|
أيــا
مـن
تجلـى
فـي
بهـاء
جمـاله
|
وســــر
كمـــاله
وعـــز
ورفعـــة
|
|
تجليـــت
بأســـرار
ســرك
ظــاهرا
|
وأخفيتهــا
بعــد
الظهــر
لحكمــة
|
|
وأبهمــت
أمرهـا
عـن
الخلـق
جملـة
|
ســوى
عــارف
صــفى
مــن
كـل
علـة
|
|
لـه
بالمعـاني
علـم
يـدريها
كيفما
|
تجلـــى
بهاؤهــا
علــى
كــل
هيئة
|
|
محــوت
ســواك
عنــه
محـوا
مؤبـدا
|
وعــاين
حضــرة
المعـاني
القديمـة
|
|
بـــأنوار
علمهــا
بــدت
لفــؤاده
|
وبضــوء
حالهــا
رأتهــا
السـريرة
|
|
لهــا
إدراك
الكمــال
خصــت
بسـره
|
مـن
بيـن
أسـرار
الخلـق
فازت
بعزة
|
|
فلــولا
دنـا
الوصـف
ألبسـت
نفسـها
|
لمـا
احتجبـت
عنها
الأسرار
العالية
|
|
فحســـنك
ظـــاهر
ولكــن
بجهلهــا
|
خفــى
ســره
وهــو
فـي
أقـوى
شـدة
|
|
فصــور
وهمهــا
الوجـود
ولـم
يكـن
|
ومــا
كــان
هــذا
قبــل
إلا
لعلـة
|
|
فلــو
درت
حســنه
فــي
كــل
آيــة
|
لمــا
التفــت
للبعـض
منـه
بنظـرة
|
|
فكــل
جمــال
مــن
جمالــك
أبــرز
|
علـى
ترتيـب
المـراد
بـألطف
حكمـة
|
|
ولمــــا
أردت
للعيـــان
بـــروزه
|
تجليــت
بالكمــال
فــي
كـل
وجهـة
|
|
فقلــــت
لنفســـك
لأعظـــم
ســـرك
|
لمـا
شـئت
كـن
يبـدو
من
أسرع
لمحة
|
|
فهــي
طــوع
المــراد
منـك
حقيقـة
|
وكــل
مــراد
يقضــى
بعــد
الإرادة
|
|
تنزلــت
الأســرار
مــن
بحــر
سـرك
|
وأجـرى
عليهـا
منـك
حكـم
الكثافـة
|
|
وبـدا
ظلال
السـر
فـي
الحسـن
جهـرة
|
وهــي
الــتي
كــانت
عليــه
أدلـة
|
|
وصــورة
فــي
الظهـور
طـوت
جميعـه
|
كمــا
طـوى
سـرها
معـاني
الحقيقـة
|
|
وللـــروح
أكــبر
العقــول
تنــزل
|
وبــاكبر
العقــول
صــارت
كــبيرة
|
|
ومـن
أربـاب
الأذواق
نـالت
علومهـا
|
وهــاجت
فهومهــا
وصــارت
عاليــة
|
|
ودرت
مــا
لـم
تـدره
قبـل
فنائهـا
|
ومنهـا
بـدت
لهـا
الأسـرار
الغريبة
|
|
طـويت
فـي
شـكلها
الأشـكال
جميعهـا
|
وإن
كـانت
فـي
التجلـي
مـالا
نهاية
|
|
فســرها
قـد
أحـاط
بالأشـياء
جملـة
|
وإن
كـانت
بالجسـم
الأشـياء
محيطـة
|
|
فلــو
زال
وصــفها
لزالـت
حجوبهـا
|
ولبـــدت
شمســـها
بنــور
مضــيئة
|
|
ولا
نكشـــف
لســـر
صـــاحب
ســرها
|
حقــائق
أســرار
الوجــود
الخفيـة
|
|
ولكــان
كــل
الكـون
عنـده
مـراده
|
يقلبــه
حقــا
فــي
أســرع
لحظــة
|
|
ولـدرى
سـر
المعنـى
فـي
كـل
مظهـر
|
ولبــدا
وجـه
السـر
فـي
كـل
وجهـة
|
|
ولأيقـــــن
الفــــؤاد
بــــذاتها
|
وأنهــا
وحــدة
مــن
غيــر
ثنيــة
|
|
فمــن
ســر
السرســره
بــدا
جهـرة
|
بــذلك
كــانت
كـل
الأشـياء
خادمـة
|
|
فنقطــة
السـر
بحـر
والحـرف
برهـا
|
ومــن
حرفهـا
الحـروف
بـدت
بحكمـة
|
|
وبــالقنط
والاشــكال
زادت
تباينـا
|
لمـن
لـه
علـم
بالمعـاني
القديمـة
|
|
وقـد
بـدت
جهـرة
مـن
بعـد
سـتارها
|
وراء
لاميــــن
للظهـــور
مشـــيرة
|
|
وبـالنطق
بهـا
تـدري
إن
كنت
فاهما
|
وفيهـا
انتهـت
ريـاس
بحـر
الحقيقة
|
|
فواصـل
فـي
بحـر
الألـى
غـاص
فكـره
|
وكامـــل
زاد
للمعـــاني
الجليــة
|
|
ظهــرت
بــه
ظهـورا
فـي
كـل
مظهـر
|
وليـس
علـى
التحقيـق
سـوى
الحقيقة
|
|
أزالــت
كـل
الأكـوان
عنـد
ظهورهـا
|
ولــم
تكـن
قبـل
المحـو
إلا
لحكمـة
|
|
بهــا
ثبــت
الإبعـاد
للـورى
عامـة
|
توهمتهــا
غيــر
لجهــل
الطريقــة
|
|
فلـو
سـلكوا
حقـا
بـدا
لهـم
سـرها
|
غــاب
جميـع
الفـرق
فـي
كـل
وجهـة
|
|
ولــو
خرجــت
عمـا
بـه
قـد
تعـودت
|
لنـالت
شـفاء
الـروح
مـن
كـل
علـة
|
|
ولصـح
جسـمها
السـقيم
مـن
كـل
مـا
|
أصــابه
مـن
عشـق
الأمـور
العاديـة
|
|
ولبــدت
شــمس
ســرها
فـي
عالمهـا
|
ولأوضـــحت
معنـــاه
كــل
الإضــاحة
|
|
فلــولا
الهـوى
لمـا
احتجـب
نهـاؤه
|
ومــا
النفــس
إلا
للهــواء
مطيعـة
|
|
فلجيـــوش
الهــواء
كــن
متشــتتا
|
نصــحتك
فاقبــل
يـا
لـبيب
نصـيحة
|
|
فــإن
ملــت
فـرت
معنـاك
وتباعـدت
|
وأقبـــل
ليلـــك
برعـــد
وظلمــة
|
|
فـإن
شـئت
بالمعـاني
جمعـك
دائمـا
|
فلا
تمــل
نحــوه
ففـي
الميـل
ذلـة
|
|
ويكفيــك
ســجنك
فــي
قفـص
عالمـك
|
ورؤيـــة
