
بـالتَيفوري
|
|
مـا
كنتُ
أَدري
قبل
مرأَى
البحرَ
|
بأنَّهـــا
توجـــدُ
أرضٌ
تجــري
|
|
أنعامُهـــا
ســاكنةٌ
لا
تَحــركُ
|
وهــي
بهــم
جاريــةٌ
لا
تَـبركُ
|
|
ســاكنةٌ
تُخــالُ
وهــي
سـالِكَه
|
تطـوي
بـك
البعيـد
وهي
باركه
|
|
مثـل
الزّمـان
لـم
يَـزَل
بأهلِهِ
|
يجـري
وهـم
فـي
غفلةٍ
من
فِعلِهٍِ
|
|
فصــلٌ
بــه
نفصـل
خـوضَ
الـبرّ
|
عـن
ذكر
ما
جرى
لنا
في
البحرِ
|
|
فـي
سـادس
الشهر
هجرنا
البَرّا
|
عصـر
الخميـس
وركبنـا
البحرا
|
|
بِتنَـا
بِـهِ
ليلتنـا
في
المرسَا
|
ومثلـــه
أصــبح
ثــم
أمســى
|
|
وصـبح
يـوم
السـَّبتِ
قـد
نشرنا
|
شـــِراعنا
لقطعِـــه
وســـِرنا
|
|
أوّل
مرســـى
كــانف
ي
بحيــصِ
|
هـذا
وحـال
البحـر
حِيـصِ
بيـص
|
|
فبعضــهم
قـد
شـغلَته
الـدوخَه
|
حـتى
غـدا
منهـا
يَهـمّ
الشـخّه
|
|
والبعــض
قــد
أطلَقَـهُ
الصـّلاقُ
|
إلــى
الخلــوص
كلّهـم
مشـتاق
|
|
فكــم
تــرى
مـن
قـاذف
مُقَـزّز
|
مـن
الغـداء
والعشـاء
محـترز
|
|
يــدفع
مــا
يــأكلهُ
مفرّطَــا
|
ســمّوهُ
ممّــا
مســَّه
مُزَيرِطــا
|
|
وكمــران
كــان
فيــه
مَرســَى
|
فــي
ســوحه
أدرك
كــلٌّ
أنسـَا
|
|
يومــاً
وليلــةً
بــه
أقمنــا
|
ومــاؤه
العـذب
بـه
اغتسـلنا
|
|
وبعـده
المرسـى
قبـال
الحنّـه
|
والحمـد
للـه
العظيـم
المنّـه
|
|
فـــأنّه
جــرت
لنــا
ألطــافُ
|
بــه
أمِنّــا
كُــلَّ
مــا
نخـاف
|
|
بعض
المراسي
أرسل
الله
المطَر
|
لكنَّــهُ
مـا
نالنـا
منـه
ضـرَر
|
|
والبِــركُ
ليلــة
بـه
مرسـانا
|
وحَلــي
بعــدِه
بــه
مَمســانا
|
|
سـَحَّ
علينـا
فـي
دجـاه
المطـرُ
|
وليــس
يغنـي
مـن
قضـاء
حـذرُ
|
|
فـــأجمع
الــرأيُ
بلا
مجــادِل
|
علـى
السـلوك
من
طريق
الساحلِ
|
|
بـه
قصـدنا
للخـروج
القنفـده
|
وقــد
زِبلنــا
تعبـاً
وقلفـدَه
|
|
فـأطبقوا
علـى
الخـروج
منهـا
|
يــوم
الخميـس
لا
عُـدولَ
عنهـا
|
|
فـي
يـوم
عشـرينَ
لِشهر
القعدَه
|
ستصـــحبين
للطريــق
العِــدّه
|
|
ثـم
أكتَـروا
سـبعاً
من
الجمال
|
تحملهـم
فـي
الخبـتِ
والرمـال
|
|
بــــأربعين
فـــوق
مئتيـــنِ
|
كـان
الكِـرى
من
القروش
العَين
|
|
وجاءنــا
وزيرُهــا
والكــاتب
|
وجملــةٌ
ممَّــن
بهــا
يناســبُ
|
|
ثـم
أتـى
فيهـا
حَفِيدُ
المرغني
|
عثمـان
وهـو
بـالتَلاقي
معتنـي
|
|
فـي
بلـد
السـودان
