|
صاحِ
قد
وافى
الصفا
يروي
الظما
|
بشــــرابٍ
كــــوثري
العــــسِ
|
|
وأفـاض
الشـهد
فـي
روض
الحمـى
|
لجلا
الغـــمّ
وبـــرءِ
الأنفـــس
|
|
حبَّــذا
الفـوّار
منـه
حيـن
راق
|
فارانــا
مــاؤُهُ
ذوب
اللُجيــن
|
|
نــزّه
القلــب
عـن
الهـمّ
وراق
|
بســنى
صــافي
صـفاهُ
كـلّ
عيـن
|
|
نــثر
الــدرّ
بفيــض
وانـدفاق
|
وسـقى
الـوارد
اهنـى
الأطيـبين
|
|
قـد
جـرى
عـذباً
فـاغنى
الندما
|
بـــزلالٍ
عـــن
رحيــق
الأَكــؤُسِ
|
|
وعلــى
الأغصـان
القـى
النعمـا
|
فزهــت
مثــل
نــدامى
العُــرُس
|
|
نشــرت
بالقــاعِ
أعلام
الزهـور
|
حينمـا
القـاع
جرى
نعم
الغدير
|
|
مــن
رآه
فــي
ســواقيه
يـدور
|
ظــنَّ
ســاقٍ
فـي
جـواريه
يُـدير
|
|
فاشـرب
اللـذات
من
كاس
السرور
|
وانطـرب
سـمعاً
بانغـام
الغدير
|
|
ان
ثغــر
الزهــر
منــه
بسـما
|
وانجلــى
قــدّ
الغصـون
الميـس
|
|
وكســا
الأرض
طــرازاً
قـد
حمـى
|
وجنــة
الــورد
بعيـن
النرجـس
|
|
يــا
لــه
نهــراً
رويـاً
واردا
|
فـي
قنـاةٍ
أصـبحت
سـلك
العجـب
|
|
منهلاً
يعطيـــك
كاســاً
بــارداً
|
بالصــفا
يمــزج
فـوّار
الطـرب
|
|
يـا
هنـا
مـن
كـان
منـه
واردا
|
أمنــت
أحشــاؤهُ
حــرّ
اللهــب
|
|
نــادت
القيعــان
لمــا
قـدُما
|
مرحبـاً
فـي
ذا
الحـبيب
المونس
|
|
وعلــى
الكثبــان
لمــا
سـلّما
|
نعمــت
فــي
حلــلٍ
مــن
سـندس
|
|
جَـدولٌ
أهـدى
لنـا
مـاءَ
الحيوة
|
مـن
ميـازيب
الشفا
يشفي
الجوى
|
|
أخـبرت
عـن
جنـة
منـه
الميـاه
|
وروى
عـــن
كـــوثرٍ
لمــا
روى
|
|
مـن
يَقُـل
أن
الصفا
مثل
الفراه
|
قيـل
لا
أخطـأتَ
فـي
ذكـر
السوى
|
|
قــد
صـفا
مـاءً
واضـحى
مغنمـا
|
لا
تقســـه
بالســـوى
لا
تقـــس
|
|
وجــرى
بيــن
الروابـي
منعمـا
|
فزهـــا
كـــل
هشـــيمٍ
بيـــس
|
|
فامـلَ
لـي
يـا
صاح
منه
القدحا
|
واسـقنيهِ
فالصـفا
من
ذا
الصفا
|
|
إن
صــــوت
المــــاءِ
صـــبحاً
|
فــــرِدوهُ
بهنــــاءٍ
وشــــفا
|
|
كــل
مـن
وافـاه
نـال
الفرحـا
|
وســقا
التســنيم
لمــا
رشـفا
|
|
فابتـــدر
سلســاله
واغتنمــا
|
مــورداً
يحيـي
فـواد
المحتسـي
|
|
فــترى
مـا
كـان
قفـراً
معـدما
|
بربيــع
الخيــر
اضـحى
مكتسـي
|
|
جــاء
بسـم
اللَـه
مجـراه
إلـى
|
بيـت
ديـن
المجـدِ
منقاداً
مطيع
|
|
كانفجـارِ
الصـبح
يبـدو
من
عُلى
|
ذلـك
السـفح
إلى
الروض
البديع
|
|
وتبــاهى
جاريــاً
يعلــو
علـى
|
كــل
طــودٍ
شـامخ
الأنـف
منيـع
|
|
ملئت
منـــه
الســواقي
فطمــا
|
دافعـــاً
كالعـــارض
المنجــس
|
|
فغــدا
بالخصــب
يزهـو
منعمـاً
|