كونـــك
بعيــن
العميــة
|
|
فحـق
البصـير
يفنـى
مـا
سـوى
وجهه
|
وإلا
فلســت
مــن
أربــاب
البصـيرة
|
|
فمــن
لـه
عيـن
الجمـع
أعلا
حقيقـة
|
ومــن
لا
فلا
يــدري
كمــال
الولايـة
|
|
وإن
أبــرزت
علــى
يــديه
خــوارق
|
وظــاهره
علــى
منهــاج
الشــريعة
|
|
فأحوالهــا
تبــدو
علـى
مـن
تـوجه
|
إليهــا
بخدمــة
مــن
أهـل
الإرادة
|
|
وهـذا
لبعـض
القـوم
فـي
حال
سيرهم
|
وتبـدو
لأقـوام
فـي
حالـة
النهايـة
|
|
فــأكثرهم
علــى
اليقيــن
بنـاؤهم
|
فلا
التفــات
لهــم
مــن
أول
وهلـة
|
|
علــت
همـم
الأرواح
للعـالم
الأسـنى
|
بمحــــض
تفضـــل
وجـــود
ومنـــة
|
|
عــاينت
أســرار
المعـاني
بعينهـا
|
ولولاهـا
مـا
رأتهـا
عيـن
السـريرة
|
|
بنورهـا
قـد
بـدت
عـن
طلعـة
وجهها
|
إلـى
عيـن
مـرآة
القلـوب
الصـافية
|
|
فمــن
كنــت
لــه
بـالمنن
مقـابلا
|
رفعــت
عنـه
تلـك
الحجـب
السـاترة
|
|
وعلمتـــه
مــن
العلــوم
لطيفهــا
|
وحققـــت
ســـره
بســـر
الحقيقــة
|
|
وأشــهدته
الســر
المصــون
بســرك
|
وأيقـــن
أن
مـــا
ســواك
لغفلــة
|
|
وبــالقهر
والقضــا
المقــدر
عنـك
|
ســـترت
الأســـرار
وهـــي
جليـــة
|
|
ظهورهـا
قـد
تغطـى
بالكشـف
للغطـا
|
وبالكشـف
للغطـا
اسـتدلوا
البريـة
|
|
فــاقوام
بالآيــات
كـان
اسـتدلالهم
|
وأنـــت
لبعضـــهم
غايــة
الأدلــة
|
|
هنيئا
لمــن
كنــت
عليــك
دليلــه
|
ملازم
للأفـــراح
فـــي
كــل
ســاعة
|
|
ومبســـوط
بســـواك
حـــده
نفســه
|
وروحـه
بـالتحقيق
فـي
أقـوى
نكـدة
|
|
فمبسـوطا
مـن
بـه
ولا
تكـن
بـالهوى
|
ولا
بســط
إلا
بعــد
محــو
البقيــة
|
|
فكـن
سـالكا
حقيقا
في
الجدب
تنتهي
|
ولا
تقنــع
ظــاهرا
بـأمر
الشـريعة
|
|
قليلا
يليـــق
بـــالطريق
لصــعبها
|
وجــل
عبــاد
اللــه
أهــل
شـريعة
|
|
فــإن
ســاوى
الشــيء
فيــك
وضـده
|
تيقـــن
بأكمــل
صــفاء
الســريرة
|
|
وكـن
برزخـا
واحذر
من
الميل
دائما
|
ولازم
مقــام
الحــد
فـي
كـل
عـثرة
|
|
وقـف
علـى
حـد
الشـرع
والزم
كماله
|
وجنــب
مـن
البسـط
المـؤدي
لرخصـة
|
|
فمـن
أطلـق
العنـان
فـي
حـال
سيره
|
فلا
بــد
أن
يعــود
فـي
حـال
شـهرة
|
|
ومـا
التـذت
بـه
النفس
حتما
يمدها
|
سـموم
مـن
أعظـم
السـموم
القاتلـة
|
|
وإن
لـم
يكـن
فـي
الشيء
لذة
طبعها
|
فلا
بــأس
إن
كــان
بـأمر
الشـريعة
|
|
تــورع
إن
الــورع
أعظــم
بانهــا
|
وأولـى
بهـا
حقيقـا
أهـل
الحقيقـة
|
|
ولا
تلتفــت
لمــا
جــرى
بـه
حكمـه
|
فليـس
ذلـك
مـن
شـأن
أهـل
المحبـة
|
|
فكــل
محبــوب
بـالمحبوب
اشـتغاله
|
ناســيا
لمـا
سـواه
فـي
كـل
حالـة
|
|
وإن
جــاءك
مــن
المحبــوب
تعــرف
|
تلقــاه
بــالإجلال
فــي
كــل
دفعـة
|
|
فلــولا
شــيء
يكــدرها
فـي
سـيرها
|
لمـا
صـارت
مـن
بعـد
الكـدر
صافية
|
|
فلا
تنكــر
حكمــه
إذا
بــدا
قهـره
|
فعـن
قريـب
يحلـى
مـن
بعد
المرارة
|
|
مـن
لـم
يكـن
بحـال
مـن
مـات
جهرة
|
فميـــت
عـــن
حيـــاته
الأبديـــة
|
|
ليــس
لــه
علــم
وإن
كــان
لفظـه
|
يشــير
الـى
التحقيـق
كـل
الإشـارة
|
|
أكـــثرهم
فيهـــا
يطــول
كلامهــم
|
وليـس
لهـم
سـوى
الألفـاظ
العاريـة
|
|
مــن
كـان
فـي
كـل
الهـوى
متمكنـا
|
فكيـف
يـدري
حقيقـا
علـم
الحقيقـة
|
|
علمهـا
نـور
يبـدي
عـن
سـر
وجههـا
|
وتشـــهده
منــك
الأرواح
الصــافية
|
|
قولهـــا
يعجــب
النفــوس
ســماعه
|
واولــى
بــه
مــن
أشــد
المـرارة
|
|
فـــر
منــه
النفــوس
كلا
بأســرها
|
ســوى
نفــس
كــانت
بـالمنن
ممـدة
|
|
لــى
عهـدها
الأول
لـم
تنقـض
أمـره
|
ســبقت
لهــا
عنــد
الإلاه
السـعادة
|
|
ا
عــزم
دائمـا
وحـزم
بيـن
الـورى
|
خــادم
لأهــل
الفــن
أشــد
خدمــة
|
|
لــى
ســبيل
الإجلال
والحــب
دائمـا
|
وليـس
لهـا
اعـتراض
فـي
كـل
حالـة
|
|
عــم
الــتي
كــان
محلهــا
هكــذا
|
تنــال
مــن
الحكيــم
أعظـم
حكمـة
|
|
يــا
سـعد
مـن
كـان
إليـه
مجـاورا
|
علـى
بسـاط
التعظيـم
فـي
كـل
ساعة
|
|
عضــه
قــد
كنــا
إليـه
ولـم
نكـن
|
بكلــه
ونلنــا
اقترابــا
ووصــلة
