|
فـي
صـفحة
الخـد
خط
الشيب
إنذاره
|
وثــوب
جســمى
حـل
الضـعف
أزراره
|
|
وقــد
تـولت
جيـوش
العـزم
خاضـعة
|
بعـد
المشـيب
وكـانت
قبـل
جـرّاره
|
|
ومـا
ارعـويت
عـن
الدنيا
وزخرفها
|
مـع
أنهـا
بابتسـام
الثغـر
غرّاره
|
|
وكالســراب
تراهــا
فــي
موّدتهـا
|
وحســبها
أنهــا
بالختــل
غـداره
|
|
فكـم
لعينـي
بعيـن
الغـي
قد
غمزت
|
حـتى
احتملـت
مـن
التفريط
أوزاره
|
|
وطــارت
النفــس
بـالأهواء
هائمـة
|
كأنمــا
الغــيّ
جــو
وهـي
طيـاره
|
|
ومــا
أبرّىـء
نفسـي
مـن
غوايتهـا
|
فــإن
نفسـي
بفعـل
السـوء
أمـاره
|
|
يـا
نفـس
تـوبى
فخيـر
البر
عاجله
|
واسـتو
كفى
من
غزير
العفو
أمطاره
|
|
ونظفـي
القلـب
مـن
غـي
ومـن
غيـر
|
ظطهــري
بــدموع
التــوب
أقـذاره
|
|
واستخصـلى
القلـب
ممـا
كان
يشغله
|
ثــم
اغســلى
بيـد
الإخلاص
أوضـاره
|
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وقــدمي
الخيــر
مشـفوعا
بمعـذرة
|
فــالله
يقبـل
مـن
راجيـه
أعـذار
|
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واخجلـتي
مـن
ذنـوبي
حيـن
أذكرها
|
منهـا
الـدموع
كسـح
السحب
مدراره
|
|
أنـى
لأيـدي
الكـرام
الكاتبين
بها
|
لأنهـــا
كنجـــوم
الليـــل
دراره
|
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وقـد
مضـى
العمـر
في
لهو
وفي
لعب
|
وغــض
منـه
بيـاض
الشـعر
أزهـاره
|
|
ومـا
ازدلفـت
إلـى
الأخـرى
بصالحة
|
ولا
عرفــت
ليــوم
الحشـر
مقـداره
|
|
ولا
وجــــدت
خليلا
راح
يرشــــدني
|
غيـر
المشـيب
وقـد
أنكـرت
إبداره
|
|
وليــس
للعلـم
مـن
نفـع
بلا
عمـل
|
مهمـا
قـرأت
أو
اسـتظهرت
أسـفاره
|
|
علــــم
بلا
عمـــل
روض
بلا
ثمـــر
|
لا
ينفـع
الـروض
إن
لم
تجن
أثماره
|
|
لكــن
يقينــي
يقينـي
كـل
ضـائقة
|
بالنصـر
والفوز
إن
شن
العدا
غاره
|
|
وكيــف
لا
ورســول
اللــه
معتصـمى
|
خيـر
النـبيين
مـن
شـاهدت
أنواره
|
|
سـر
الوجـود
نـور
الكـون
مـن
أزل
|
لا
يســتطيع
سـليم
القلـب
إنكـاره
|
|
أحيـا
القلـوب
وكـانت
قبـل
ميتـة
|
إذ
فيـه
قـد
أودع
الرحمـن
أسراره
|
|
وقــد
دعــوه
أمينـا
قبـل
مبعثـه
|
لمـا
استشـفوا
بحسن
الخلق
أطواره
|
|
وحكمــــوه
فأرضـــاهم
بحكمتـــه
|
واستحسـنوا
مـن
أمين
الله
أفكاره
|
|
روح
مؤيــدّة
بــالروح
مــن
صــغر
|
لا
يظهــر
البــدر
إلا
حــوله
داره
|
|
أزكــى
الخلائق
أعرافــا
وأطهــرم
|
واللــه
شــرفة
بـالوحى
واختـاره
|
|
فطهـر
الكـون
مـن
رجـس
ومـن
دنـس
|
وشــد
بيـن
يـديه
الشـرك
أكـواره
|
|
وأنقــذ
الكـل
مـن
غـي
ومـن
عمـه
|
وحـط
عـن
ظهـر
هـذا
الكـون
آصاره
|
|
وكــل
ديـن
بـدين
المصـطفى
نسـخت
|
آيــاته
واسـتحال
الرشـد
أحبـاره
|
|
فأسـلم
البعـض
بعـد
البغض
معترفا
|
ولــم
يشــد
بخصــر
بعــد
زنـاره
|
|
والبعــض
عضـت
علـى
كفـر
نواجـذه
|
ولــم
يفـارق
عتـادا
قـط
إصـراره
|
|
فبـاء
بـالخزى
فـي
الـدنيا
وآخرة
|
وفيـه
قـد
أعمـل
المختـار
بتـاره
|
|
ونظّـف
الـبيت
مـن
جبـت
ومـن
صـنم
|
واسأصـل
الشـرك
حـتى
بـت
أوتـاره
|
|
هـذا
النـبي
لـه
الأحجـار
قد
نطقت
|
والنخـل
أدنـى
لخير
الخلق
أثماره
|
|
والجــذع
حــن
لــه
والضـب
كـأمه
|
والشــاة
درت
ومـا
كـانت
بـدراره
|
|
والغيــم
ظللــه
مــن
حـر
هـاجرة
|
كمـا
أمـال
إليـه