كان
غايبا
|
يَســِيحُ
فيهـا
جانبـاً
فجانبـا
|
|
ألــفٌ
وخَمـسُ
مئة
قـد
أسـلموا
|
علــى
يـديه
بالـدعا
وسـلّموا
|
|
غـاب
بهـا
تسـعاً
مـن
السـنينِ
|
يـدعوهمُ
إلـى
الهـدى
المـبين
|
|
مصـــرّحاً
أوَّلَ
كـــل
تَـــدرِيس
|
بمـا
روى
عـن
أحمـد
بن
إدريس
|
|
لأنّـــه
أســـتاذه
الحقيقـــي
|
جــــاذَبَهُ
لأَقـــوِمِ
الطريـــقِ
|
|
فيهــا
لقينـاهُ
يَـؤُمُّ
الحرمـا
|
أســـتاذُهُ
طلبـــه
ليقـــدُما
|
|
لكــن
سـبقناه
إلـى
المقصـودِ
|
وجــاء
بعــدنا
مــع
الوفـودِ
|
|
ولـم
نـزل
نقطـع
تلـك
الأرضـَا
|
نطلــب
مـن
أعاننـا
أن
يرضـى
|
|
وكـــانتِ
الأمطــار
متتــابِعَه
|
لـولا
حُصـولُ
اللّطفِ
كانت
قاطِعَه
|
|
كـان
الشـِّداد
بعد
عصر
الجُمعَه
|
والســّير
دفعــةً
عَقِيـبَ
دفعَـه
|
|
حتّـى
أتينـا
بعـد
فجر
الحَسَبه
|
وهــي
محــلٌّ
بـالزروع
مُخصـِبَه
|
|
وأول
الظهــر
رحلنـا
العيسـَا
|
واستحسـنوا
في
دوقةَ
التعريسا
|
|
وبعــد
حــطّ
الرحـل
والأثقـالِ
|
أرخـت
علينـا
سـحبهَا
العَزَالي
|
|
ثــم
رحلنـا
بعـدَ
ظُهـرِ
الأحـدِ
|
نطـوي
بحمـد
اللـه
كـلَّ
فَدفَـدِ
|
|
وَبعـدما
أرخـى
الـدجا
سـُدولَه
|
أرخـى
السـحاب
فوقَنـا
سـيولَه
|
|
فنزلــوا
تحــتَ
غصـون
المـرخِ
|
وعقـد
غيـث
السـحب
فيـه
مرخي
|
|
والكــلّ
فـي
ظلالِـه
قـد
قـالا
|
وزادَهُ
بثـــــــــــوبه
ظلالا
|
|
وهـا
هنـا
قـاموا
لِقَطب
الشَّدَّه
|
يحـــاذرون
مطـــراً
وششـــدَّه
|
|
ولـم
نـزل
حـتى
وردنا
الشاقَّة
|
ومــا
رأينـا
قـط
حـالاً
شـاقّه
|
|
ثـم
حططنـا
الرحـل
بعد
العصر
|
وثــم
نمنــا
لِصــلاةِ
الفجــرِ
|
|
والسير
قد
كان
إلى
وقت
الضحى
|
والكــلّ
مِنَّـا
بالمقـام
فَرِحـا
|
|
وجعلــوا
المــرخَ
لهـم
ظلا
لا
|
وذبحــوا
تَيســاً
لهـم
أكـالاَ
|
|
وأوجـــد
اللــهُ
بــه
حِســيَّا
|
كــانت
لهــم
نظافــةً
ورِيــا
|
|
ثــم
تغــدَّينا
ونمنــا
سـاعَه
|
والظهــر
صــلّينا
بـه
جمـاعَه
|
|
واللّيــث
قمنــا
نحـوه
نسـير
|
ولطــف
مولانــا
لنــا
خــبيرُ
|
|
وقــد
نشــرنا
لِســَفِين
الـبرّ
|
شــراعنا
ولــم
نــزل
نُمـذري
|
|
كـان
وصـولنا
بـه
بعـد
الغَدا
|
وأجمـع
الـرأي
على
السير
غدا
|
|
فيـه
أقمنـا
يومنـا
الرَّبوعـا
|
واللّيـل
أوقَـدنَا
بِـهِ
شـموعا
|
|
وعَقــده
العـزّي
ابـنِ
اسـمَاعِلًَ
|