|
|
وأيـن
هـم
فـي
الوجـود
قـل
وجودهم
|
فــأكثر
أهـل
الـوقت
أربـاب
دعـوة
|
|
وقـد
ضـاع
أدب
المريـد
فـي
وقتنـا
|
وواصــلون
لهــا
بمحــض
الكرامــة
|
|
فلـــولا
رجالهـــا
يمــد
بوصــفها
|
حقيقـا
مـا
نلنـا
منهـا
كقـدر
حبة
|
|
وقــد
ملئت
كــل
النفــوس
بوصـفها
|
وفنـت
عـن
جملـة
الأوصـاف
العاليـة
|
|
بفضـــله
قــد
جــاد
الإلاه
بجــوده
|
وليــس
للفضــل
منــه
وجــود
علـة
|
|
فمـن
لـم
يـزل
عنـه
الحجـاب
بفضله
|
يعــوم
فــي
سـره
وعنـه
فـي
غفلـة
|
|
ولا
شــيء
غيــر
ســرك
بــدا
جهـرة
|
لـــذلك
صــارت
معــانيه
مســتترة
|
|
ظهــرت
بــأنواع
الجمــال
حقيقــة
|
وســــميته
كلا
باســـم
للخليفـــة
|
|
فكـــان
نهايــة
اســتتار
ظهــوره
|
وهــذا
مـن
أعظـم
الحكـم
البالغـة
|
|
وخصصــــت
آدم
بســــر
علومهــــا
|
وأعجــزت
ســكان
السـماء
العاليـة
|
|
وحققـــت
أحمـــد
بكـــل
حقيقـــة
|
عـبرت
عليهـا
منـك
الأسماء
البديعة
|
|
لأنــــه
نــــورك
وســـر
جمالـــك
|
وبحــر
كمــا
لــك
وأعظــم
نعمــة
|
|
هـو
المظهـر
الأعلـى
وسـر
المظـاهر
|
بـــأنواره
كــل
الأشــياء
منيــرة
|
|
بعيـن
البقـاء
يـراه
من
كان
فانيا
|
وهـذا
لبعـض
القـوم
بعـد
النهايـة
|
|
وليـس
مـن
الأحـوال
مـا
صـح
عنـدنا
|
ولكــن
شــريعة
المعـاني
القديمـة
|
|
وللقبضــة
علــم
مــن
أدرك
علمهـا
|
عالمــا
يصــير
بالأسـرار
الغريبـة
|
|
أفاضـت
مـن
نـوره
الأنـوار
جميعهـا
|
ومـــن
ســـره
الأســرار
كلا
ممــدة
|
|
ومـن
بحـره
العلـوم
فاضـت
بأسـرها
|
علـى
بـاطن
العرفـان
بـأعلى
حكمـة
|
|
ومــن
نــور
عقلــه
عقــول
تنـورت
|
لــذلك
صــارت
أهلا
لنيـل
الطريقـة
|
|
وهــام
كــل
الأرواح
منهــم
بفكـرة
|
وعــاينت
أســرار
الأسـرار
الخفيـة
|
|
وللــروح
قــوة
علــى
حمــل
ســره
|
مـن
بيـن
نفـوس
الخلـق
فـازت
بقوة
|
|
علـى
الحالـة
الأولى
جاءت
لنا
أولا
|
ومـدها
علـم
الفـرق
فـي
حـال
فطرة
|
|
وقبــل
اجتماعهــا
بعــالم
جسـمها
|
كــانت
مــن
علـوم
روحهـا
مسـتمدة
|
|
لهـا
علـم
بالأسـرار
تـدريها
دائما
|
بعقــــل
وروح
جــــوهرة
نفيســـة
|
|
وجســـم
لحكمـــة
وبـــه
تكلمـــت
|
وبســره
صــارت
فــي
الأرض
خليفــة
|
|
وهنـا
بـدت
معـاني
الـذات
لنفسـها
|
ولكـن
بعـد
انفصـال
عـن
كـل
عـادة
|
|
فكـــل
حقيقـــة
بضـــدها
أظهــرت
|
وليسـت
علـى
التحقيـق
سوى
الحقيقة
|
|
تنزلـــت
الأســرار
جهــرا
لحكمــة
|
وبأسـرار
النـزول
صـارت
فـي
رفعـة
|
|
تنـزل
لهـا
إن
شـئت
تـدري
نزولهـا
|
وإن
كـانت
فـي
المعالي
كانت
عالية
|
|
فمـن
لـم
يكـن
عبـدا
لكـل
عبيـدها
|
علــى
مـذهب
تحقيـق
أهـل
الحقيقـة
|
|
فلا
يــدري
سـرها
الـذي
بـدا
جهـرة
|
وإن
كــانت
ألفــاظ
المقـال
قويـة
|
|
فكــل
علــم
لا
يصـحب
الفعـل
جنبـه
|
فــإنه
بــالتحقيق
خـالي
الحقيقـة
|
|
وكــل
صـورة
الفعـل
يبقـى
خيالهـا
|
تشــاهدها
الأســرار
فارحـل
بسـرعة
|
|
وقلـد
سـيوف
الجمـع
واركـب
خيولها
|
وقاتـل
جيـوش
الـوهم
فـي
كـل
ساعة
|
|
ولا
تقنــع
بعلــم
الفــروق
قناعـة
|
فـــأكثر
أهلــه
جهــال
الطريقــة
|
|
وفــي
علـوم
المعـاني
كـن
متبحـرا
|
ولا
تـزد
مـن
سـواها
فـوق
الكفايـة
|
|
فكـم
عـارف
نـال
المعـالي
ببعضـها
|
ونــال
مــراده
فــي
أقــرب
سـاعة
|
|
وكـم
تـالف
لـه
الكـثير
مـن
أمرها
|
وقلبـــه
معلـــوم
بـــأعظم
علــة
|
|
فعلــم
فــي
القلــب
يهـديك
نـوره
|
ويرشــدك
إلــى
الطريــق
الناجيـة
|
|
وجهــل
لـه
ظلام
فـي
النفـس
دائمـا
|
يســـيرها
إلـــى
البلاد
الخاليــة
|
|
فمـن
لـه
عيـن
العلـم
يـرى
بنورها
|
ومـن
لـه
عيـن
الجهل
أعمى
البصيرة
|
|
ســتر
رداء
الــوهم
مــرآة
قلبــه
|
وأغشـــاه
ليلـــه
بأقبــح
ظلمــة
|
|
وأبـــرز
خيــال
الأكــوان
توهمــا
|
وأثبتهــا
العقــل
القصـير
لغفلـة
|
|
أبصـــر
ظــاهر
الأكــوان
بعينهــا
|
وصـــارت
كلا
فـــي
لبــه
مســتقرة
|
|
فنـــاظر
للأشــياء
بعيــن
ذاتهــا
|
جاهــل
وإن
قــام
برســم
الشــرعة
|
|
ومبصــرها
بنورهــا
عيــن
صــفاته
|