كـــل
ربـــعٍ
مقفـــرٍ
منــدرسِ
|
|
دار
فـي
دار
السنى
مثل
العريس
|
يتهـــادى
فـــي
رداءٍ
جــوهري
|
|
حــوله
الســرو
كعشــاقٍ
تميـس
|
فــي
رداءٍ
مــن
حريــرٍ
اخضــر
|
|
تبتغــي
لثــم
محيـاه
النفيـس
|
والحيـــا
يمنعهـــا
بــالنظر
|
|
خلتهــــنَّ
قايمــــاتٍ
خـــدما
|
حـــــولهُ
منعطفـــــات
الأرؤُس
|
|
وعليــــه
ســــاهراتٍ
هيّمـــا
|
التـــوي
أعناقهـــا
بــالنّعسِ
|
|
أطلـع
الزنبـق
يسـقي
الياسمين
|
مـن
نـدا
أقـداحه
صـرف
العقار
|
|
فـاعتلى
المضعف
بالحسن
المبين
|
وانثنـى
البـان
عليـه
ثـم
غار
|
|
وشـذا
النسـرين
بالعطر
الثمين
|
فتــدانى
نحــوه
أنـف
البهـار
|
|
نقـــل
النمـــام
أن
العنمــا
|
عــانق
النــوفر
جنــح
الغلـس
|
|
والأقــاحي
قــد
أعـار
الخزمـا
|
خفيــة
تــاج
الشــقيق
الأطلـس
|
|
غـرّد
الميـزاب
كالصـب
الولـوع
|
وتصــابى
حيــن
صــب
الــدررا
|
|
رقصـت
تلـك
السـواقي
والربـوع
|
وتغنــــت
جاريــــاتٍ
ســـحرا
|
|
لاعـب
الطـالع
مـن
تلـك
النبوع
|
نــــوفراتٍ
مســـفراتٍ
غـــررا
|
|
وســبيل
الصــفو
منــه
قســما
|
مــوكب
الحـزن
بـأفراح
القسـي
|
|
طفــح
الأنبــوب
شــوقاً
عنـدما
|
شــاهد
البــدر
لــديهِ
يحتسـي
|
|
قــد
بــدا
مـن
بركـة
فوّارهـا
|
أخــذ
الجــوهر
تاجــاً
سـاطعا
|
|
وانثنـــى
إذ
ضـــمهُ
دوّارهــا
|
يتســامى
فــي
ســعودٍ
طالعــا
|
|
شــاهدت
لمــا
أتــت
زوَّارهــا
|
عمــد
البلــور
منهــا
لامعــا
|
|
تحســـبنه
أهيفـــاً
محتشـــما
|
قائمــاً
فــي
وســطها
بـالحرسِ
|
|
ضـــمن
الفضــة
والــدرّ
فمــا
|
خشــية
مــن
خلســة
المختلــسِ
|
|
وانجلـى
فـي
بركةٍ
تحكي
العروس
|
والأنــابيب
لــديها
كــالجوار
|
|
أشـرقت
مـن
صـدرها
تلك
الكؤوس
|
كنجــومٍ
أشــرقت
تحـت
الخمـار
|
|
حسـنها
الزاهـي
يقـدّى
بالنفوس
|
وانجلـت
فـي
قاعـةٍ
من
خير
دار
|
|
ظهـــرت
صــدراً
عليــه
رســما
|
بلالٍ
وعقيـــــــقٍ
أنفَـــــــسِ
|
|
وعلــى
جبتهتهــا
قــد
رقمــا
|
أيهــا
الظــامي
هنـاءً
فـاحتسِ
|
|
نجحـــت
أمالنـــا
فيــه
وزاد
|
كـل
مـاءٍ
فـي
الربـى
مـن
فيضهِ
|
|
كيـف
لا
يصـبو
إليـه
ذو
الرشاد
|
والأمــاني
تنجلــي
فــي
روضـهِ
|
|
دفــق
الخيــر
بصـحرا
كـل
واد
|
إذ
رواهــا
جرعــةً
مــن
بعضـهِ
|
|
جاءنــا
فـي
جـدولٍ
قـد
أفحمـا
|
صـــنعه
كـــل
حكيــمٍ
هندســي
|
|
وبــدا
أبهــى
عجــابٍ
محكمــاً
|
فــائق
الــوزن
غريـب
المقيـسِ
|
|
خلتـه
كالعقـد
فـي
جيد
الهضاب
|
ورشـاحاً
جـاء
مـن
خصـر
الربـى
|
|
فيـه
لا
فـي
عقـد
