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يـا
حمـامي
أمـانه
ما
دهاك
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طـرت
مـن
بقعتـك
حيث
الأمان
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سـقت
نفسـك
الـى
بحر
الهلاك
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مـا
تخاف
من
صروفات
الزمان
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كنــت
مـبرد
ومتنفّـس
هنـاك
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كـل
سـاعه
تخطـر
فـي
مكـان
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وأنـت
تسـجع
ويطربنـا
غناك
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وافترقنـا
ومـا
قد
لك
ثمان
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خانـك
الدهر
يا
سيد
الحمام
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وانزلـك
مـن
محلـك
والمقـر
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قـد
سقاك
لا
سقي
كاس
الحمام
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هكـذا
الدهر
حكمه
في
البشر
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قـد
نهيتـك
ومـا
تـم
الكلام
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لا
حـذر
يـا
حمـامي
مـن
قدر
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اوقعـك
قـل
فهمـك
فـي
شباك
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المنايـا
فكـم
ذا
الامتحـان
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شـلك
البـاز
مـن
بين
اخوتك
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حيـن
عـرف
أن
قـد
هي
ساعته
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لـو
سـمع
يـا
حمـامي
نغمتك
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كـان
شـا
يفلتـك
مـن
قبضته
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غيـر
أجـرى
دمـك
مـن
مقلتك
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اســأل
اللـه
يعمـي
مقلتـه
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قـادر
اللـه
يهلـك
من
أذاك
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واحرمـك
طيـب
عيشـك
ثم
خان
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خضــّب
الكــف
منـك
بالـدما
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ونشـر
طـوق
جيـدك
فـي
بديه
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واستباح
في
الحمى
قتلك
هما
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فالقضـا
والقـدر
ساقك
اليه
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عـــذبك
عــذبه
رب
الســما
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وانتصـف
لـك
وورانـي
عليـه
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بســهام
المنيـه
قـد
رمـاك
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لا
بـرح
طـول
دهـره
في
هوان
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وانت
يا
قلب
ما
لك
ما
سليت
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قـد
كفـى
لك
بعشقك
والهيام
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وانـت
ذاكـر
والا
قـد
نسـيت
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قـال
من
قلت
له
نسل
الكرام
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قـال
والله
وراسك
ما
نسيت
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انمــا
ضـرني
كـثر
الغـرام
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قلـت
يـا
قلب
هل
يسمح
بذاك
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لا
بـرح
فـي
السعاده
والأمان
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الـوجيه
مـن
زكا
اصله
وطاب
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معـدن
الجـود
محمود
الخصال
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اسـأل
اللـه
ربّـي
بالكتـاب
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يحفظـه
بالمثـاني
فـي
أزال
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والصـلاه
تغتشي
عالي
الجناب
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أحمـد
المصـطفى
بدر
الكمال
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مـا
تغنّـى
المطوّق
في
الأراك
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وبـدا
كـالقمر
سـيد
الحسان
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