لــه
علـم
ببعـض
الأسـرار
العاليـة
|
|
وناظرهــــا
بعيـــن
ذات
جمـــاله
|
ولايتـــه
أعلا
مـــن
كـــل
ولايـــة
|
|
فـإنه
فـي
أقصـى
الكمـال
إذا
صـحا
|
إلا
فمغــروق
فــي
بحــر
الحقيقــة
|
|
وواقــف
بيـن
العـالمين
ولـم
يمـل
|
كــثيرا
هــو
الإمــام
عنـد
الأئمـة
|
|
لــه
رؤيــة
فــي
الشـيء
لـم
يكـن
|
ســوى
لفظــه
المشــير
بـه
لحكمـة
|
|
فرؤيــة
الكــون
بالمعـاني
عزيـزة
|
ومــن
عــثر
عليهــا
فــاز
بعــزة
|
|
فكــن
متـم
السـلوك
إن
شـئت
وصـلة
|
وجنــب
دســائس
النفــوس
الخفيــة
|
|
وإن
غفلـت
نفـس
جـالت
فـي
عالمهـا
|
وأهواهـا
حسـنها
المجـازي
في
لمحة
|
|
وتعظــم
ظلمــة
النفــوس
بليلهــا
|
وتـأتي
لـك
الأوهـام
مـن
كـل
وجهـة
|
|
وتبــدو
لــك
صــورة
ظــاهر
نفسـك
|
وتنطبــع
فيهــا
الأشـياء
الفانيـة
|
|
فــالمعنى
إن
كـانت
صـافية
للمـرا
|
وإن
كــانت
بالكــدر
للحــس
مـرآة
|
|
فكـــل
شـــىء
تقـــابله
بســـرها
|
يقابلهــا
والمعنــى
أشــرف
حالـة
|
|
وهمـة
مـع
أسـباب
تقتضـي
جميـع
ما
|
فـي
الـوقت
تريـده
فـي
أسـرع
لمحة
|
|
بتلــك
الســريرة
قـام
سـر
وجـوده
|
بقــــدرته
وحكمتــــه
العاليـــة
|
|
فكــن
جامعــا
لشــأن
همــة
ســرك
|
علـى
محبـوب
القلـوب
تعطـى
الولاية
|
|
وتـأتي
علـوم
النفـس
كالسيل
نازلا
|
فلــم
يحصـها
سـوى
كـبير
العنايـة
|
|
وتلـــك
علامـــة
تجلــى
معانيهــا
|
بــوجه
جمالهــا
لعيــن
الســريرة
|
|
وقـد
بـدا
فـي
الأزل
للروح
كيف
شاء
|
كــذلك
يبــدو
فــي
الأبــد
لحكمـة
|
|
فكـــل
أوجـــه
إذا
صــفا
مرآهــا
|
لـذاك
يبـدو
إليهـا
فـي
كـل
وجهـة
|
|
فــأنت
بهــا
عظيـم
الجـاه
ولكنـي
|
أراك
عــن
ســرها
فـي
أعظـم
غفلـة
|
|
فـإن
كنت
في
الصورة
خلقا
فيما
يرى
|
فــأنت
فــي
غيرهــا
أمـور
عظيمـة
|
|
تكـل
عنهـا
الأفهـام
فـي
شـرح
سرها
|
تحيـر
فـي
فهمهـا
العقـول
الراشحة
|
|
فكــل
واصــل
كــل
عنهــا
لســانه
|
وكاملنــا
يــأتي
بلفــظ
الأشــارة
|
|
فلــو
صـح
لـك
العلـم
بـامر
سـرها
|
لكنـــت
بقــدرها
عظيــم
المزيــة
|
|
فلازم
خمولهــا
بيـن
الجنـس
دائمـا
|
ففيــه
صــفاء
السـر
مـن
كـل
علـة
|
|
فبقــدر
دفنهــا
فـي
عـالم
فرقهـا
|
يتجلــى
أمرهــا
لعيــن
البصــيرة
|
|
فلازم
وصــف
العبيــد
وكـن
عُبيـدهم
|
ودع
عنــك
جملــة
الأوصـاف
العليـة
|
|
بهـــا
بعـــدت
عــن
الإلاه
حقيقــة
|
ولــو
دنــت
للأدنـى
لصـارت
عاليـة
|
|
فلـولا
قمييـص
الـذل
مـا
صـح
عزهـا
|
ولـولا
رداء
الفقـر
مـا
طـابت
لـذة
|
|
فخــذها
الـى
الـثرى
بـألطف
حكمـة
|
تأتيـك
مـن
المعـالي
بـأعلى
حكمـة
|
|
فلا
علــم
لمــن
كــان
يوصـف
نفسـه
|
فنـــور
نهـــاره
محجــوب
بظلمــة
|
|
ولا
جهــل
لمــن
زالـت
ظلمـة
ليلـه
|
وبـــدت
شموســـه
بنـــور
مضــيئه
|
|
إذا
شئت
معنى
السر
فأدر
الى
الثرى
|
ولا
ترفـع
منـك
عضـوا
فـوق
البريـة
|
|
فلـو
كنـت
تـدري
معنـى
سـر
وجودهم
|
لكنــت
لهــم
مجلا
فــي
كــل
حالـة
|
|
فعلـم
علـى
التحقيـق
يخـرق
كـونهم
|
ويفنــي
وجــودهم
فـي
أسـرع
لمحـة
|
|
وتبــدو
لــك
حقيقــة
كــل
مظهــر
|
وتـدري
بعـد
التحقيـق
معنى
مقالتي
|
|
فكــل
علــم
لا
يــأتي
بــك
لذلــة
|
فلا
بــد
أن
تأتيــك
منــه
المذلـة
|
|
فكـن
كالـذي
صـارت
نفوسـهم
كالفضا
|
وهــامت
كــل
الأرواح
منهـم
بفكـرة
|
|
وأظهــرت
لهــم
منــه
أعظــم
آيـة
|
فــي
بــاطنهم
فاسـتجمعت
كـل
آيـة
|
|
ولنفســـهم
بــدت
حقيقــة
نفســها
|
وطــوت
علــى
التحقيـق
كـل
حقيقـة
|
|
بـــأعظم
علمـــك
ظهـــرت
لأهلـــك
|
بأكمـــل
ســـرك
لعيــن
الســريرة
|
|
أزلـــت
وجـــودهم
بســـر
وجــودك
|
وليــس
لهــم
وجــود
قبـل
الإزالـة
|
|
فكنــت
ولــم
يكــن
ســواك
حقيقـة
|
سـوى
تلـوين
الجمـال
زاد
فـي
عـزة
|
|
تعـــاليت
عمــا
لا
يناســب
حالــك
|
لأنـــك
مفــرد
بالــذات
العاليــة
|
|
فللــه
مــا
أظهــر
ســر
جمالهــا
|
وللــه
مــا
أخفــى
بــألطف
حكمـة
|
|
حكمـت
علـى
الأسـرار
بالستر
والخفا
|
وهــي
كشــمس
الأفــق
حيــن
تجلــت