ربـات
الخضاب
|
نجتلــي
النشــأة
ثـم
الطربـا
|
|
فهـو
كـالحرز
علـى
تلك
الشعاب
|
يمنــع
الجـدب
ويشـفي
اللغبـا
|
|
سلسـل
الأمـواه
تـدعو
المغرمـا
|
برخيــم
الصــوتِ
قــم
وأتنــس
|
|
وشــذا
الـورق
علـى
غصـنٍ
نمـا
|
بشــروا
الـدوح
بحسـن
المغـرس
|
|
وســقاة
الــراح
هبـوا
للسـرى
|
وارشـفوا
راح
الهنـا
مـن
مائهِ
|
|
واملأوا
الأقــداح
منــه
جـوهرا
|
فالصــفا
الـوافي
مـن
أسـمائهِ
|
|
ودعـوا
الخمـر
الرحيـق
الأصفرا
|
فخمــول
العقــل
مــن
أغـوائه
|
|
مــا
تــروه
الأنـس
فيـه
رنمـا
|
إن
ذا
شــــــفاء
الأخــــــرس
|
|
وعلــى
عقــد
التهـاني
زمزمـا
|
بجـــواري
المــاء
لا
بــالكنّس
|
|
جــاء
للأمــر
مطيعــاً
مقــترن
|
بمفيــض
الســعد
والخيــر
علا
|
|
لـــم
يــذقه
خــائفٌ
إلا
أمــن
|
وغـــدا
أعجوبــة
بيــن
الملا
|
|
سـاد
بـالمولى
الـذي
أجراه
من
|
مربــعٍ
يعجــز
عنــه
ذو
العلا
|
|
وحكـــى
فياضــه
جــوداً
همــا
|
مــن
يـدي
مـولاه
بـدر
المجلـس
|
|
هــو
ذو
المجـد
أميـر
العظمـا
|
دام
محفوظـــاً
بــروح
القــدسِ
|
|
كـوكب
العـدل
البشـير
المرتضى
|
والهمـــام
الأروعـــيّ
الأوحــد
|
|
جــاء
بالنصــر
بشــيراً
فأضـا
|
بشــهاب
الســعد
منــه
فرقــد
|
|
وشــح
الأيــام
أثــواب
الرضـى
|
فغـــدت
ذات
ابتســـام
يحمــد
|
|
جــاء
فــي
كفـي
نـوالٍ
منهمـا
|
أصــبح
الطــائي
نسـياً
منتسـي
|
|
يغتنــي
مــن
مـن
يـديه
لثمـا
|
راحـــةً
هـــي
راحــةٌ
للــبئس
|
|
ســيدٌ
أهــدى
المعـالي
سـوددا
|
وحباهـــا
كـــل
عـــزٍّ
شــامل
|
|
خــرق
الصــخر
وأجــرى
مـورداً
|
فـاض
مـن
نهـر
الصـفا
بالنائل
|
|
نشــدت
مــن
كفـه
سـحب
النـدا
|
لا
يضــيع
اللَــه
أجـر
العامـل
|
|
فباعيـــان
ثنــاه
قــد
ســما
|
غزلـــي
لا
بـــالعيون
النعــسِ
|
|
وبميــــاس
قنــــاه
نظمــــا
|
عقـــد
مــدحي
لا
بقــدٍّ
أميــسِ
|
|
نعـم
شـهم
ضـاء
في
أوج
السعود
|
مــن
ســناه
قمــر
العــز
ولاح
|
|
سـيد
السـادات
بـل
عين
الوجود
|
مـورد
الآمـال
مـن
غيـث
النجاح
|
|
وهـب
العليـاء
مـن
حلـم
وجـود
|
إذ
علاهــا
خيــر
عقــدٍ
ووشـاح
|
|
وعلـــى
تخــت
العلا
إذ
حكمــا
|
جلبــب
الفضــل
بــأبهى
ملبـسِ
|
|
وبهــذا
العصــر
لمــا
نجمــا
|
فــاخرت
بالشــهب
شـهب
الأطلـسِ
|
|
ذو
يميــن
قـذفت
بحـر
النـوال
|
وبهــا
اعـتز
اليمـاني
والأسـل
|
|
ســلب
العقــل
بلطــفٍ
وكمــال
|
وإذا
صـــال
بحـــربٍ
لا
تســـل
|
|
منعـم
قـد
جـاء
يعطـي
بالشمال
|
فـوق
مـا
جـادت
بـه
يمنى
الأول
|
|
وغـــدت
راحتـــه