قـد
اذكرتنـا
أحمـد
القُباتلي
|
|
وقــد
ذكرنــا
سـائِرَ
الأحبـاب
|
نتلــوا
لهـم
فاتحـة
الكتـاب
|
|
ثـم
أتينـا
الهضـبَ
بعد
اللّيثِ
|
والخـبز
لـم
يبـق
سوى
الحِثيث
|
|
لكنَّــــهُ
عصــــَدَهُ
الهَرِيـــشُ
|
والــرزسّ
بعــد
أكلــه
نهيـش
|
|
وقـــد
تفيّأنـــا
بـــه
ظلالا
|
مــن
صــخراتٍ
سـامَتِ
الجبـالا
|
|
وهبّــت
الريــح
بــه
ســموما
|
ونســــَفَت
رمـــالَه
رجومـــا
|
|
وفيــه
مــاءٌ
أشـبه
النَّباتـا
|
ذوقـاً
وفـاق
النّيـلُ
والفراتا
|
|
وبعــدَهُ
ســرنا
إلــى
يَلَملـم
|
ميقاتنــا
فـي
قصـدنا
لِلحـرم
|
|
وهــو
يُســمّى
الآن
بالســَّعريّه
|
باســـمِ
بئرٍ
عَذبـــةٍ
هنيَّـــه
|
|
وفـي
حِمـاهُ
قـد
قرمنـا
لِلقُرم
|
مادومــة
بعكسـها
مـن
النّعـم
|
|
وعنـد
وقتِ
العصرِ
شَدُّوا
الرَّحلا
|
وأسـبَغُوا
بعـد
الوضوءِ
الغسلا
|
|
وبعـد
أن
صـَلّوا
أهلّـوا
أجمَعَا
|
بعُمــــرةٍ
مفـــردةٍ
تمتعَـــا
|
|
لأنهــم
مــا
سـاق
منهـم
أحـدُ
|
هَــدياً
وهــم
لِلاتِّبـاعِ
قصـدوا
|
|
لبّيــكَ
لبّيــكَ
أتــاكَ
الوفـدَ
|
مَطلبُهُـم
مِنـكَ
العطـا
والرِّفـدَ
|
|
لبّيــكَ
فــاغفِر
لهـم
الأوزارا
|
صــِغارَها
يــا
ربِّ
والكبــارا
|
|
لبِّيـك
إن
الحمـد
والنعمـةَ
لكَ
|
وكلّمـا
عليـهِ
قـد
دارَ
الفَلَـك
|
|
لبّيـكَ
فـي
مُلكِـك
لا
شـريكَ
لـك
|
يــا
ربَّ
كـلِّ
سـَالِكٍ
أنَّـى
سـلَك
|
|
لبّيــكِ
أهـل
الجـود
والنّـوالِ
|
يــا
غـافِرَ
الـذَنب
ولا
تُبـالي
|
|
لبّيـكَ
مـن
لبَّـى
من
الخلق
فَلَك
|
يــا
ربَّ
كـلِّ
مالـكٍ
ومـا
مَلـك
|
|
لبّيــكَ
لِلعَفــوِ
أتينـا
نطلـبُ
|
ومـن
قبيـح
مـا
اجتَرَحنا
نهربُ
|
|
لبيــك
جئنـاك
مُجِيبِـي
دَعوَتِـك
|
تَعَرُّضـــأً
لنفحـــاتَ
رحمتِـــك
|
|
لبّيــكَ
أنــتَ
الملـكُ
الكريـمُ
|
وبيتُـــكَ
المبــارك
العظيــم
|
|
حاشـاك
أن
يرجـعَ
مـن
وافاكـا
|
بِخَيبــةٍ
وقــد
أتــى
حِماكــا
|
|
أشــعثَ
قـد
شـقّت
بـه
أسـفارُه
|
وكتَبــت
فــي
صــُحفِهِ
آثــارُه
|
|
مُفارقــــاً
لأهلِـــه
ومـــالِه
|
قـد
فـارق
المألوفَ
من
أحوالِه
|
|
فَـارحَم
عبيـداً
قـد
أتوك
غُبرا
|
شــُعثاً
يريـدون
بـذاكَ
الأجـرَا
|
|
ولا
تُؤَاخِـذهم
بمـا
قـد
أسلَفوا
|
فهُـم
بأنواع
الخطايا
اعترفوا
|
|
ســِواكَ
لا
يغفِـر
ذنبـاً
عرفـوا
|
يرجـونَ
مَحوَ
مَا