|
|
لشـــدة
كشــفها
أخفيــت
ظهورهــا
|
سـترها
عـن
أهـل
انطمـاس
البصـيرة
|
|
يرونهــا
والعقــل
القصـير
يظنهـا
|
ســـواها
وهــي
عيــن
كــل
آنيــة
|
|
فبســـر
اســمك
القهــار
ســترتها
|
لــك
الحمــد
أنعمــت
بـأعظم
منـة
|
|
رفعـت
رداء
القهـر
عـن
عيـن
سـرنا
|
نظرنــا
بهــا
إليهـا
أحسـن
نظـرة
|
|
تمتعنــا
فــي
بهـاء
حسـن
جمالهـا
|
رأيناهــا
عيانــا
بعيـن
العاليـة
|
|
فرؤيتهــا
شــرع
لأهــل
كمــا
لهـا
|
بعيــن
معانيهــا
تفهــم
إشــارتي
|
|
وغايـــة
ســـرها
وأعظــم
أمرهــا
|
لقطـــب
جمالهــا
وخيــر
البريــة
|
|
لأنـــه
شمســـها
ونـــور
بهائهــا
|
وعيــن
كمالهــا
وبحــر
النهايــة
|
|
فلا
أحـــد
يحـــوم
حـــول
مقــامه
|
لقــوة
أنــوار
التجلــي
العظيمـة
|
|
وجبريـل
فـي
الإسـراء
لـو
زاد
خطوة
|
لأحرقــت
جســمه
الأنــوار
القويــة
|
|
فــذلك
مقــامه
فــي
القـرب
وحـده
|
وأحمــد
زاد
فــوق
مــا
لا
نهايــة
|
|
فلـو
بـدا
مـا
بدا
إلى
الورى
جملة
|
لأفنــى
وجــودهم
فــي
أسـرع
لمحـة
|
|
ويكفيــك
فـي
الجبـل
حكـم
سـلطانه
|
ولـــو
بـــدا
بأشــياء
كلا
لــدكت
|
|
ولمــا
راى
الكليــم
أعظــم
أمـره
|
صــار
داهشــا
وغــاب
أعظـم
غيبـة
|
|
ويكفيــك
فــي
الجبـل
محـو
وجـوده
|
ممـا
بـدا
لـه
مـن
تجلـي
الحقيقـة
|
|
حـرام
علـى
مخلـوق
أن
يـرى
وجههـا
|
ولكـن
بهـا
تـرى
الأسـرار
العظيمـة
|
|
فعينهــا
علمهــا
وبــه
البصــائر
|
تشــاهده
عيانــا
فــي
كــل
حالـة
|
|
وإن
بـدا
فـي
الأشـياء
أفنى
وجودها
|
ولـم
يبـق
غيـر
اللفـظ
منها
لحكمة
|
|
وبقـــدرة
قـــوة
الأرواح
لشــهوده
|
لــو
زاد
لهــا
فـي
التجلـي
لـدكت
|
|
وذلـــك
شـــيء
فـــي
الأزل
مقــدر
|
وإن
شـاء
زاد
شـاء
ربنا
في
العطية
|
|
ولأقـــوم
تجلــى
لــو
بــدا
ســره
|
لمــن
دونهــم
لامتحــت
كــل
آنيـة
|
|
وذاك
لهــم
بقــدر
ســر
اقـترابهم
|
وقربهــم
بقــدر
صــفاء
المرايــة
|
|
ومرآتهـــم
تجلــى
بحســب
زهــدهم
|
وزهــدهم
بقــدر
الهمــم
العاليـة
|
|
وأجنحــــة
الأرواح
ســـر
هممهـــا
|
وإن
علــت
الهمــة
صــارت
عاليــة
|
|
فمــن
كــان
رافعـا
لمقـدار
نفسـه
|
فلا
شــيء
لـه
فـي
الرتـب
العاليـة
|
|
وإن
كــان
علمــه
كــثيرة
وصــومه
|
فهـــذا
طريـــق
لا
ينــال
برفعــة
|
|
ولكــن
بخلـع
النفـس
عـن
كـل
لـذة
|
وتغييبــه
عنهــا
وعــن
كـل
غيبـة
|
|
وأنفـع
علـم
يـدنو
بـك
إلـى
الثرى
|
وغيـــره
يرفعـــك
أقبـــح
رفعــة
|
|
فكـن
مبصـرا
في
السير
إن
شئت
وصلة
|
ولا
وصــل
إلا
بعــد
محــو
البقيــة
|
|
ولا
محـــو
إلا
بعــد
دفــن
وجــودك
|
ولا
دفـــن
إلا
بعـــد
فقــر
وذلــة
|
|
ولا
حقـــا
إلا
مـــن
طيـــب
نفســك
|
ولا
ذل
إلا
جهـــرا
بيـــن
الأحبـــة
|
|
فمــن
كــان
للعــز
محبـا
وللغنـى
|
فمعبــوده
الهــوى
علــى
أي
حالـة
|
|
فجــانب
كـل
مـا
مـال
قلبـك
نحـوه
|
ســوى
حبــه
الصــفي
مـن
كـل
علـة
|
|
ولا
رخصــة
للقـوم
فـي
حـال
سـيرهم
|
لأنهـــا
لأهـــل
الهمــم
الضــعيفة
|
|
وأنــت
مقــام
القـوم
تريـد
وصـلة
|
فهــو
يعــد
الصـفاء
مـن
كـل
علـة
|
|
فخـذ
منهـاج
العرفان
واسلك
سبيلهم
|
ولا
تقتـــدي
بــأكثر
أهــل
نســبة
|
|
حكمـوا
علـى
الأسـرار
بالقول
دائما
|
وحلـوا
قيـود
النفـس
فـي
كـل
شهوة
|
|
وزال
خصــيم
النـور
وأفنـى
وجـوده
|
وجــاء
رضــاء
النفــس
بكــل
علـة
|
|
فلا
علــم
لمــن
كـان
عنهـا
راضـيا
|
أحـاطت
بـه
الأهـواء
مـن
كـل
وجهـة
|
|
ولا
جهـــل
كـــان
عليهــا
ســاخطا
|
مــن
أجــل
عصـيانها
لـرب
البريـة
|
|
وقـد
كـانت
بحـر
السـر
وهـي
أميرة
|
وجــاءت
لتـدري
معنـى
سـر
الإمـارة
|
|
فملكهــا
الهــوى
وصــارت
مـأمورة
|
عليهـا
أميـر
الكـون
بـأعلى
سـطوة
|
|
لهــا
صـفة
الإنسـان
والطبـع
أغلـظ
|
وأقـوى
مـن
الحمـار
فـي
حـال
زفرة
|
|
فـأين
حقيقـة
الإنسـان
الـتي
كـانت
|
عليهــا
عنــد
الإيجــاد
أول
نشـأة
|
|
فكـــن
مخلصـــا
وأخلـــص
الـــذي
|
وكــن
بــريئا
مـن
كـل
حـول
وقـوة
|
|
وكـــن
بـــالإلاه
معتصــما
