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عيــد
ومــاذا
سـرني
فأنـادي
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ذهب
الرجاء
من
الحبيس
الصادي
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وبــأي
تبيــان
أهنِّـئُ
معرضـاً
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لا
يقبلـــنَّ
شــفاعة
الأعيــاد
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ما
لي
إذا
لم
ألق
عندك
موضعاً
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ولهــــذه
الأعلام
والأجنــــاد
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عـرف
الـوزير
الفارسي
مكانتي
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فــي
دولـة
الإنشـاء
والإنشـاد
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وأثـابني
ذاك
الغريب
لما
رأى
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مــن
عزتــي
وسـجيتي
وجهـادي
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لــولا
محبتــه
إليــك
وشـعره
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لـم
أعـترف
يومـاً
لـه
بأيـاد
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والـرزق
ميسـور
ولـولا
نخـوتي
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ومروءتــي
أصــبحت
رق
جــواد
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قربت
شاعرك
الجليل
فما
اقتدى
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بـك
واحـدٌ
من
أهل
هذا
الوادي
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مـا
زلـت
للأشـعار
تكرمـه
وما
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لـك
غيـر
ملتفـت
إلـى
الأنداد
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نـائين
مضـطربين
لـولا
رفقهـم
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وحنـانهم
كـانوا
مـن
الزهـاد
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لا
يســألونك
مــرة
إقطــاعهم
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أرضــاً
وحســبهمُ
قليـل
حصـاد
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جعلـوا
فـداك
نفوسهم
وتعرضوا
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لغريمـك
الجبـار
فـي
الميعاد
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واســتجمعوا
لبقيــة
لــولاهمُ
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ذهبــت
تصــاريفٌ
بهـا
وعـواد
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قـد
نزهوك
عن
الشريك
وأكبروا
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قطريـك
عـن
حـام
سـواك
وفـاد
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جعلـوا
وجـوههمُ
صـحائف
ودِّهـم
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وســوادَ
أعينهــم
أعـزَّ
مـداد
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ويبشــرون
بلادهــم
بنجاتهــا
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وحياتهـا
والـبيض
فـي
الأغماد
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ويـرون
لينـك
للدخيل
وإن
قسا
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حــق
الضـيوف
عليـك
والـرواد
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فـاعطف
علـى
نصـحاء
شعب
صاغر
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مــا
زال
بيـن
سـواعد
ومهـاد
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فالشـعر
مفتقـر
إلـى
ذي
نجدة
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ولربمـا
اسـتغنى
عـن
النقـاد
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إن
شــئت
فهـو
صـناعة
كسـبية
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كصــناعة
النجــار
والحــداد
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وإذا
أردت
فــإنه
وحــي
كمـا
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نـزل
الكتـاب
علـى
نـبيٍّ
هـاد
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هـل
نـال
إسـماعيلُ
من
شعرائه
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مـا
نلـت
مـن
شـعرائك
الأمجاد
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الواهــبي
ألبـابهم
وقلـوبهم
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لبنــاء
مملكــة
ورفـع
عمـاد
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أيكــون
وردك
زاخـراً
متضـرِّباً
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ويُــذاد
عنــه
أطهـرُ
الـوراد
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أم
يرحلـنَّ
عـن
الرياض
حمامُها
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والنسـر
ممـسٍ
في
الرياض
وغاد
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أرأيـتَ
مصـر
غنيـة
عنهـم
فما
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لهـمُ
سـوى
السـودان
خير
عتاد
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إن
فـاتهم
في
الخطب
حظهمُ
فما
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يرجــون
مـن
أرض
هنـاك
جمـاد
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وأَحَـرُّ
مـن
صـحرائها
ورمالهـا
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شـوق
القلـوب
إليـك
والأكبـاد
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مـا
قدر
ذي
الألقاب
يخلو
كيسه
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مــن
درهميــن
وداره
مـن
زاد
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أي
النـوازع
فيـك
غيَّـر
فطرتي
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وبــأي
إحســان
ملكـت
قيـادي
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أحسـبتني
أحـد
الـذين
حرمتهم
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فتــذرعوا
بالإفــك
والإفســاد
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ووهبتهـم
فتهـافتوا
ومنعتهـم
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فســطوا
بألسـنةٍ
هنـاك
حـداد
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كن
كيف
شئتَ
فطاعتي
لك
والرضى
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سـيان
فـي
التقريـب
والإبعـاد
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مـا
الشـعر
إلا
آيـة
لك
ينجلي
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فيهـا
مثـال
شـمائلي
وسـدادي
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إن
غبتُ
فالذكر
الذي
ترضى
وإن
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أحضــرْ
فملـء
نـواظر
الأشـهاد
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فليهـن
مصـرك
مهرجانـك
وليبت
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أوفـى
دعـائك
فـي
أسـىً
وسهاد
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قعـدت
بـه
عـن
زينـةٍ
ومـواكبٍ
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شـكوى
العليـل
وزحمـة
العوّاد
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لـم
يغـن
إسراري
إليك
شكايتي
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وقـد
انتهيـت
بها
إلى
الإرعاد
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إن
الـذي
استعصـى
علـى
عذّاله
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لا
يرهبـــنَّ
شــماتة
الحســاد
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