أتوا
واقترفوا
|
|
واعصـِمهُمُ
فيمـا
بقـي
مـن
عُمرِ
|
خُــذ
بنواصــِيهِم
لِفعـل
الـبرِّ
|
|
فَصـلٌ
وكـان
السـّير
بعد
العصرِ
|
حتّـى
نزلنـا
عنـد
وقـت
الفجرِ
|
|
وفـــي
إدامٍ
نفـــدَ
الطعــامُ
|
لــم
يبــق
إلاّ
الــرزّ
والأَدام
|
|
وقَـد
طَطُـوا
قبـلَ
العِشـا
قِلاّءَا
|
لِيَرتَحُــوا
بــأكلِهِ
العَشــآءا
|
|
وذبحــوا
فــي
ســوحه
طليّــا
|
وجعلـــوه
للعشـــا
مضـــبيّا
|
|
ويَســَّر
اللــه
لهــم
دَقيقــا
|
مـن
بعـض
مـن
كـان
لهم
رفيقا
|
|
محمــد
بــن
أحمــد
الشــريف
|
حمــــود
عمّـــه
بلا
تحريـــفِ
|
|
وقاســم
كــانت
لــه
ذخِيــرَه
|
مــن
تمـرِه
فـي
قُرعـةٍ
صـغيرَه
|
|
قَســــَّمها
لأَجـــرهِ
مُحتســـِبا
|
تقـول
قـد
صـادَ
الأميـرُ
أرنبا
|
|
قـد
صـقّر
الفخـري
لـه
مطالبا
|
حـتى
غـدا
لِلتّمـر
منـه
جاذبا
|
|
وفــي
رَقَـاق
تحـت
ظـل
التمـرِ
|
قـد
نزلـوا
عنـد
أوان
السـَّحرِ
|
|
وذاكَ
وادٍ
ولــه
اســم
ثــاني
|
وبعضــــهم
ســـمّاه
مَلَكـــانِ
|
|
كَالهَضـبِ
فيه
نحو
ذا
قد
قالوا
|
بأنّهــا
تُســمَى
بــه
الجبـال
|
|
وبئره
مَســــمِيّةٌ
بالخضــــرا
|
وبعـدها
البيضـا
وكـانت
أَمراَ
|
|
عهــدي
بهــا
مرحلـتين
كـانت
|
لكنّهــا
قــد
ثلّثَــت
فهــانَت
|
|
ولـم
يكـن
لنـا
بـه
مـن
مـاءِ
|
لكــن
حملنــاه
مـن
البيضـاءِ
|
|
إذ
وَرَدُوهَـا
عنـدَ
نِصـفِ
اللّيـل
|
والنومُ
في
الأجنان
وافي
الكيلِ
|
|
واحتفـظ
القـوم
بما
في
القِرَبِ
|
لمطعــــمٍ
ومَأكـــلٍ
ومشـــرب
|
|
ومنـهُ
شـدَّينَا
إلـى
أم
القُـرى
|
عند
الصباح
يُحمد
القوم
السُّرَى
|
|
وحيـن
شـاهدنا
قناديـلَ
الحرِم
|
علـى
المنـارات
مشينا
بالقدَم
|
|
قــام
رســول
ســيّدي
سـليمان
|
وعنــده
زمـزم
مُـروي
الظمـآن
|
|
ومعـــه
البغلـــةُ
والحمــارَ
|
وعنـــده
شيشـــتُه
والنـــارُ
|
|
فركــب
الحســام
فـوق
العيـرِ
|
ويوســف
البغلـة
نحـو
الـدير
|
|
حـتى
وقفنـا
عنـد
بـاب
الحرمِ
|
بـابَ
السـلام
وقـت
كشـف
الظُلَمِ
|
|
ثــم
دخلنــا
لصــلاة
الصــّبح
|
وكلّنـــا
مستبشـــرٌ
بالنُّجــحِ
|
|
تلتــهُ
منــا
ســبعة
الأطـواف
|
والأمـر
فـي
ذالـك
غيـر
خـافي
|
|
ثــم
قصـدنا
الحَجَـرَ
المكرّمـا
|
كـــلّ
أتــى
مكبّــراً
مســلّما
|
|
بوعـده
كـان
الشـُروع
بالرّمَـل
|
سـنّة
مـن
قـاد
إلى
الخير
ودَل