بقلبــك
|
وقـل
يـا
سـلام
سـلم
مـن
كـل
فتنـة
|
|
ولازم
كتــاب
اللــه
واحكـم
بحكمـه
|
وســـنة
أحمـــد
إمـــام
الأئمـــة
|
|
وعــالم
وارع
فــي
دنيــاه
زاهــد
|
فكــن
عنــه
آخــذ
لأمــر
الشـريعة
|
|
ومـن
كـان
سـالكا
ومجـدوبا
دائمـا
|
ولا
أخــذ
إلا
عــن
شــيوخ
الطريقـة
|
|
كمثـــل
أســـتاذي
لقـــوم
مثلــه
|
وفخــري
بـه
طـرا
علـى
أهـل
نسـبة
|
|
وبــه
علــى
الــورى
أصـول
حقيقـة
|
وأخشــــى
إلا
مـــن
إلاه
البريـــة
|
|
فجملــة
أهــل
الـوقت
تحـت
لـوائه
|
عــارف
بأحكــام
النفــوس
الخفيـة
|
|
لـه
همـه
إن
قـال
للشـيء
كـن
يكـن
|
يعــز
إذا
شــاء
يــذل
فــي
لحظـة
|
|
تمـــد
مــدد
الخلــق
همــة
ســره
|
جميــع
همـم
الخلـق
فـي
كـل
حاجـة
|
|
يقلـــد
فــي
الأمــور
كلا
بأســرها
|
فـي
حكـم
الحقيقـة
وأمـر
الشـريعة
|
|
فمـن
لـم
يـدر
معنـى
سـلوك
طريقـه
|
حقــت
لـه
جملـة
الأحمـال
الظـاهرة
|
|
لمثلـه
كـن
عبـدا
تنـال
كـل
المنى
|
وتبلــغ
منتهــى
الأسـرار
العاليـة
|
|
وكــن
لأهـل
علـم
المعـاني
مجـاورا
|
تمــد
مــن
الأسـرار
فـي
كـل
دفعـة
|
|
فعـن
رجـال
الأفكـار
تـروي
عقـولهم
|
علـى
صـفة
التلقيـن
فـي
كـل
سـاعة
|
|
ويكفيـك
بعـد
الفـرض
مـا
هـو
آكـد
|
لأنـــك
حامـــل
لحمـــل
الطريقــة
|
|
وقــل
مــن
كــان
للجهـتين
عـامرا
|
فــأكثر
أهــل
اللــه
لإحــدى
جهـة
|
|
تــوجه
إلـى
المعـاني
حيـث
تـوجهت
|
ودر
معهــا
ســريعا
فــي
كـل
دورة
|
|
وكـن
حريصـا
علـى
الأنفـاس
جميعهـا
|
فمطلوبهــــا
كلا
بفكـــر
ونظـــرة
|
|
وذكــر
بجمــع
القلـب
جـاء
حقيقـة
|
وبـه
اسـتقام
حبـال
أهـل
الطريقـة
|
|
وإن
كــبر
العيــان
بحكــم
قهــره
|
علـى
سـائر
الأحـوال
فـي
كـل
سـاعة
|
|
ومالـــك
للأحـــوال
هــو
إمامنــا
|
بـه
يقتـدي
الجميـع
فـي
كـل
حالـة
|
|
تعلـــق
بســـره
تخلـــق
بوصـــفه
|
تحقــق
بوصــف
الفقـر
تحظـى
بعـزة
|
|
علـى
منهـاج
الكمـال
امـش
ولا
تخـف
|
وخــل
عصــاة
الخلــق
وأهـل
طاعـة
|
|
وجنـب
جميـع
النـاس
واحـذر
غرورهم
|
ومــدعي
الفقــر
جهـرا
أكـبر
غـرة
|
|
ومــن
علمــه
فــوق
الــورى
جملـة
|
وفهمــه
أعلــى
مـن
جميـع
البريـة
|
|
فهــذا
اجهــل
النــاس
كلا
بأسـرهم
|
فنظــرة
منــه
تــأتي
بـألف
ظلمـة
|
|
وعــالم
بــه
كـل
مـا
ازداد
علمـه
|
وفهمـــه
عنــه
زاد
فقــرا
وذلــة
|
|
فخــل
ســوى
مـن
كـان
لـك
موافقـا
|
حقيــرا
فقيــرا
راض
بكــل
محنــة
|
|
ضـعيفا
عاجزا
خامل
الذكر
في
الورى
|
وجـل
جميـع
النـاس
عنـه
فـي
غفلـة
|
|
فواضـــــعه
ورافعــــه
كلاهمــــا
|
لشــغله
بــالمحبوب
فـي
كـل
سـاعة
|
|
وأيـن
هـذا
فـي
النـاس
قـل
مثـاله
|
فســـيدهم
معلـــول
بكـــل
علـــة
|
|
إذا
مـــدح
أو
بالعطـــاء
وجهتــه
|
أتـــاك
ســريعا
مظهــرا
للمحبــة
|
|
وإن
كنــت
لــه
بالمذلــة
واجهــا
|
علـى
حـذر
كـن
منـه
فـي
كـل
طرفـة
|
|
فيــا
أســفا
علـى
الـذين
تقـدموا
|
كــانت
لـه
نفـس
بالمجـاري
راضـية
|
|
يرونهـا
مـن
عيـن
المعـاني
حقيقـة
|
يحبونهـــا
إجلالا
أشـــد
المحبـــة
|
|
إذا
وجهــوا
بالــذم
تــرى
وجـوهم
|
بنـــور
كأنهـــا
شـــعاع
الأهلــة
|
|
وإن
منعــوا
زادوا
فرحــا
ونشــوة
|
فهكــذا
حـالهم
فـي
أمـر
البدايـة
|
|
كـانت
لهـم
أخلاق
كـرام
مـع
الـورى
|
وأوقـــاتهم
بيــن
حضــور
وغيبــة
|
|
ووقتنـا
بـالتحقيق
قـد
سـار
جلنـا
|
يطـوف
علـى
الـدرهم
فـي
كـل
سـاعة
|
|
ويسـعون
عنـد
الخلـق
رفعـه
قـدرهم
|
ويطمــع
فـي
درك
العلـوم
النفيسـة
|
|
هيهــات
مـا
كـان
هكـذا
مـن
تقـدم
|
وقـد
كـانوا
أصـحاب
الهمم
العالية
|
|
نظرهـــم
للمحبــوب
نحــو
جمــاله
|
تيقنـــوا
أن
مــا
ســواه
لغفلــة
|
|
فليــس
شــيء
سـوى
الجمـال
حقيقـة
|
ظهــر
منـه
مـا
كـان
مخـبى
بحكمـة
|
|
ومــا
زاد
فيــه
شـيء
سـوى
بـروزه
|
علــى
حســب
ترتيــب
حكــم
الإرادة
|
|
ومــا
نقــص
وإن
أخفـى
الأمـر
سـره
|
وصـــور
وهمـــك
وجــود
الخليقــة
|
|
فلقلـــة
التحقيـــق
منــك
بحقــه
|
ولفقـد
العلـم
غـابي
عنـك
