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لـو
شـاء
مـن
هجـر
المحـب
فأَرَّقـا
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لرثــى
ورقّ
لفيــض
دمـع
مَـا
رَقَـا
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قمـر
سـعى
بالصـبح
مـن
تحت
الدجى
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رشـأ
مشـى
بالغصـن
مـن
فوق
النقا
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دبّ
العــذار
وســال
فــوق
أسـيله
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فحســـبته
آســـاً
بــورد
أحــدقا
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وتلهبـــت
نــار
الحيــاء
بخــده
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فارتــدّ
عســجده
لجينــاً
محرقــا
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أَمُعَنِّــفَ
العشـاق
وهـو
مـن
الهـوى
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خــالي
الحشـا
لا
مـتَّ
حـتى
تعشـقا
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وتــبيت
مـن
زفـرات
شـوقك
شـاكياً
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لوعــاتِ
حــبٍّ
لا
تُعَالَــجُ
بــالرُّقى
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تَلْحَــى
ولــو
عـاينت
مـن
أحببتـه
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لــوددتَ
فــي
أشــراكه
أن
تعلقـا
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صـنم
عكفـت
علـى
هـواه
فلـو
بـدا
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لــك
فيـه
مُعْتَقَـدِي
لقلـتَ
تزنـدقا
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أنـا
مـن
تمـادى
هجـره
فـي
مـأتم
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فــاعجب
لخــدّي
بالــدموع
مُخَلَّقَـا
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إنــي
لأظمــأ
مـا
أكـون
إذا
جـرى
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مــاء
الشــباب
بخــده
وترقرقــا
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أُجْــري
علــى
عـاداته
دمعـي
ولـو
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كشــف
الظُّلامــة
ردَّ
ذاك
المطلقــا
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مــا
بـات
قلـبي
للصـبابة
ممسـكاً
|
حــتى
غــدا
جفنـي
لـدمعي
منفقـا
|
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كــم
ليلـة
كـم
بـت
منـه
معانقـاً
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غصــناً
بــأنواع
الملاحــة
مورقـا
|
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تلقــاه
مــن
تفــاح
خــدّ
مثمـراً
|
وتــراه
مــن
ريحـان
صـدغ
مورقـا
|
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مــا
حــل
عقـد
نطـاقه
حـتى
غـدا
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متوشـــحاً
بِيَـــدَيَّ
أو
متمنطقـــا
|
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أَجْنِـــي
ســـلافةَ
ثغــره
مترشــفاً
|
والــوَرْدَ
مــن
وجنــاته
متنشــقا
|
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يــا
ليلــة
مــدَّ
العفـاف
رواقـه
|
فيهــا
علــيَّ
وصـبحها
مـا
أشـرقا
|
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نُعْمَــى
ظَفِــرْتُ
بهـا
كـأن
مطـالبي
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وعـدت
مـن
الملـك
المظفـر
باللقا
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شـاهر
مـن
السـلطان
غازي
المعتلي
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شـرفاً
أَنَـافَ
علـى
النجـوم
محلقـا
|
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العــــادلي
مناقبـــاً
لا
تُـــدَّعَى
|
والشـــاويّ
مراتبـــاً
لا
ترتقـــى
|
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ذي
الكــف
مــا
أنــدى
ورب
الــج
|
ود
ما
أدنى
ومُفْتَرع
العلا
ما
أسمقا
|