|
|
ثــم
المقـام
بعـد
ذا
أتينـا
|
وركعـــتين
خلفَـــه
صـــلّينا
|
|
وبعـده
رحنـا
إلـى
باب
الصّفا
|
نســعى
كمـا
قـد
سـنّ
الحُنَفَـا
|
|
بعـد
تمـام
السـعي
قـد
حلقنا
|
وفـي
منـازل
الحمـا
افترقنـا
|
|
ثــم
أقَمنَــا
لصـباحِ
الثـامنِ
|
فـي
بلـد
اللـه
الحـرام
الآمنِ
|
|
فـي
صـبحه
للحـجّ
قـد
أهلَلنـا
|
ثــم
ركبنــا
ومِنَــى
أتينــا
|
|
بهــا
أقمنــا
خمــسَ
صــلواتِ
|
ثـــم
صــعدنا
نحــو
عرفــاتِ
|
|
فلـم
نـزَل
حـتى
وصـلنا
نمـرَه
|
بهـا
نزلنـا
خيمـةً
كـالمنظرَه
|
|
ثـو
وقفنـا
للوقـوف
في
الجبل
|
بعـد
صـلاة
ظهرنـا
إلـى
الطّفل
|
|
ثـم
افضـنا
قاصـدين
المشـعرا
|
لنحمــد
اللــه
بــه
ونشـكرا
|
|
بتنــابه
وفــي
صـباح
العِيـدِ
|
ســرنا
إلـى
المخيَّـم
السـعيدِ
|
|
إلــى
مِنـى
حيـث
محـلَّ
الهـدي
|
وعنــدما
يُنَــدَبُ
نُسـك
الرمـي
|
|
وبعـد
رمـي
الجمـر
سـرنا
مكه
|
ليســتتم
الكــلّ
مِنَّــا
نُسـكَه
|
|
وتــمّ
فيهـا
السـّعي
والطـوافُ
|
وكــثرت
مــن
ربّنــا
الألطـافُ
|
|
ثـم
رجعنـا
للمـبيت
فـي
مِنـى
|
وبتمــام
الرمــيِ
تَــمَّ
حَجُّنـا
|
|
فالحمـد
للـه
علـى
مـا
أنعما
|
ومــا
بـه
إلاهُنـا
قـد
أكرمـا
|
|
ومـن
هنـا
كـان
افتراق
الشملِ
|
وراح
كــلُّ
واحــدٍ
فــي
شــغلِ
|
|
فــالبعض
قـد
أزمـع
للترحـالِ
|
إلـى
المقـام
الأحمـديّ
العالي
|
|
وبعضـهم
مـال
إلـى
المجـاوَره
|
ولازمَ
الــبيت
وكــان
حاضــرَه
|
|
وبعضــهم
عــاد
إلـى
الأوطـانِ
|
وليــس
يَعــدُو
قَـدرَ
الرحمـانِ
|
|
والكـلُّ
منّـا
يسـأل
الرحمانـا
|
أن
يجمـع
الشـملَ
كما
قد
كانا
|
|
من
ها
هنا
نشرع
في
خوضِ
السَّفَر
|
إلـى
مقام
المصطفى
خير
البشَر
|
|
كـان
ابتـدا
تَبريزنـا
لِلزَّاهِرِ
|
أوّل
يــوم
السـّبت
بعـد
عاشـر
|
|
أي
عاشــرَ
العيـد
لأن
العيـدا
|
كـان
الربـوع
فـاحفظ
العديدا
|
|
ثـم
رحلنـا
العيـسَ
وهيَ
رازِمه
|
حـتى
حططناهـا
بـوادي
فـاطمه
|
|
وفـي
نهـر
مثـل
غَيـل
الـوادي
|
ونخلُــــهُ
مُظَلِّـــلٌ
للنّـــادي
|
|
وفيـه
وافينـا
سـبيل
القعـرَه
|
قيل
اسمه
القعراءِ
عند
الخُبرَه
|
|
وهــو
فضــاءٌ
ليـس
فيـه
مـاءُ
|
ولا
يُــــرى
لشـــجرٍ
أفيـــاءُ
|
|
فيـه
جلسـنا
تحـتَ
ظـل
الخيمَه
|
ولــم
نـزل
فـي
قَومـةٍ
ونـومَه
|
|
ومـن
عقيـب
ظهرنـا
على
السحَر
|
إلـى
خُلَيـصٍ