الـدوح
أشـجاره
|
|
والعنكبـوت
مـع
الورقـاء
قد
نسجا
|
بالغـار
بيتـا
وعشـا
حصـنا
غـاره
|
|
لـه
شـكا
الجمـل
المنهـوك
من
سغب
|
ومــن
عنــاء
فعنــه
كـف
أضـراره
|
|
وكـم
بـه
اعـتز
مـن
عضـته
متربـة
|
فبــدل
اللــه
بالإعســار
إيــاره
|
|
فــانظر
إلـى
أنـس
تلقـاء
خـدمته
|
تجــده
نــال
بحسـن
الـح
أوطـاره
|
|
بــه
ارتقـت
ذروة
العليـاء
أمتـه
|
فاصـبحوا
بعـد
يغـض
الحـق
أنصاره
|
|
حـتى
غـدا
هديـة
في
الكون
منتشرا
|
وعـــم
أنجــاده
عــزا
وأغــواره
|
|
صـرنا
بـه
فـي
البرايـا
أمة
وسطا
|
كالسـبعة
الشـهب
فـي
الأفلاك
سياره
|
|
وأيــد
اللــه
بــالقرآن
دعــوته
|
وحصــن
اللــه
بالإعجــاز
أسـواره
|
|
فـــأعجزتهم
وهـــالتهم
بلاغتـــه
|
مـن
ذا
يقـاوم
فـي
الإعجاز
أسواره
|
|
فـــأعجزتهم
وهـــالتهم
بلاغتـــه
|
مـن
ذا
يقـاوم
فـي
الإعجـاز
تياره
|
|
عــذب
فـرات
لذيـذ
الطعـم
مـورده
|
يشفى
الفؤاد
ةوتأبى
النفس
إصداره
|
|
ذكــر
قــديم
ومعنــى
كلــه
حكـم
|
لا
يـدرك
العقـل
مهمـا
كان
أسراره
|
|
إلـى
النـبي
وفـود
الكون
قد
هرعت
|
حـتى
استبانوا
بصدق
القصد
أخباره
|
|
هـذا
النـبي
الـذي
كـانت
بشاشـته
|
علـى
الكمـال
وآيـات
الهـدى
شاره
|
|
فيــا
سـعادة
مـن
بـالعين
شـاهده
|
فـي
هـذه
الـدار
أوفـى
داره
زاره
|
|
مــتى
أشـم
الشـذا
ن
طيـب
طيبتـه
|
وأمتــع
القلـب
لمـا
أجتلـى
داره
|
|
وألثـم
الـترب
مـن
أعتـاب
روضـته
|
مســتلفتا
بجميـل
العطـف
أنظـاره
|
|
لا
أكـذب
اللـه
شـوقى
نحـو
طيبتـه
|
لا
أســتطيع
مــدى
الأيـام
إضـماره
|
|
وكيــف
لا
ورســول
اللــه
شــرّفها
|
فــي
حماهـا
أضـاء
اللـه
أقمـاره
|
|
فطــاولت
فــي
علاهــا
كـل
مرتفـع
|
وكــل
ســبق
تخطــت
فيـه
مضـماره
|
|
وأخــرزت
برســول
اللــه
غايتهـا
|
فكــل
قطــر
إليهــا
مـدّ
أقطـاره
|
|
جـرت
ينابيعهـا
فـي
الكـون
صافية
|
حـتى
أمـدّت
بفيـض
الفضـل
أنهـاره
|
|
وعينهــا
كـوثر
الفـردوس
منبعهـا
|
زرقــاء
نضــاخة
بالمــاء
فـواره
|
|
تربانهــا
العضـال
الـداء
شـافية
|
وأرضـها
مـن
شـذا
المختار
معطاره
|
|
تخالهـا
فـي
ابتـداء
الأمـر
يابسة
|
لكنهــا
بــازدهرا
الـزرع
خـواره
|
|
هــذا
النـبي
حبـاه
اللـه
منعتـه
|
كمــا
حبــا
صـحبه
عـزا
وأنصـاره
|
|
وآل
بيـــت
وأزواج
بـــه
شــرفوا
|
ومتّــع
اللــه
بالعليـاء
أصـهاره
|
|
يـا
خيـر
مـن
رفعـت
بالنصر
رايته
|
ومــن
أتــم
لـه
الرحمـن
أنـواره
|
|
إليــك
بــالعز
آمــالي
أقــدمها
|
عســى
بعينــي
أراهــا
لا
بنظـاره
|
|
صـــب
بمــدحك
لا
ينفــك
مشــتغلا
|
فـزان
منـك
جميـل
المـدح
أشـعاره
|
|
مـن
لـي
سـواك
وقلـبي
قد
أقر
بما
|
بلغـت
فاقبـل
بمحـض
الفضل
إقراره
|
|
وانظــر
إلـيّ
فحسـبي
أن
لـي
صـلة
|
بآلــك
الطهــر
لا
دعـوى
ولا
عـاره
|
|
فالـدهر
عبـدي
إذا
مـادمت
تلحظني
|
وأســـترق
بعطــف
منــك
أحــراره
|
|
ولســت
أخشــى
زمـاني
فـي
تقلبـه
|
ولا
أخــاف
بحســن
الظــن
إعسـاره
|
|
فـأنت
أعلـى
الـورى
جاهـا
ومنزلة
|
ومـن
إليـك
انتمـى
أعليـت
أقداره
|
|
يـا
رب
صـل
علـى
المختـار
من
مضر
|
واجعـل
مقـامى
بجنـات
العلا
جـاره
|
|
والآل
والصـحب
مـا
أنشـدت
مفتتحـا
|
فـي
صـفحة
الخـد
خط
الشيب
إنذاره
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