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إن
حــارت
الأفكــار
كيــف
تقـول
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في
ذا
المقام
فعذرها
مقبول
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بهـر
الجمـال
العاضـدي
خواطراً
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خطــر
الخلافــة
عنـدهن
جليـل
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عظمـت
مهابتنـا
لموقفـك
الـذي
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يهـدي
لـه
التعظيـم
والتبجيل
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حـرم
تقابـل
منـك
فيـه
قبلـة
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بفنائهــا
يــتزاحم
التقبيــل
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تتغـاير
الأفـواه
فـوق
بسـاطه
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فكأنمــا
هــو
مبســم
معســول
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مـا
كـل
طرف
القول
عن
هذا
الندى
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إلا
وطـرف
اللحـظ
منـه
كليل
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سـامح
بفضـلك
مـا
دحيـك
فمـالهم
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أبـداً
إلـى
مـا
تستحق
سبيل
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إن
كــان
لا
يرضــيك
إلا
محسـن
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فالمحسـنون
إذا
انتقـدت
قليـل
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لا
يبلــغ
البلغــاء
وصـف
منـاقب
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أثنـى
على
إحسانها
التنزيل
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شـيم
بكـم
غـر
أتى
بمديحها
ال
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فرقــان
والتــورات
والإنجيـل
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سـير
نسـخناها
مـن
السور
التي
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مــا
شــأنها
نسـخ
ولا
تبـديل
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قـامت
خواطرنـا
بخدمـة
نظمهـا
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فيكــم
وقـام
بنثرهـا
جبريـل
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شــرف
تـبيت
بـه
قريـش
كلهـا
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عــولاً
لكــم
وعليكـم
التعويـل
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إن
الرســول
أبــوكم
مـن
دونهـا
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فمـن
الـذي
منها
أبوه
رسول
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ولقـد
ورثـت
مقـام
قـوم
يسـتوي
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منهـم
شـباب
في
العلى
وكهول
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وجمعــت
شــمل
خلافـة
لـم
يختلـف
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في
فضلها
المعقول
والمنقول
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لمـا
بـرزت
إلـى
المصـلى
معلناً
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وشـعارك
التكـبير
والتهليـل
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وخطبــت
فيــه
المــؤمنين
خطابـة
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ذابـت
عيـون
عنـدها
وعقول
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وســللت
غــرب
فصــاحة
نبويـة
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شــهدت
بأنــك
للنــبي
سـليل
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أذكرتنــا
سـنن
الرسـول
وهـديه
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إذ
كـان
بيـن
السـنتين
شكول
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وجلــوت
مـن
تحـت
المظلـة
غـرة
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يبـدو
عليهـا
التاج
والإكليل
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فتعجـب
الـراؤون
كيـف
علـت
علـى
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مـن
ظلـه
فـوق
الأنـام
ظليل
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فــأجبتهم
لا
تعجبــوا
لصـعودها
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فصـعودها
لـو
تعلمـون
نـزول
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والجفـن
يعلـو
العين
تكرمة
لها
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ويصـون
متـن
السيف
وهو
صقيل
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ويسـتر
الـبيت
الحـرام
وقـدره
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يعلــو
علــى
أسـتاره
ويطـول
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شــرفت
عيـد
الفطـر
حـتى
إنـه
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سـحبت
لـه
فـوق
السـحاب
ذيول
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ألبسـته
ثـوب
القبـول
فأشـرقت
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فــي
صــفحتيه
بهجــة
وقبـول
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مضـى
الصـيام
وفـي
صـميم
فـؤاده
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أسـفاً
عليـك
صـبابة
وعويـل
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لـم
يغنـه
نقص
المحاق
وإنما
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أفنـاه
مـن
حـذر
الفـراق
نحـول
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صــوم
وفطــر
كـل
وقـت
منهمـا
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فــي
ظـل
عـدلك
بكـرة
وأصـيل
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شـهران
لـولا
شـرع
جـدك
فيهمـا
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لـم
يعـرف
التحريـم
والتحليل
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إن
قلــت
إنــك
للنبــوة
وارث
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فعليــك
منهــا
شـاهد
ودليـل
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شــيم
كفلــت
بهـن
ملـة
أحمـد
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والصـالح
الهـادي
لهـن
كفيـل
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كـاف
هـو
البـاب
الذي
من
لم
يصل
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منـه
فليـس
لـه
إليـك
وصول
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أمنـت
خلافتـك
الخلاف
وقـد
غـدت
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تســطو
بماضــي
عزمـة
وتصـول
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هو
طودها
الراسي
وصالحها
الذي
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حــد
الفســاد
بحــده
مفلـول
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شــملت
حقيقـة
نهتـه
أقطارهـا
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فبكــل
قطــر
للصــلاح
شــمول
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ألقــاب
صــدق
جملتهـا
همـة
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طــرف
الســها
بغبارهـا
مكحـول
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إن
راق
معناهـا
الشـريف
ولفظها
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فلـذلك
الصـفح
الجميـل
جميل
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مللـت
إذا
ذكـرت
نباهـة
قدره
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أزرى
بأهــل
الخــافقين
خمـول
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أطـراف
دولتـه
بـأطراف
القنـا
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ممنوعـــة
ونـــواله
مبــذول
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أحيـا
بمحيـي
الدين
حسن
مآثر
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فضــل
الملــوك
بحسـنهن
فضـول
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فات
الكهول
من
الملوك
وقد
يرى
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مـاء
الصـبا
فـي
وجنتيه
يجول
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عقـدت
أمور
الملك
منه
بأروع
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عقــد
النفــاق
بســيفه
محلـول
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للشـعر
بيـن
جمـاله
وجميله
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شـــرح
وإن
قصــرت
منــه
طويــل
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يكفيــه
مــن
شـرف
المسـاعي
أنـه
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لك
يا
أمير
المؤمنين
خليل
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وبـأنه
الذخر
الذي
يرجو
الهدى
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أن
الأمــور
إليـه
سـوف
تـؤول
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فالله
يحرس
ذا
الجمال
على
الورى
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مـا
قابلت
ريح
الجنوب
قبول
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