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أســنا
جبينــك
أم
صـباح
مسـفرٍ
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وشــذا
أريجــك
أم
عـبير
أذفـر
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أهلاً
بطلعتــك
الـتي
مـا
أسـفرت
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إلا
وليــل
الهــم
عنــا
يــدبر
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بـل
عـاد
ذابـل
روض
آمال
الورى
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غضـــا
ولا
عجــب
فإنــك
جعفــر
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وتبســـمت
أرض
الغـــري
مســرةً
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بـك
بعـدما
عبسـت
فكـادت
تزهـر
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ومـدارس
العلـم
استنارت
مذ
بدا
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فيهــا
محيــاك
البهيـج
الأنـور
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واستبشـرت
فرحـاً
بك
العلماء
بل
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كــل
الأنـام
وحـق
أن
يستبشـروا
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كنــا
بفرقتــه
بــأعظم
وحشــةٍ
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وبعــوده
عــاد
السـرور
الأكـبر
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فكأننــا
روض
تجــانبه
الحيــا
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فــذوي
وعــاوده
فأصــبح
يزهـر
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وكــأنه
شـمس
فيغشـى
الليـل
إن
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غـابت
ويبـدو
الصـبح
مهما
تسفر
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سـبحان
مـن
أحيـى
الـورى
بمعانٍ
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بنــواله
مـوتى
الخصاصـة
تنشـر
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هـو
جعفـر
لا
بـل
هو
البحر
الذي
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كـم
فـاض
بحـر
مـن
نـداه
وجعفر
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والحمــد
للَــه
الـذي
أولاه
مـن
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آلائه
مــا
الشــكر
عنــد
يقصـر
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ودعــاه
فضـلاً
مـن
لـدنه
لـبيته
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وقـراه
مـن
جـدواه
مـا
لا
يحصـر
|
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فسـرى
مسـير
الشـمس
فـي
فئةٍ
به
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حفــت
كأمثــال
الكـواكب
تزهـر
|
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أكــرم
بــه
وبصـحبه
مـن
سـادةٍ
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كرمــت
سـجاياهم
وطـاب
العنصـر
|
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لا
ســيما
صــدر
الأفاضــل
محسـن
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كنـز
العلـوم
المحسـن
المتبحـر
|
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وجــواد
النـدب
الجـواد
جلال
أر
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بــاب
الجلال
وعزهــم
والمفخــر
|
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وســـمي
حجــتي
العلــي
محمــد
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وعلــي
الطهــر
الزكــي
الأطهـر
|
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أعنـي
سـليل
الأعسـم
الحبر
الذي
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هــو
بحــر
علــمٍ
مـده
لا
يجـزر
|
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وســليل
صــادق
الصــدوق
محمـد
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والنعمـة
الكـبرى
الـتي
لا
تنكر
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قــوم
تـردوا
بـالعلى
وتقمصـوا
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بالمكرمــات
وبالعفـاف
تـأرروا
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وقـد
اقتفـوا
مناهج
من
عن
فضله
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أقلام
أربـــاب
البلاغــة
تقصــر
|
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أكـرم
بـه
مـن
مقتـف
مـن
يهتدي
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بهــداه
يحظـى
بالنجـاح
ويظفـر
|
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ذاك
الـذي
لـولاه
مـا
وخـدت
إلى
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جمــع
بهـم
قـب
البطـون
الضـمر
|
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مــولىً
بـه
بطحـاء
مكـة
أشـرقت
|
وبنــور
عرتــه
أضــاء
المشـعر
|
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بهجـت
بوطـأته
المواقـف
واغتدى
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بعـــض
ينهــي
بعضــها
ويبشــر
|
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ولقـد
غدا
الحرم
الشريف
به
على
|
مـا
فيـه
مـن
فخـر
يـتيه
ويفخر
|
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مـذ
طـاف
طاف
به
العلاء
ومذ
سعى
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ســعت
المعـالي
نحـوه
والمفخـر
|
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وبلمسـه
الحجـر
السـعيد
يمينـه
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ربحـت
وتـم
لـه
السـعود
الأوفـر
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بـل
تـم
للحجـر
السعود
وكاد
أن
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يــبيض
بشــراً
لــونه
المتغيـر
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وعلا
مقاماً
في
المقام
كما
اعتلى
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بمقــامه
فيــه
المقـام
الأنـور
|
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وأفـاض
مـن
عرفـات
بعـد
وقـوفه
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فــأفيض
رضــوان
عليــه
أكــبر
|
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جمـع
الإلـه
لـه
جميـع
الخير
في
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جمــع
فيــا
للَــه
جمــع
مبهـر
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نـالت
منـي
بمـبيته
فيها
المنى
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وصـفا
بـه
عيـش
الصـفا
المتكدر
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وبسـوقه
للهـدي
سـيق
لـه
الهدى
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وبنحــره
نحــر
الحسـود
الأبـتر
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ورمـى
غـداة
رمـى
الجمار
عداته
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بعـداً
لهـم
فليخسـؤا
وليـذمورا
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وبـأرض
طيبـةٍ
طـاب
مثـواه
بنـا
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طــوبى
لهــا
أحضـت
بـه
تتعطـر
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وبـزورة
المختار
نال
الغابة
ال
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قصـوى
الـتي
عنها
الكواكب
تقصر
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وســما
بــزورة
آل
أحمـد
رتبـةً
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بصـر
البصـيرة
عـن
مـداها
يحسر
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فليحمـد
اللَـه
الـذي
في
جنب
ما
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أولاه
طـــولاً
كــل
حمــد
يصــغر
|
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وليبتهــج
بشــراً
بمــا
أرختـه
|
بشــرى
فقـد
حـج
المسـدد
جعفـر
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