“انقلاب الفراشة”
الأبيات 16
| في الليل | |
| حين تبلغ الغواية ذروتها | |
| يتجوّل الحظ المحايد | |
| يهزّ غصن الهوى | |
| لتنفلت عن العُرى، أو تعلقُ بها أٌقدار حائرة | |
| أفلتَ الحظ الأعشى شرنقة | |
| تدحرجت مسافةَ حلمِ يقظةٍ واحد | |
| إنّه كَنَفُ الانحدارات | |
| ضاعت الزوايا | |
| سيّما الاستدارات | |
| كان الهَوِيُّ سخيّاً | |
| ونتوءات الوصول مؤلمة، ومخادعة | |
| وعاد الهَوِيُّ باذخاً | |
| قاربَ اللانهاية | |
| شرنقة ممزّقة وأحلامٌ نزقة | |
| إنه حُلم الأجنحة |