مــذ
فطمــا
|
منحــــة
الآمـــال
للملتمـــسِ
|
|
وبشــيراً
قــد
أضــاءَ
الهممـا
|
بشـــهاب
الســـعد
للمقتبـــسِ
|
|
ظفـــرت
همتـــه
فيمــا
يشــا
|
حيـن
سلّ
الحزمَ
من
غمدا
الصواب
|
|
قـد
نشـا
المجـد
به
لما
انتشى
|
فــي
معــاليه
مطاعــاً
ومهـاب
|
|
نســل
الأرواح
مـن
بيـن
الحشـى
|
سـيفه
يغمـز
مـن
جفـن
القـراب
|
|
جهبــذٌ
مــن
فتكــهِ
قـد
علمـا
|
خيلــه
صــيد
العــداة
الخنـس
|
|
وعلــى
الفرســان
لمــا
هجمـا
|
اســكن
الفــارس
بطــن
الفـرس
|
|
قـد
سـما
فـي
نسـبٍ
بـاهٍ
صـحيح
|
مشــرقٍ
مـن
آل
مخـزوم
الكـرام
|
|
جـدُّهُ
الحـارث
ذو
الفضل
الرجيح
|
والصــحابيّ
الجليـل
بـن
هشـام
|
|
حـاز
بالأصـل
وبالفعـل
المديـح
|
حيـن
وافـى
نعـم
جـوّاداً
همـام
|
|
أصــبح
الــدهر
بــهِ
مبتســما
|
وانجلـى
وجـه
الزمـان
المعبـس
|
|
وبماضـــي
خيــر
عــدلٍ
حســما
|
هامــة
الظلــم
وجيــد
الـدنس
|
|
أشــبهت
آثــاره
زهـر
النجـوم
|
وعلــى
أعلامــه
تثنــي
الأمــم
|
|
جـاء
من
نهر
الصفا
الماءُ
يعوم
|
فـي
قنـاةٍ
عنـدما
أبـدى
الهمم
|
|
شــكر
اللَــه
وبالشــكر
تـدوم
|
نعــم
اللَـه
علـى
أهـل
النعـم
|
|
ظفـــرت
كفــاه
بــالأجر
لمــا
|
شــــيدته
مــــن
ربـــوعٍ
دُرُس
|
|
وجـــزي
أعظــم
أجــرٍ
مثلمــا
|
أورد
المــاءَ
الغزيــر
اللعـسِ
|
|
هــلّ
فــي
غـرةِ
شـعبان
الصـفا
|
وبمســرى
خمــس
ســاعات
يسـير
|
|
بعــد
حفــرٍ
فــي
تـرابٍ
وصـفا
|
عــاش
مــن
أجرتــه
كـل
فقيـر
|
|
وأتــى
فــي
عــام
خيـرٍ
وصـفا
|
هــو
فــي
تـاريخه
جـود
غزيـر
|
|
كلــف
العمــال
عامــاً
تممــا
|
ثــم
عامــاً
خاليــاً
مـن
سـدسِ
|
|
زاد
أن
أجــراه
مـولى
الكرمـا
|
البشــير
الغيــثُ
ليـث
الـوطسِ
|
|
أيهـا
الشـهم
الذي
أفنى
العدى
|
وعلــى
الطــف
خلــق
قـد
ملـك
|
|
مــا
رأينــا
قــط
قبلاً
أســداً
|
فاتكــاً
مثلــك
فـي
أنـس
ملـك
|
|
اســبغ
اللَــه
عليــك
المـددا
|
ثــم
أســمى
فــي
نجـاح
عملـك
|
|
زد
هنــاءً
بالصــفا
واحتكمــا
|
فــي
ســرور
بالثنــاءِ
الأقـدسِ
|
|
خلــد
اللَــه
عليـك
العـزّ
مـا
|
طلــع
البــدر
بـداجي
الحنـدسِ
|
|
خـذ
عقود
المدح
بالنظم
السليم
|
لا
بخمــرٍ
أو
حــبيبٍ
ذي
جمــال
|
|
مـن
عبيـدٍ
يرتجي
العفو
الكريم
|
مثلمـــا
قلــدته
درّ
النــوال
|
|
غـاص
فـي
بحـر
معانيـك
العميم
|
فـأتى
بالـدر
فـي
سـلك
المقال
|
|
وشــح
المــدح
نظامــاً
ختمــا
|
بــــدعاءٍ
فــــاخرٍ
أندلســـي
|
|
تحســد
الأقمــار
منـه
الكلمـا
|
وأعــار
الصــبح
نــور
القبـسِ
|