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ملـــك
بـــبيض
هبــاته
وظبــاته
|
إن
جــاد
أحيــا
أو
تنكـر
أصـعقا
|
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بأنامــل
وكفــت
نــدىً
وكفـت
ردىً
|
فــالجود
يرجــى
والشـجاعة
تتقـى
|
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مُزْجِــي
الخميــس
كـأنه
ليـل
دجـا
|
فغــدا
ببارقــة
الصـوارم
مشـرقا
|
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نسـج
العجـاج
عليـه
ثوبـاً
فاغتدى
|
بزحــام
أجنحــة
الســيوف
ممزقـا
|
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وعلــى
القنـا
شـَهَلٌ
ولـولا
شـربها
|
مــاء
النجيــع
بنارهــا
لتحرقـا
|
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كــم
قــد
أغـص
زحـامه
فَـمَ
مُعتـل
|
أَنِــفٍ
ومــن
أثــواب
ثغـر
أشـرقا
|
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ذو
المجـد
لـو
سـعت
الكواكب
نحوه
|
لأَزلهـــا
عــن
منكــبيه
وأزلقــا
|
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لــو
مــارس
الطــود
الأشـم
لهَـدَّه
|
أو
لامــس
البحــر
الخضــم
لأحرقـا
|
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ومنـــاقب
لـــو
أنهــا
لكــواكب
|
منـــع
الظلام
ضــياؤه
أن
يغســقا
|
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ومـــواهب
رام
الســحابُ
لحاقَهَــا
|
فــونى
وقــد
غمـر
البلاد
وأطبقـا
|
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أحيـا
بهـا
ميـت
المنـى
فلو
ادَّعى
|
فـي
الخلـق
آيـات
المسـيح
لصـُدِّقا
|
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يـا
مـن
إذا
وقـف
الرجـاء
ببـابه
|
لــم
يلقــه
دون
السـماحة
مغلقـا
|
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أنــا
عبـد
أنعمـك
الـذي
أوليتـه
|
لمـــا
غـــدا
بجســامة
متطوقــا
|
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نَــوَّهْتَ
بــي
بعـد
الخمـول
وَوَسـَّعَت
|
نعمــاك
مــن
بـاع
الأمـاني
ضـيِّقا
|
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يممــت
بابــك
بائســاً
مســتَرْزِقاً
|
فــأقمت
مرجــوَّ
النــدى
مسـتَرْزقَا
|
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بــالله
لــولا
عاطفاتـك
لـم
أكـن
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متبــدلاً
هـذا
النعيـم
عـن
الشـقا
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ووجــدت
غصـن
الجـود
حيـن
هززتـه
|
فينــان
أغيــد
والنــدى
متـدفقا
|
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يـا
مـن
رمـى
الرومـيَّ
منـه
بسطوة
|
ردّت
علــى
الأعقــاب
ذاك
الفيلقـا
|
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أقبلتــه
مـن
قبـل
إرهـاف
الظُّبـا
|
عزمــاً
مشــى
فــي
جمعـه
فتمزقـا
|
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وحــديث
يــوم
الـزَّاب
عـن
صـحيحه
|
يــروى
إذا
كَثُــر
المقـال
ولُفِّقَـا
|
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ظلــت
لـك
الرايـات
فيـه
خوافقـاً
|
نحــو
العــدوّ
وسـعيه
قـد
أخفقـا
|
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فغــدا
بعفـوك
لائذاً
مـن
بعـد
مـا
|
ســرت
الـدماء
بِسـَيْلِهَا
أن
تهرقـا
|
|
فنفيـت
عنـه
السـمر
لـدناً
والظُّبا
|
قُضـــُباً
وقَـــبَّ
الأعوجيــة
ســُبَّقا
|
|
روعــت
بــالغرب
الفرنــج
بوقفـة
|
دوخـت
ذاك
اليـوم
منهـا
المشـرقا
|
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وملكــت
رقِّــي
باصــطناع
عــوارف
|
مـا
أرتجـي
مـا
عشـت
منهـا
مُعْتِقا
|
|
فاسـتجلها
زُهـر
الخـدود
ألـذّ
مـن
|
عتــب
تولــد
مــن
نــتيجته
لقـا
|
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زُفَّــت
إلــى
ملـك
المعـالي
زفهـا
|
ملـــك
المعــاني
رقــة
وتأنقــا
|
|
فــورثت
طــول
بقائهـا
فـي
دولـة
|
تفنـى
الليـالي
وهـي
دائمة
البقا
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