الحقيقة
|
|
ولـو
جـاءك
علـم
المعاني
التي
بدت
|
لكنــت
مــن
أعظــم
هنــاء
وراحـة
|
|
وقـد
كـان
كـل
سر
منها
لسرنا
منها
|
ولكــن
أخفــاه
الــوهم
لأجـل
علـة
|
|
علــى
مــرآة
القلـوب
بـدت
سـحابة
|
إثــر
ريــاح
الوصــف
أتـت
بظلمـة
|
|
إذا
شـئت
أن
تحيـى
فمـت
فـي
حياتك
|
ولا
خيـر
فيمـن
حـتى
تـأتي
المنيـة
|
|
فمـن
حيـا
قبـل
المـوت
ماتت
حياته
|
ومـن
حيـا
بعـد
المـوت
حيـا
حقيقة
|
|
وأصـــعب
شــيء
فقــر
ثــم
مذلــة
|
فلــذ
بهمــا
تكــن
كـبير
الولايـة
|
|
فمـن
لـم
يكـن
بالفقر
والذل
راضيا
|
فأســرار
أهــل
اللـه
عنـه
بعيـدة
|
|
فتسـليط
الجنس
فرض
في
السير
فادره
|
ويبلــى
ذاك
البلاء
عنــد
النهايـة
|
|
فمــا
مــن
صـادق
إلا
قـاموا
بحجـة
|
عليــه
ولكــن
أذنــه
قــد
تصــمت
|
|
لــه
همــه
عليــا
بــالله
تعلقـت
|
وروح
منـه
اشـتاقت
إلـى
سـر
حضـرة
|
|
وأكــبر
عقــل
منــه
للعلـم
مقبـل
|
وقلــب
إلــى
محــل
نــزول
حكمــة
|
|
وســـر
لعيـــن
بحــر
ذات
جمــاله
|
لهــا
نــاظر
بنـور
عيـن
الحقيقـة
|
|
ونفسـه
فـي
المثـال
صـارت
كأرضـنا
|
ســوت
تحــت
أقـدام
جميـع
البريـة
|
|
فلا
زال
يــدنوها
وينســى
حظوظهـا
|
حــتى
زال
وصــفها
وصــارت
عاليـة
|
|
تغـوص
فـي
بحـر
السـر
يسـر
فكرهـا
|
وتــأتي
بأشــرف
العلـوم
النفيسـة
|
|
فلــم
تروهاهنــاك
إلا
عــن
نفسـها
|
فــي
عــالم
ســرها
بصـح
الروايـة
|
|
فواســطة
الإلهــام
أميــن
وحيهــا
|
يـأتي
لهـا
بـالتبليغ
فـي
كل
ساعة
|
|
فإنهـــا
نقطــة
الجمــال
حقيقــة
|
مـن
النقطـة
الكـبرى
بـرزت
لحكمـة
|
|
تقـــدم
ولا
تخــف
فنارهــا
ســاعة
|
ونورهــا
دائم
مــن
شـمس
الحقيقـة
|
|
فطهرهــا
تطهيــرا
ظـاهرا
وباطنـا
|
وخــذها
ولا
تخــف
مـن
هـول
وفتنـة
|
|
فإنهــا
ســر
اللــه
قطــب
جمـاله
|
فمنهــا
نـال
الوجـود
عـزا
ورفعـة
|
|
عليهـــا
تــدور
أفلاكــه
جميعهــا
|
وأنـــواره
منهـــا
تلــوح
بقــوة
|
|
فلــولا
الهـوى
لضـاء
نـور
بهائهـا
|
علـى
سـائر
الأقطـار
فـي
كـل
سـاعة
|
|
فشــمس
عالمنـا
مـن
نورهـا
أبـرزت
|
وأنجمــــه
منهـــا
كلا
مســـتنيرة
|
|
وأنـــوار
أفلاك
الأفـــق
بأســـرها
|
ومنهــا
مـدد
الكـل
فـي
كـل
لمحـة
|
|
وبهــــا
علــــوا
الإلاه
جميعهـــم
|
وصـاروا
ملـوك
الكـل
في
أعلى
رتبة
|
|
يجــروا
ذيـول
العـز
حيـث
توجهـوا
|
وحـــالهم
الغنــى
بــرب
البريــة
|
|
عظــم
اكتفــاؤهم
وكفـاهم
كـل
مـا
|
يهمهـــم
بفضـــل
وجـــود
ومنـــة
|
|
وإن
أصـيبوا
فـالحفظ
حـال
قلـوبهم
|
ومـن
أولـى
منهـم
بـالأمور
العظيمة
|
|
فهــم
معــه
معيــة
الحـال
دائمـا
|
وذاك
فــوق
طــور
العقـول
الرشـحة
|
|
فلـم
يـدر
حـالهم
فـي
القرب
سواهم
|
وكـل
جميـع
الخلـق
عنهـم
فـي
غفلة
|
|
فلـو
نـادتهم
كـل
الأشـياء
بصـوتها
|
لمـا
التفتـوا
إليهـا
بـأدنى
لمحة
|
|
يباشــرونها
والقلـب
عنهـا
بمعـزل
|
مليـــء
حقيقــة
بنــور
الحقيقــة
|
|
مـن
أجلكـم
أكـرم
الإلاه
كـل
الـورى
|
وصـار
عصـاة
الخلـق
فـي
ظـل
رحمـة
|
|
تطيـــب
الأمــاكن
بــذكر
ســماعهم
|
وتعلـو
فـوق
الإمكـان
وقتـا
بجلسـة
|
|
وإن
دامـوا
صـار
في
المعالي
مقامه
|
كــأنه
كــوكب
منيــر
فــي
رفعــة
|
|
فبســــرهم
دار
الفلـــك
لحكمـــة
|
وحــرك
أقطــار
الوجـود
فـي
لمحـة
|
|
فمفتــاح
أبـواب
العلـوم
بأيـديهم
|
وســر
العطـاء
موهـوب
بلمـح
نظـرة
|
|
وكــل
مــدد
الخلــق
منهـم
جميعـه
|
بـــأنعم
فضــله
أو
بعــدل
نغمــة
|
|
فمـن
نـار
قبضـهم
لظـى
صـار
حرهـا
|
عــذابا
لأقــوام
مجانــا
مـع
ذلـة
|
|
ومــن
نــور
بسـطهم
جنـان
تزخرفـت
|
بهــاء
وأنــوار
سـرورا
مـع
بهجـة
|
|
وأنهارهــا
بســرهم
فــاض
خمرهــا
|
وأغصــانها
نــادت
بــألطف
نغمــة
|
|
وبنـــورهم
حــور
العيــن
تنــورت
|
وولــــدانها
المســـخرة
لخدمـــة
|
|
وزينــة
عــرش
اللـه
بعـض
جمـالهم
|
ولــو
بــدا
ســرهم
للأشـياء
لـدكت
|
|
وســرهم
نقطــة
مــن
بحـر
حبيبنـا
|
ومولانــا
أحمــد
العظيــم
العطيـة
|
|
فمـــن
بحـــر
ســر
عليــه
صــلاته
|