انتهـى
بنا
السفَر
|
|
وفيــه
ســوق
ونخيــلٌ
ونَهَــر
|
لكنّــه
بكـثرة
النـاس
اجتَفَـر
|
|
وقـد
مررنـا
العصـر
في
سرانَا
|
فـي
ذلـك
اليـوم
علـى
عسفانا
|
|
ثــم
رحلنــا
مثـل
يـوم
الأوّل
|
حـتى
نزلنـا
عـن
ظهـور
الأَبـل
|
|
فـي
صـَعُبرٍ
قيـل
بـل
القَضـِيمَه
|
هــي
اسـمه
والحـال
مسـتقيمَه
|
|
قِلنَـا
وسـِرنَا
بَعدُ
سيراً
بالغا
|
حـتى
وصـلنا
في
الصباح
رابغا
|
|
وفيـــه
شـــاهدنا
غَـــدِيرَخُمِّ
|
وهـــو
غــديرٌ
وبهــذا
ســُمِّي
|
|
وهـو
المسمّى
الجُحفة
المشهورَه
|
ومنـه
قـد
سـِرنَا
إلـى
مستوره
|
|
وفــي
حِماهـا
ضـاعت
الكـوفيَّه
|
عنــد
ورود
بئرَهــا
المطـويَّه
|
|
ونحـو
بئر
الشـيخ
قـد
أزمعنا
|
ســيراً
ويــوم
أَحَــدٍ
أجمعنـا
|
|
علـى
السـُّرى
نحو
حِمَا
الصفراء
|
وكــم
لتلــك
مـن
يـد
بيضـاءِ
|
|
لأن
فيهــــا
مســـجدٌ
ونَهـــر
|
والنخـل
فيهـا
باسـقٌ
والتّمـرُ
|
|
وبعـدها
كان
السرى
نحو
الحيف
|
بجـدّ
عـزم
فـي
المضـيّ
كالسَّيف
|
|
كـان
وقوفنـا
بـه
قبـل
السَّحر
|
وفيــه
نهــرٌ
فـائقٌ
كـل
نَهَـر
|
|
ثـم
شـددنا
فيـه
قبـل
الظّهـر
|
إلـى
الفُرَيـشِ
فـي
أشـد
الحـرِّ
|
|
لكـن
لنـا
أُنـسٌ
بقـرب
الوصـل
|
ونشــوةٌ
تنســَي
فــراقَ
الأهـلِ
|
|
لأنّــــه
خاتمـــة
المراحـــلِ
|
ومنتهــى
التعــداد
للمنـازلِ
|
|
هـاجت
إلـى
الوصـل
بـهِ
أشواقُ
|
فكـــلّ
قلـــبٍ
نحــوه
خَفّــاق
|
|
فهــبّ
رَوح
البشــر
والتَبشـيرِ
|
أذكــى
مـن
العَنـبرِ
والعـبيرِ
|
|
ولاح
مــن
ربــع
الحـبيب
نُـورُ
|
أخفـاه
عـن
أبصـارنا
الظهـورُ
|
|
ثــم
أتينـا
الحضـرة
العليَّـه
|
يــومَ
الخميـس
نقـرأُ
التحيَّـه
|
|
هنــاك
قَــرَّت
بالوصـال
أعيـنُ
|
وزال
عنّـــا
همُنــا
والحــزنُ
|
|
وازدحـم
الضـحك
سروراً
بالبُكا
|
وأعلـن
المضـمر
وجـداً
بالشّكا
|
|
وأشــرق
الطــاهِرُ
مـن
جمـالِه
|
وامتلأ
البـــاطنُ
مــن
جلالِــه
|
|
نســأل
مَــن
مَـنَّ
بـذا
علينـا
|
أن
يغفـرَ
الـذَنبَ
الـذي
أتينا
|
|
وأن
يكــون
ســعيُنا
مقبــولا
|
وكلّنـــا
بفضـــله
مشـــمولا
|
|
بحــبِّ
طــه
المصــطفى
وبِــرِّهِ
|
وفضــله
ومــا
علا
مــن
قـدره
|
|
صــلّى
عليــه
ربُّنــا
وســلّما
|
وآلــه
أهـل
الكمـال
العُظمـا
|
|
وَصــــحبِه
وصـــالحي
أمتِـــهِ
|
جميعهـــم
وتـــابعي
ملّتِـــهِ
|