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أناديــك
لــو
رد
النــداء
رميــم
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وأبكيــك
لــو
أجــدي
عليـك
سـجيم
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وهـل
يحفـل
الميت
الذي
غاله
الردى
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ســـلاه
خليـــلٌ
أم
بكـــاه
حميــم
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ويـا
ليـت
لـي
دمعـاً
عليـك
أريقـه
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ولكـــن
جفنــي
يــا
أخــي
عقيــم
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سـأبكي
عليـك
النـاس
حـتى
تخـالهم
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يتــامى
دهــاهم
يــوم
بنـت
عظيـم
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وماذا
يقيد
الميت
في
القبر
قد
ثوى
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دمــوعٌ
علــى
الأيــام
ليــس
تـدوم
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وهبهــا
علـى
الأيـام
سـحت
غمائمـا
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أيرجـــع
ميتـــاً
صــوبها
فيقــوم
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وكيــف
أجـازي
طيـب
عهـدك
بـالبكى
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ولــو
أن
عينــي
بالــدماء
ســجوم
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فبعـداً
لهـذا
العيـش
بعـد
فراقكـم
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فليــس
لعيــش
بنــت
عنــه
نعيــم
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ولا
مرحبــاً
بالــدار
لسـت
قطينهـا
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ولـــو
أن
أجـــر
البنــاء
نجــوم
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عرفتـــك
والأيـــام
بيــضٌ
حميــدة
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فصـــرت
وأيـــامي
لبعـــدك
شــيم
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كأنـا
الألـى
متنـا
وهل
يألم
الردى
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سـوى
الحـي
لا
الفـاني
فـذاك
سـليم
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وليـس
غـبين
القـوم
من
غاله
الردى
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ولكــن
مــن
يخطيــه
فهــو
مقيــم
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ولـو
خيـر
الأمـوات
مـا
اختار
واحدٌ
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حيـــاةً
ولا
قــال
الحمــام
ذميــم
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يـروع
الفـتى
ذكـر
الحمـام
ووقعـه
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ويرتــاع
مــن
ذكـر
الحيـاة
رميـم
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خلقنــا
ومــا
نــدري
لأيــة
غايـةٍ
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علــى
المــوت
منــا
هجمـةٌ
وقـدوم
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وكـل
امـرئٍ
فـي
العيـش
طـاب
غيـاةٌ
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ومــن
خلفــه
هــذا
الحمـام
غريـم
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فيــا
شـقوة
الإنسـان
يجنيـه
سـعيه
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ثمـار
الـردى
المشـنوء
وهـو
نعيـم
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ولـم
أر
مثـل
العيـش
أزهاره
الردى
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ولا
عاصــفاً
كــالموت
وهــو
نســيم
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كـذبتك
لـم
أجـزع
عليـك
وقـد
رمـى
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فــؤادك
مــن
نيــل
القضـاء
ظلـوم
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نجــوت
مــن
الـدنيا
نجـاءً
نفسـته
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عليـــك
ولــو
أن
الفــراق
أليــم
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تمــر
الليــالي
لا
تحــس
صــروفها
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فيــا
ليتنـي
فـي
الهـالكين
قـديم
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كأنــك
مــا
مــادت
بعطفيـك
قرحـةٌ
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ولا
جشـــأت
دون
الضـــلوع
همـــوم
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ولـم
تـك
فـي
الـدنيا
لقلبي
مطربا
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ولا
صــرت
خطبــاً
ضــاق
عنـه
حزيـم
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كأنــك
مــا
دبـت
بـك
الرجـل
مـرةً
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لمـــأرب
عيـــشٍ
تبتغـــي
وتــروم
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كأنـــك
مــا
آذاك
بــردٌ
ولا
لظــى
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ولا
كــر
مــن
بعــد
النهـار
بهيـم
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ولا
أطــرف
الخلان
فــي
ســامرٍ
لهـم
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فصـــيح
ولا
عــاطى
الســلاف
نــديم
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كأنــك
لــم
تخلـق
سـوى
أن
أكيـداً
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ذواكـــر
تفريهـــا
عليــك
غمــوم
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سـقيت
الردى
في
ميعة
العمر
والصبا
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وأوكـى
علـى
مـا
فـي
العيـاب
أثيم
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فيــا
ويـح
للإنسـان
يحيـا
وينقضـي
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كــأن
لــم
تــورثه
الحيــاة
رؤوم
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ومـا
نحـن
إلّا
الهـاجمون
على
الردى
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فنفــس
الفــتى
عــونٌ
لــه
وخصـيم
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وكــل
امــرئٍ
يحـدوه
للمـوت
حينـه
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وللمــوت
جــذبٌ
لــو
فطنــت
وخيـم
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ومــا
أحــد
بــاقٍ
وســوف
يضــمنا
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وإيـــاك
بطــن
الأرض
وهــي
جســوم
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لقـد
كـان
ظنـي
أن
يقـدمني
الـردى
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عليـــك
ولكـــن
الزمـــان
لئيــم
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