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واغريبـــا
قطنـــه
شـــيبته
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إذ
غـدا
كـافوره
عفـر
الـثرى
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واســـليبا
نســـجت
أكفــانه
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مــن
ثـرى
الطـف
دبـور
وصـبا
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واطعينــا
مـا
لـه
نعـش
سـوى
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الرمـح
فـي
كف
سنان
ذي
الخنا
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واوحيــداً
لــم
يغمــض
طرفـه
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كــف
ذي
رفـق
بـه
فـي
كـربلا
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واشــهيدا
دمــه
كالمسـك
فـي
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طيبــه
قــد
فعـم
الجـو
شـذى
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واصـــريعا
أوطــأوا
خيلهــم
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أي
صــدر
منــه
للعلــم
حـوى
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واطريحا
في
الثرى
وهو
ابن
من
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قــاب
قوسـين
مـن
اللـه
دنـا
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واذبيحـــا
يتلظـــى
عطشـــا
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وأبــوه
صــاحب
الحــوض
غـدا
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واقـــتيلا
حرقـــوا
خيمتـــه
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وهــو
للــدين
الحنيفـي
وعـا
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واحزينـــا
ذبحـــت
أنصــاره
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وبنــوه
وهـو
لا
يخشـى
العـدى
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كيـف
يخشـى
وهـو
نجل
المرتضى
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أسـد
اللـه
الفتى
وابن
الفتى
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آه
لا
أنســاه
فــردا
مـا
لـه
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مــن
معيــن
غيـر
دمـع
وأسـى
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وهـو
ظلـم
والعـدى
قد
أوردوا
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مـن
دماه
السمر
مع
بعض
الظبى
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قــائلا
هـل
شـربة
أطفـي
بهـا
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حـر
قلـب
ذاب
مـن
فـرط
الظما
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فأجـــابوه
سنســقيك
الــردى
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بكـؤوس
الـبيض
أو
سـمر
القنا
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إننـا
لـم
ننـس
بـدرا
والـذي
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قـد
دهانـا
مـن
أبيك
المرتضى
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فغــدا
يســطو
عليهــم
وحـده
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وهــم
أكـثر
مـن
قطـر
الحيـا
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فــإذا
كــر
عليهــم
أشـبهوا
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حمـرا
قـد
شـاهدت
ليـث
الشرى
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ثـــم
أردوه
صــريعا
آه
يــا
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ليـت
كـل
الخلق
قد
كانوا
فدا
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فــدنا
الشــعر
إليــه
وجـرى
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مــا
جــرى
شـلّت
يـداه
وكبـا
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ثــم
علــوا
فـوق
رمـح
رأسـه
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شـبه
بـدر
التم
بل
شمس
الضحى
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فبكتــه
الإنــس
والجــن
معـا
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والسـما
بالـدم
مـن
حر
الجوى
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وعليــه
الجــن
نــاحت
وبمـا
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فـي
الحشا
باحت
بأنواع
الرثا
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ولقــد
زلزلــت
الأرضــون
مـن
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جـزع
والـدهر
قـد
شـق
الـردا
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وثيــاب
الحــزن
سـودا
لبسـت
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كعبـة
اللـه
لـه
طـول
المـدى
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ولقــد
فتــت
قلـب
الحجـر
ال
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حـزن
والحجـر
بكـى
ممـا
جـرى
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ولـــه
زمــزم
غاضــت
ومنــى
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بعـده
مـا
بلغـت
طيـب
المنـى
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وشـجا
المشـعر
ذا
الرزء
الذي
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مـا
صـفا
مـن
بعده
عيش
الصفا
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وغــدت
شــمس
الضــحى
كاسـفة
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أسـفا
والبـدر
معـدوم
الضـيا
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وعــدا
المهــر
إلـى
نسـوانه
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ناعيــا
ينـدب
ممـا
قـد
دهـا
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فرأيــن
الســرج
منـه
خاليـا
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وهـو
مخضـوب
النواصـي
بالدما
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فلظعـــن
الفاطميـــات
علــى
|
مـا
جـرى
والدمع
في
الخد
جرى
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ثــم
مـن
بعـد
سـباهن
العـدى
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فـوق
أقتـاب
المطايـا
كالإمـا
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فتـــواقعن
علـــى
جثمـــانه
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مـذ
تبـدى
عاريـا
فـوق
العرا
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هــذه
تنــدب
وجــدا
وا
أخـا
|
حيـث
تـدعو
تلـك
حزنا
وا
ابا
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مـــا
عليهــن
لبــاس
ســاتر
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غيـر
نـور
منـه
بعشـو
من
رنا
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لعــت
أنسـى
سـيد
العبـاد
إذ
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ركبــوه
أعجفـا
عـاري
المطـا
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والــدما
تشــخب
مـن
أفخـاذه
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وهــو
فــي
قيـد
ثقيـل
وعنـا
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تــارة
يبكــي
وطـورا
يغتـدي
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رافـع
الطـرف
إلـى
رب
السـما
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عـــن
رأى
راس
أبيـــه
شــفه
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نــار
وجــد
دونهـا
حـر
لظـى
|
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لــو
رأى
نســوته
فــي
ذلــة
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عـز
منـه
الصـبر
ممـا
قد
رأى
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وبهـذا
الحـال
قـد
ساروا
بهم
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لبلاد
الشـام
مـن
فـرط
الشـقا
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فـانثنى
الطـاغي
يزيـد
جـذلا
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ضــاحكا
يرشـف
كاسـات
الطلـى
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ناكثـا
ثغرا
لحامي
الثغر
وال
|
آيـة
العظمـى
ومصـباح
الهـدى
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يـا
بني
المختار
يا
من
مدحهم
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لـم
يزل
يجلو
عن
القلب
الصدا
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إن
نصــر
اللــه
يرجـو
منكـم
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شـربة
يطفـي
بهـا
حـر
الصـدى
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فــأغيثوه
بهــا
يومــا
بــه
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ليــس
للإنســان
إلا
مــا
سـعى
|
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وعليكــم
صــلوات
اللــه
مـا
|
لمـع
الـبرق
ومـا
الغيـث
همى
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