سـقاهم
صـفاء
الشـرب
مـن
طيـب
لذة
|
|
ومــــن
نــــور
عليــــه
ســـلامه
|
كســاهم
حــال
العــز
أشـرف
لبسـة
|
|
ومــن
عقلــه
عقــولهم
قـد
تنـورت
|
ومـــن
روحــه
أرواحهــم
مســتمدة
|
|
ومــن
علمــه
الأعظــم
لهـم
مـواهب
|
تفــوق
لجــج
البحرفـي
أقـوى
شـدة
|
|
وبــه
نجــوا
مـن
الهمـوم
جميعهـا
|
وبـــه
كـــانت
حيـــاتهم
أبديــة
|
|
وخصــوا
بسـره
الخفـي
بيـن
الـورى
|
وأعطـاهم
منـه
قربـا
فـوق
الخليقة
|
|
ولا
زالـوا
فـي
ارتقـاء
نحـو
كماله
|
حــتى
بـدت
صـورة
الحـبيب
البهيـة
|
|
كـأن
سـواها
فـي
المظـاهر
لـم
يكن
|
وهــذه
رتبــة
مــن
أقصـى
الولايـة
|
|
فلهــم
عينــان
للجمــالين
نـاظرا
|
فهـــذي
لحالـــة
وهـــذي
لحالــة
|
|
فواحــدة
تطــوي
الوجــود
بأســره
|
وأخـرى
لـه
بالنشـر
فـي
كـل
سـاعة
|
|
فيـاله
مـن
مقـام
مـا
أعلـى
أمـره
|
لبعــض
رجالنــا
مــن
أهـل
طريقـة
|
|
وهــذاعلمي
وفــوق
علمــي
علـومهم
|
فلـم
أدر
سـوى
البعـض
منهـا
لغفلة
|
|
فكـن
مثلهـم
في
السير
إن
شئت
سرهم
|
ولا
تكــن
كـالعوام
مـن
أهـل
غفلـة
|
|
ظـــاهرا
بــأمر
الشــرائع
قــائم
|
وبــاطن
منــك
بالأســرار
العليــة
|
|
فصـل
صـلاة
الجمـع
فـي
الفرق
أينما
|
تـــوجهت
لتلــك
الآيــة
العظيمــة
|
|
وإليــه
بــالتحقيق
وجهــك
دائمـا
|
وهـــذي
إشـــارة
ونعــم
الإشــارة
|
|
فأهــل
النهــى
يـدري
إشـارة
سـره
|
ويســـجد
بـــالأرواح
لكــل
وجهــة
|
|
ومــن
كــان
فهمــه
قصـيرا
فيسـجد
|
لمكـــة
تابعـــا
لظـــاهر
الآيــة
|
|
ولــه
مــدد
البعــض
منهــا
لسـره
|
تمـــدد
مـــدد
الهمــم
الضــعيفة
|
|
فكــن
ســاجدا
للــه
ســرا
بكلــك
|
ولا
تنقــص
عنــد
البعــض
أقـل
ذرة
|
|
وكــن
داعيـا
عنـد
السـجود
تأدبـا
|
وســبحه
بــالأجلال
فــي
كــل
ركعـة
|
|
وفــرض
عيـن
جـاءت
علـى
مـن
تكلـف
|
وأمــا
صــلاة
السـر
عيـن
الفريضـة
|
|
وفــي
الــوقت
صـلاتين
صـلهما
معـا
|
فــذلك
قـرة
العيـن
فـادر
إشـارتي
|
|
وإن
كنـت
مـن
إحـدى
الصلاتين
فارغا
|
فكـن
سـاجدا
فـي
الأخرى
بإحدى
سجدة
|
|
ولا
ترفــع
يومـا
مـن
سـجودك
طرفـة
|
فليــس
هنــا
وقــت
تكـون
الإعـادة
|
|
فهـــذه
للأبـــدان
لأجـــل
ضــعفها
|
وهــذه
مــن
أجـل
القلـوب
القويـة
|
|
بمحــض
الكــرم
يــا
إلاهـي
تولنـا
|
وكـن
لنـا
وارعنـا
بعيـن
العنايـة
|
|
ولا
تــترك
حولنــا
عــدوا
وظالمـا
|
وإن
حـــام
لـــه
آت
بكـــل
ذلــة
|
|
وخـــذه
قبــل
اهتمــامه
بهلاكنــا
|
لأنـــك
عـــالم
بكـــل
الحقيقـــة
|
|
وكــل
جبــار
الـوقت
اقطـع
عروقـه
|
وأوراقــــه
وأغصـــانه
الممـــدة
|
|
وأينمــا
ولـى
الـوجه
خـذه
بسـطوة
|
ووليـــه
مــدبرا
عظيــم
المذلــة
|
|
مشــتت
القلــب
والجــوارح
دائمـا
|
يخــوفه
الشــيطان
كــل
المخافــة
|
|
ولا
تـترك
منهـم
فـي
الوجـود
بأسره
|
عظمــت
منهــم
إلا
هـي
كـل
الإذابـة
|
|
أقمنــا
سـيوفا
مـن
سـيوفك
ظـاهرا
|
وباطنــا
تمحــق
الأعــادي
الظلمـة
|
|
أعـادي
جنـود
النفـس
والجنس
دائما
|
سـريعا
إلا
هـي
يـا
سـريع
فـي
لمحة
|
|
فــأمرك
أقـرب
مـن
الـبرق
إذ
بـدا
|
وأعجــب
مـن
هـذا
فـي
حكـم
وسـرعة
|
|
فكــن
لنـا
والإخـوان
حيـث
توجهنـا
|
وأيــدنا
وانصــرنا
بــأعظم
نصـرة
|
|
وكــن
لـدين
الحـبيب
أحمـد
حافظـا
|
وطهــره
يـا
إلاهـي
مـن
أهـل
ظلمـة
|
|
بحكمـك
كيـف
شـئت
تحكـم
فـي
الورى
|
ونســألك
اللهــم
نشــر
الهدايــة
|
|
علــى
يـد
أهـل
العلـم
بـك
حقيقـة
|
بفضــلك
يـا
مجيـب
أجـب
لـي
دعـوة
|
|
بجاهـك
يـا
مـن
لا
جـاه
فـوق
جـاهه
|
وبجــاه
مــن
رحمــت
بــه
البريـة
|
|
وبجــاه
كــل
مـن
كـان
لـه
تابعـا
|
ســالكا
ومجــدوبا
علـى
كـل
حالـة
|
|
فصـل
وسـلم
ثـم
بـارك
علـى
الهادي
|
رحيــم
بنــا
فــي
كـل
هـول
وشـدة
|
|
رؤوف
رحيــم
يطلــب
العفـو
دائمـا
|
لأهــل
نـور
الأيمـان
فـي
كـل
سـاعة
|
|
وحــاش
حبيبنــا
أن
تــرده
خائبـا
|
فيمــا
ســعدنا
علــى
كــل
حالــة
|
|
ونسـألك
الرضـى
عـن
الأهـل
والصـحب
|
وتــابعهم
الــى
انتشـار
القيامـة
|