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لصـاباتٍ
صـبوت
وفـي
التصابي
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صـبابةُ
صـبوتي
لصـبا
صـِباها
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وكـم
قـد
بـات
قَلبي
في
سعيرٍ
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يُقلــى
بـالقِلا
يبغـي
لِقاهـا
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وكـم
قـد
هيَّج
البرق
الشمالي
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فـؤاداً
قـط
لـم
يعشـق
سواها
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وكـم
أصـبحت
أرقب
في
الأعالي
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عسـى
ألقـى
الغزالة
في
عُلاها
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وكـم
شخصـت
عيـوني
فـي
سَبيلٍ
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وأسـأَل
كـل
سـار
قـد
سـراها
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ولـم
يَـكُ
مـن
مُجيبٍ
عن
سؤالي
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وسـؤلي
قـط
قَلـبي
مـا
سـلاها
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وكـم
فـدَّيت
بُشـرى
يـا
فؤادي
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مليكـة
ذا
الحمـى
زات
حِماها
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أُريــد
تفــاؤُلا
لكــن
أُلاقـي
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بــذاك
تطيُّـراً
عكسـاً
تبـاهى
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وكـم
أتلـو
عسـى
واليلُ
يعسو
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ويـأَتيني
العـذول
بلن
تراها
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وكــم
أطــوي
مفــازاتٍ
بجـدٍّ
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ومـا
فـازت
عيـوني
في
مناها
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فلا
جَــدُّ
السـُرى
يجـدي
سـُلوّاً
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وَشـمس
الكـون
محجـوبٌ
ضـياها
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فلا
شـــَمسٌ
تضــاهيها
ضــياءً
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وَلَـم
يَـكُ
من
سنى
يحكي
سناها
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ظُبيَّـةُ
خـدر
أنـسٍ
كمـا
أذلّـت
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ســدوفَ
عَريـن
غـاب
إذ
رآهـا
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لئن
ســلَّت
حُسـاماً
مـن
جُفـونٍ
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تُريـقُ
مـن
السـيوفِ
بِهِ
دِماها
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وإن
قـد
أشـهرت
سـهماً
بهـدبٍ
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تخـرُّ
لـهُ
النبـالُ
على
شواها
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سـمعنا
أن
فـي
الجنّـات
حوراً
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فتلــك
روايــةٌ
مِمَّـن
رواهـا
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فَلَيـسَ
هنـاك
مـن
حَـوَرٍ
ولكـن
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فللتشــبيه
رضــوانٌ
حكاهــا
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ولا
حَـوَرٌ
سـوى
فـي
حـور
أنـسٍ
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وفي
التَشبيه
كم
نجد
اشتباها
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ولا
فـي
الخلـد
مـن
سحر
وهذي
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فكـم
فتنـت
فـتىً
سحراً
فتاها
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علـى
هـاروتَ
قـد
أنكرت
سحراً
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بآيـــاتٍ
لإيهـــامٍ
أتاهـــا
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ومـا
للسـحر
مـن
قِـدَمٍ
ولكـن
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بــدا
لمــا
تبـدَّت
مقلتاهـا
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عيـونٌ
لـو
ببابـل
قـد
تجلَّـت
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قُبَيـل
السـبي
مـا
أحد
سباها
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وإن
تزهـــو
بــأفلاك
بــدورٌ
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فَكَـم
قـد
أخجلتهـا
وجنتاهـا
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وإن
قـد
فـاخرَ
الجـوريُّ
طيباً
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لعمـري
قـد
تعطـر
مـن
شذاها
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وإن
قــد
أومضــت
ليلاً
بـروق
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فـذا
لمّـا
تبسـَّم
فـي
خباهـا
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وإن
جـاد
الصـباح
لنـا
بنورٍ
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فنـور
الجيـد
إن
نزعـت
حلاها
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وإن
هـزَّ
القنـا
للطعـن
سـناً
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يصـول
عليـهِ
فـي
مَيـسٍ
قناها
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لهــا
ثَغــرٌ
بيــاقوتٍ
ومـاسٍ
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تنضــَّد
سـبّحوا
مـولىً
براهـا
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ربيَّــةُ
خــدرها
تســمو
دلالاً
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وقـد
جـاءَ
الكمـال
بِـهِ
جلاها
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وَلمّــا
ذكرَتنــي
فــي
كِتـابٍ
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بُكـا
التوديع
حين
لثمت
فاها
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صـبوت
إلـى
اللقاءِ
وحنَّ
قَلبي
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وقـد
سـحَّت
عيـوني
في
بُكاها
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