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هيــا
نتحـالفْ
يـا
إخـوانْ
|
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بأكيــدِ
العهـد
وبالأيمـانْ
|
|
أن
نبــذلَ
صــِدْقاً
للأوطـانْ
|
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وبيمْــن
سـعيدٍ
نحـن
نصـانْ
|
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والفضـل
يجـل
عـن
النكران
|
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للحـربِ
هلمُّـوا
يـا
شـجعان
|
حــبُّ
الأوطـان
مـن
الإيمـانْ
|
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هيـا
اجتهدوا
هيا
اجتهدوا
|
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والحــر
ينجــزُ
مــا
يَعِـد
|
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وجميـعُ
النـاسِ
لكـم
شهدُوا
|
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بشــجاعتكم
عنـد
الميـدان
|
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للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــبُّ
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
هيـا
اتحـدوا
هيـا
اتحدوا
|
|
للملَّـــةِ
ســـيفُكم
عضـــدُ
|
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وبيُمــن
سـَعيدٍ
نحـنُ
نُصـان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــبُّ
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
فلكــم
قِــدمٌ
ولكــم
قَـدمُ
|
|
فــي
الفضــل
وضـدكم
عـدمُ
|
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ومعــــالمكم
لا
تنهــــدم
|
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بـالتقوى
تأسـيسُ
البنيـان
|
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لحــرب
هلمُّـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
أنتــم
كُرمــا
أنتـم
نُبلا
|
|
تحمُــون
الجيـرةَ
والنُّـزُلا
|
|
ولكـم
شـرفٌ
فـي
الكونِ
علا
|
|
قــدْراً
لا
يمحـوه
الملـوان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــبُّ
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
فنـزالِ
نـزالِ
علـى
الأعْـدا
|
|
لا
ترعـوْا
فـي
الأعْـدا
عَهدا
|
|
فـالوقتُ
أتـاح
لكـم
سـعدا
|
|
وأذاقهــم
طعــمَ
الخسـران
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــبُّ
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
هيـا
انتظموا
وارْقوْا
أوْجا
|
|
هيـا
اقتحمُـوا
فوجـاً
فوْجا
|
|
هيـا
التحمـوا
عند
الهيجا
|
|
هيّــا
هيــا
سـُونكِي
دوران
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــبُّ
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
لا
تعطــوا
الأعْـدا
مِقْـوَدكم
|
|
لا
ترضـــوْا
أن
تســتبعدكم
|
|
واللــهُ
تعــالى
أســعدكم
|
|
بقتـالٍ
وهـزم
ذوي
الطغيان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــبُّ
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
بصــــوارمكم
وعـــواليكم
|
|
ومفــــاخركم
ومعـــاليكم
|
|
وبيُمــن
سـعيد
نحـن
نصـان
|
|
خوضـوا
بـدما
أهل
العدوان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــبُّ
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
هـــولُ
الأعــداء
طلائعكــم
|
|
وبنــــادقكم
ولـــوامعكم
|
|
وعــذابُ
الهــون
مـدافعكم
|
|
وصــواعقكم
رمُــى
الأهـوان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
قصـباتُ
السـبقِ
بهـا
فُزتـم
|
|
وسـهامُ
المغنـمِ
قـد
حُزتـم
|
|
وحظــوظُ
الشــهرةِ
أحرزتـم
|
|
وبهـا
امـتزتم
بين
الأقران
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
قســـماً
بجميــل
شــروعكم
|
|
فــي
حفــظِ
وصـون
ربـوعكم
|
|
والنصــرَ
حليــفُ
دروعِكــم
|
|
وبيمــن
سـعيد
نحـن
نصـان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
هيـا
اشتبكوا
هيا
اشتبكوا
|
|
وغبــارُ
المعْــرك
محتبــكُ
|
|
والعســــجدُ
هلا
ينســــبك
|
|
إلا
بمقاومـــة
النيـــران
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــبُّ
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
وطــولُ
الحــرب
لهـا
طـربُ
|
|
وإليهــا
النــاجبُ
ينجـذب
|
|
والضــد
لــديهما
مضــطرب
|
|
وحشـاه
يصـير
بهـا
ولهـان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
رؤســاؤكم
هــم
أُسـْد
شـَرى
|
|
كــل
منهــم
للمجــد
شـَرى
|
|
بمزايـاهم
فـاقوا
البشـرا
|
|
فهـم
الأمَـرا
وهـم
الأعيـان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
فبنــو
مصــر
طُــراً
نُجبـا
|
|
ونجيـب
القـوم
الضـيمَ
أبى
|
|
يُبـدون
لدى
الهيجا
العجبا
|
|
أتُـرى
بيـن
الأنجـاب
جبـان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
فــي
الســوْم
ثمــنٌ
غــالِ
|
|
فـي
تاريـخ
الزمـن
الخالي
|
|
ونظــام
الملـك
لهـم
عـالِ
|
|
ولــه
ذكـرٌ
بعـد
الطوفـان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــبُّ
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
وألــوفُ
قــرونٍ
بعـدُ
خلـتْ
|
|
فـي
حكـم
سـواها
مـا
دخلت
|
|
وبأسـْر
الغيـر
لهـا
بخلـتْ
|
|
فمـن
الأبنـا
كـان
السلطان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
فـي
ماضـي
الـدهر
قدْ
بقيت
|
|
تختــاً
لملــوكٍ
قـد
وُقيـتْ
|
|
شــَرَّة
الأغـراب
وقـد
سـُقيت
|
|
أكــوابَ
طِلاحــبِّ
العمــران
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
قــد
حــازت
منزلـةً
عُليـا
|
|
وبــذا
دُعيــتْ
أمَّ
الـدنيا
|
|
وبصــيتٍ
المــوتى
والأحيـا
|
|
فـاقتْ
مجـداً
كـل
البلـدان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
فـي
ذروتهـا
العليـا
صعدت
|
|
مصـر
وعـوادي
الـدهر
عـدت
|
|
فــاحتلت
قهــراً
وابتعـدت
|
|
دهـراً
عـن
ميـزان
الرجحان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
وتــولى
إمرتهــا
الغُرَبـا
|
|
أعجامــاً
كـانوا
أو
عَربـا
|
|
والحــالُ
ينــادي
واحربـا
|
|
والفرصــةُ
تـدرك
بالأزمـان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
ربُّ
الخيـــراتِ
أراد
لهــا
|
|
خيــراً
مــن
ذلــك
بـدّلها
|
|
بأكيــد
العهـد
وبالإيمـان
|
|
وبيمــن
سـعيد
نحـن
نصـان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــب
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|
|
وبنــوكِ
الآن
قـد
افتخـروا
|
|
بوقــائعَ
عُظمـى
وانتصـروا
|
|
ربحوا
في
الغرْوِ
وما
خسروا
|
|
والأعـداء
عـادوا
بالخـذلان
|
|
للحـرب
هلمـوا
يـا
شـجعان
|
حــبُّ
الأوطـان
مـن
الإيمـان
|